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Donate blood save lives

blood

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Donor Motivators and Donor Organizers often look for suitable slogan for their campaign. Here are some slogans collected or coined or used by them. These slogans with suitable visuals can be converted into posters.

1 A bottle of blood saved my life. Was it yours?
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2 My son is back home because you donated Blood.
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3 Maa is coming back home because you gave Blood.
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4 Blood donation is a friendly gesture.
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5 Blood owners should be Blood Donors.
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6 Blood is meant for circulation. Donate Blood.
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7 Blood Donors bring Sunshine.
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8 Keep Blood Bank shelves full. You may need Blood someday.
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9 Someone is needing Blood somewhere.
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10 Life of some patients is resting on a fraction of hope in quest of your gift of love.
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11. A life in the surgeon’s hand may be yours. Donate Blood for tomorrow.
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12. Observe your birthday by donating Blood.
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13. Wouldn’t you have given blood if this child was yours?
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14. Donate Blood – Gift life.
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15. Give mankind the greatest gift. Donate blood when Blood Bank comes to your place.
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16. A few drops of your Blood can help a life to bloom.
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17. At 18 you grow up. At 18 you drive. At 18 you give Blood to keep someone alive.
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18. Give the gift that keeps on living. Donate Blood.
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19. We need you to save life.
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20. You don’t have to have a medical degree to save a life. Just a fair degree of humanity. Give Blood. Save Life.
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21. Blessed are the young who can Donate Blood.
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22. Blood donation will cost you nothing but it will save a life !
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23. Patients need your gift of love to fight against mortal sickness.
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24. Your donation of Blood today may be an investment for your future.
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तुम व्यर्थ में दूसरों के अनर्थकारी संदेशों को ग्रहण कर लेते हो। तुम वह सच मान बैठते हो, जो दूसरे कहते हैं। तुम स्वयं अपने आप को दु:खी करते हो कि दूसरे लोग हमें चैन नहीं लेने देते। तुम स्वयं ही दु:ख का कारण हो, स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो किसी ने कुछ कह दिया, तुमने मान लिया। यही कारण है कि तुम उद्विग्न रहते हो।

सच्चा मनुष्य एक बार उत्तम संकल्प करने के लिए यह नहीं देखता कि लोग क्या कह रहे हैं। वह अपनी धुन का पक्का होता है। सुकरात के सामने जहर का प्याला रखा गया, पर उसकी राय को कोई न बदल सका। बंदा बैरागी को भेड़ों की खाल पहना कर काले मुँह गली-गली फिराया गया, किन्तु उसने दूसरों की राय न मानी।

दूसरे के इशारों पर नाचना, दूसरों के सहारे पर निर्भर रहना, दूसरों की झूठी टीका-टिप्पणी से उद्विग्न होना मानसिक दुर्बलता है। जब तक मनुष्य स्वयं अपना स्वामी नहीं बन जाता, तब तक उसका संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। दूसरों का अनुकरण करने से मनुष्य अपनी मौलिकता से हाथ धो बैठता है।

स्वयं विचार करना सीखो। दूसरों के बहकावे में न आओ। कर्तव्य-पथ पर बढ़ते हुए, दूसरे क्या कहते हैं, इसकी चिंता न करो। यदि ऐसा करने का साहस तुम में नहीं है, तो जीवन भर दासत्व के बंधनों में जकड़े रहोगे।

Once, a wealthy man came to Mahatma Anand swami. He was the owner of several factories. All his sons were pursuing the business well. His wife had passed away previously. In spite of prosperity all around, his heart was not at peace. His hunger and sleep had gone. He humbly intimated his distress and ailment to the great saint.

Mahatma Anand swami said, “In your life, you did give importance to action and labor but not to the emotions. Good company and hearing religious discourses only nourish the thoughts.

Now start giving away love, money and labor in order to remove the inner dryness. Give affection to all, go among the orphans and the poor, help them to be self-reliant. Put your physical efforts also in these noble works, as much as you can. Then see that your hunger will be returned to you and you will have a sound sleep.”

The rich man did accordingly and consequently the miraculous transformation, that he experienced, gave him a great peace and happiness which he had never experienced before.

Pragya Puran, Part-I, Page 143. 

ऐसा सबसे उपयुक्त साथी जो निरंतर मित्र, सखा, सेवक, गुरु, सहायक की तरह हर घड़ी प्रस्तुत रहे और बदले में कुछ भी प्रत्युपकार न माँगे, केवल एक ईश्वर ही हो सकता है।

ईश्वर को जीवन का सहचर बना लेने से मंजिल इतनी मंगलमय हो जाती है कि यह धरती ही ईश्वर के लोक, स्वर्ग जैसी आनंदयुक्त प्रतीत होने लगती है। 

यों ईश्वर सबके साथ है और वह सबकी सहायता भी करता है, पर जो उसे समझते हैं, वास्तविक लाभ उन्हें ही मिल पाता है। किसी के घर में सोना गड़ा है और उसे वह प्रतीत न हो, तो गरीबी ही अनुभव होती रहेगी, किंतु यदि मालूम हो कि घर में इतना सोना है, तो उसका भले ही उपयोग न किया जाए, मन में अमीरी का गर्व और विश्वास बना रहेगा। ईश्वर को भूले रहने पर हमें अकेलापन प्रतीत होता है, पर जब उसे अपने रोम-रोम में समाया हुआ, अजस्र प्रेम और सहयोग बरसाता हुआ अनुभव करते हैं, तो साहस हजारों गुना अधिक हो जाता है। आशा और विश्वास से हृदय हर घड़ी भरा रहता है। जिसने ईश्वर को भुला रखा है, अपने बलबूते पर ही सब कुछ करता है और सोचता है, उसे जिंदगी बहुत भारी प्रतीत होती है। इतना वजन उठाकर चलने में उसके पैर लडख़ड़ाने लगते हैं। अपने साधनों में कमी दीखने पर भविष्य अंधकारमय प्रतीत होने लगता है। जिसे ईश्वर पर विश्वास है, वह सदा यही अनुभव करेगा कि कोई बड़ी शक्ति मेरे साथ है। जहाँ अपना बल थकेगा, उसका बल मिलेगा। 
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
ऐसी सामाजिक रीति-नीति, प्रथा-परम्परा हमें विकसित करनी चाहिए । धन का मान घटाया जाय और मनुष्य का मूल्यांकन उसके उच्च-चरित्र एवं लोक-मंगल के लिए प्रस्तुत किये त्याग, बलिदान के आधार पर किया जाये । सभी को सम्मान इसी आधार पर मिले । कोई व्यक्ति कितना ही धनी क्यों न हो इस कारण सम्मान प्राप्त न कर सके कि वह दौलत का अधिपति है । उचित तो यह है कि ऐसे लोगों का मूल्य और सम्मान लोक-सेवियों की तुलना में बहुत घटाकर रखा जाय । धन के कारण सम्मान मिलने से लोग अधिक अमीर बनने और किसी भी उपाय से पैसा कमाने को प्रेरित होते हैं । यदि धन का सम्मान गिर जाय, संग्रह को कंजूसी और स्वार्थपरता का प्रतीक मानकर तिरस्कृत किया जाय तो फिर लोग धन के पीछे पागल फिरने की अपेक्षा-सामाजिक सम्मान प्राप्त करने के लिए सत्कर्मों की और प्रवृत होने लगेंगे ।

सादगी को सराहा जाय और उद्धत वेशभूषा एवं भडक़ीली श्रृंगार-सज्जा एवं चित्र-विचित्र बनावट को ओछेपन का प्रतीक माना जाय और जो बचकानी श्रृंगारिकता, भौंड़ी फैशन, अर्द्धनग्ना, हिप्पी साज-सज्जा पनपी है उसे तिरस्कृत किया जाना चाहिए । केवल सत्त्प्रवृत्तियॉं सराही जायें, उन्हीं की चर्चा की जाये और उन्हीं को ही सम्मानित किया जाय ।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

ईश्वर और परलोक आदि के मानने की बात मुँह से न कहिये । जीवन से न कहकर मुँह से कहना अपने को और दुनिया को धोखा देना है । हममें से अधिकांश ऐसे धोखेबाज ही हैं । इसलिये हम कहा करते है कि हजार में नौ-सौ निन्यानवे व्यक्ति ईश्वर को नहीं मानते । मानते होते तो जगत में पाप दिखाई न देता ।

अगर हम ईश्वर को मानते तो क्या अँधेरे में पाप करते ? समाज या सरकार की आँखों में धूल झोंकते ? उस समय क्या यह न मानते कि ईश्वर की आँखों में धूल नहीं झोंकी गई ? हममें से कितने आदमी ऐसे हैं जो दूसरों को धोखा देते समय यह याद रखते हों कि ईश्वर की आँखें सब देख रही हैं ? अगर हमारे जीवन में यह बात नहीं है, तो ईश्वर की दुहाई देकर दूसरों से झगड़ना हमें शोभा नहीं देता ।

धर्म तत्त्व का दर्शन एवं मर्म (53)-2.70″
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 
संसार की हर एक जड़ चेतन वस्तु चाहती है कि मेरे साथ सद्व्यवहार हो । जिसके साथ दुर्व्यवहार करेंगे वही बदला लेगी । अगर छाते को लापरवाही से पटक देंगे तो जरूरत पड़ने पर उसकी तानें टूटी और कपड़ा फटा पायेंगे । जूते के साथ लापरवाही बरतेंगे तो वह या तो काट लेगा या जल्दी टूट जायेगा । सूई को यहाँ-वहाँ पटक देंगे तो वह पैर में चुभ कर अपनी उपेक्षा का बदला लेगी, कपड़े उतार कर जहाँ-तहाँ डाल देंगे तो दुबारा तलाश करने पर वे मैले, सलवट पड़े हुए, दाग-धब्बे युक्त मिलेंगे । यदि आप घर की सब वस्तुओं को संभाल कर रखेंगे तो वे समय पर सेवा करने के लिए हाजिर मिलेंगी । इसी प्रकार स्त्री, पुरुष, भाई, बहिन, माता, पिता, मित्र, सम्बन्धी, परिचित, अपरिचित यदि आपसे भलमनसाहत का व्यवहार पायेंगे तो बदले में उसी प्रकार का वर्ताव लौटा देंगे ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

पैसा या धन के महत्व को देखते हुए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन करने पर हर व्यक्ति को जीवन में सुख और शांति प्राप्त होती है। पैसों के संबंध में आचार्य चाणक्य ने एक महत्वपूर्ण बात बताई है कि-

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्।।

इस संस्कृत श्लोक का अर्थ है कि हमारे द्वारा कमाए गए धन का उपभोग करना या व्यय करना ही धन की रक्षा के समान है। इसी प्रकार किसी तालाब या बर्तन में भरा हुआ पानी उपयोग न किया जाए तो सड़ जाता है।

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति धन या पैसा कमाता है तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। काफी लोग धन को अत्यधिक संग्रहित करके रखते हैं, उसका उपयोग नहीं करते हैं। आवश्यकता से अधिक धन का संग्रहण अनुचित है। इसलिए धन का दान करना चाहिए। सही कार्यों में धन को निवेश करना चाहिए। यही धन की रक्षा के समान है। यदि कोई व्यक्ति दिन-रात मेहनत करके पैसा कमाता है और उसका उपभोग नहीं करता है तो ऐसे पैसों का लाभ क्या है। हमेशा पैसों का सदुपयोग करते रहना चाहिए। इसी प्रकार किसी तालाब में भरा जल उपयोग न किया जाए तो वह सड़ जाता है। ऐसे पानी को बचाने के लिए जरूरी है कि उसका उपयोग किया जाए। यही बात धन पर भी लागू होती है। 

पैसा या धन के महत्व को देखते हुए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन करने पर हर व्यक्ति का जीवन सुखी और शांति प्राप्त होती है। पैसों के संबंध में आचार्य चाणक्य ने एक महत्वपूर्ण बात बताई है कि-

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।

तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्।।

इस संस्कृत श्लोक का अर्थ है कि हमारे द्वारा कमाए गए धन का उपभोग करना या व्यय करना ही धन की रक्षा के समान है। इसी प्रकार किसी तालाब या बर्तन में भरा हुआ उपयोग न किया जाए तो सड़ जाता है।

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति धन या पैसा कमाता है तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। काफी लोग धन को अत्यधिक संग्रहित करके रखते हैं, उसका उपयोग नहीं करते हैं। आवश्यकता से अधिक धन का संग्रहण अनुचित है। इसलिए धन का दान करना चाहिए। सही कार्यों में धन को निवेश करना चाहिए। यही धन की रक्षा के समान है। यदि कोई व्यक्ति दिन-रात मेहनत करके पैसा कमाता है और उसका उपभोग नहीं करता है तो ऐसे पैसों का लाभ क्या है। हमेशा पैसों का सदुपयोग करते रहना चाहिए। इसी प्रकार किसी तालाब में भरा जल उपयोग न किया जाए तो वह सड़ जाता है। ऐसे पानी को बचाने के लिए जरूरी है कि उसका उपयोग किया जाए। यही बात धन पर भी लागू होती है। 

http://www.blogger.com/follow-blog.g?blogID=1590498127516132903 आप भी युग निर्माण योजना में सहभागी बने।


All religions are same!!!
We have 26 alphabets in English,
as given below?

 A  B  C  D  E  F  G H   I  J   K    L   M    N   O   P   Q   R
1   2   3  4   5   6   7  8  9  10  11  12  13  14  15  16  17  18
S   T     U   V   W    X     Y     Z
19  20   21  22   23   24   25  26 
With each alphabet getting a number, in chronological order, as above, study the following, and bring down the total to a single digit and see the result yourself.
Hindu
S  h  r  e  e   K  r  i  s  h  n  a
19+8+18+5+5+11+18+9+19+8+14+1=135=9
M u s l i m
M  o  h  a  m  m  e  d
13+15+8+1+13+13+5+4=72=9
Jain
M a h a v  i  r
13+1+8+1+22+9+18=72=9
Sikh
G  u  r  u   N  a  n  a  k
7+21+18+21+14+1+14+1+11=108=9
Parsi
Z  a  r  a  t  h  u  s  t  r a
26+1+18+1+20+8+21+19+20+18+1=153=9
Buddhist
G  a   u  t  a  m
7+1+21+20+1+13=63=9 
Christian
Esa Messiah
5+19+1+13+5+19+19+9+1+8=99=18=9
 Each one ends with number 9
THAT IS NATURE’S CREATION. 
That all religions are same!!!
Amazing!!
 YET MAN FIGHTS WITH MAN, ON RELIGIOUS ISSUES???