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कविताएँ

देवियाँ देश की जाग जायें अगर । 
युग स्वयं ही बदलता चला जायेगा । 
शक्तियाँ जागरण गीत गाएँ अगर । 
हर हृदय ही मचलता चला जायेगा । 

वीर संतान से कोख खाली नहीं । 
गोद में कौन-सी शक्ति पाली नहीं॥ 
जननियाँ शक्ति को साध पायें अगर । 
शौर्य शिशुओं में बढ़ता चला जायेगा । 

मूर्ति पुरुषार्थ में है सदाचार की । 
पूर्ति श्रम से सहज साध्य अधिकार की । । 
पत्नियां सादगी साध पायें अगर । 
पति स्वयं ही बदलता चला जायेगा॥ 

छोड़ दें नारियाँ यह गलत रूढ़ियाँ । 
तोड़ दें अंध विश्वास की बेड़ियाँ॥ 
नारियाँ दुष्प्रथायें मिटायें अगर । 
दम्भ का दम निकलता चला जायेगा॥ 

धर्म का वास्तविक रूप हो सामने । 
धर्म गिरते हुओं को लगे थामने॥ 
भक्तियाँ भावना को सजा लें अगर । 
ज्ञान का दीप जलता चला जायेगा॥ 

यह धरा स्वर्ग सी फिर सँवरने लगे । 
स्वर्ग की रूप सज्जा उभरने लगे॥ 
देवियाँ दिव्य चिंतन जगायें अगर । 
हर मनुज देव बनता चला जायेगा॥ 

माया वर्मा 
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आदिशक्ति तुम वीर प्रसुता, प्रेम मूर्ति साकार । 
दुष्प्रवृत्तियों के रावण का, करना है संहार॥ 
बहिनो हो जाओ तैयार । 

उठो समय आमन्त्रण देता, युग करता आह्वान । 
नवल सृजन का समय आ गया, लाओ नया बिहान॥ 
शान्ति-मार्ग को रोके बैठा, अंधकार अज्ञान । 
बनकर ज्ञान सूर्य की किरणें, छेड़ो नव अभियान॥ 
छुआ-छुत का भूत भगाकर, करो देश उद्घार । 
बहिनो हो जाओ तैयार॥ 

भय कुरीतियों के जंगल में पनप न पाते फूल । 
ज्ञान बिना जीवन के सपने, आज चाटते धूल॥ 
ऊँच-नीच की रची हुई है, छाती पर चट्टान । 
मानवता की फसलें चरता, अहंकार अभिमान॥ 
भेदभाव की जड़ काटो तुम, लेकर शक्ति कुठार । 
बहिनो हो जाओ तैयार॥ 

परदा बन कलंक का टीका , देता है संताप । 
आज अंधविश्वास बना है, पाप-ताप अभिशाप॥ 
चलो कदम से कदम मिलाकर ,लेकर ज्ञान मशाल । 
आज विश्व में ऊँचा कर दो, भारत माँ का भाल॥ 
अबला नहीं बनो तुम सबला, शक्तिपुज अंगार । 
बहिनो हो जाओ तैयार॥ 
-अज्ञात 
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ऐ धरती के रहने वालो, धरती को स्वर्ग बनाना है॥ 
है स्वर्ग कहीं यदि ऊपर तो, उसको इस भू पर लाना है॥ 

है स्वर्ग लोक इस धरती पर, ऊपर अथवा अन्यत्र नहीं । 
तुम उसको यहीं तलाश करो, जाओ न ढुंढने और कहीं ॥ 
अपने पुरूषार्थ प्रयत्नों से , कर दो उसका निर्माण यहीं । 
यह आशा का संदेश तुम्हें, भू मण्डल पर फैलाना है॥ 

पिता-पुत्र, पति-पत्नी भाई, भाई में हो प्यार जहाँ । 
देवरानी और जेठानी में, हो प्रेम पूर्ण व्यवहार जहाँ॥ 
हो सास-बहू भाभी व ननद में, नहीं कभी तकरार जहाँ । 
ऐसे परिवार बना करके, घर-घर में स्वर्ग बुलाना है॥ 

चिंताएँ तजकर लाभ हानि, सब में प्रसन्न रहना सीखो । 
दुख व्यथा विघ्न बाधा संकट, सबको हँस-हँस सहना सीखो॥ 
ईष्र्या व द्वेष को छोड़, प्रेम की धारा में बहना सीखो । 
रोने-धोने को छोड़ मधुर, संगीत सदा ही गाना है॥ 

सम्बंधी मित्र पड़ोसी से, निष्कपट मधुर व्यवहार करो । 
उनके सुख में तुम सुखी बनो, सेवा कर उनके दुःख हरो॥ 
निर्बल सज्जन से डरो सदा, बलवान दुष्ट से भी न डरो । 
सच्चे अर्थों में बन मनुष्य, जीवन आर्दश बिताना है॥ 

जिस ग्राम नगर में वास करो, उसको आर्दश बनाओ तुम । 
दुर्गन्ध गंदगी दूर हटा, विद्या घर-घर फैलाओ तुम॥ 
अज्ञान हटाकर इस जग का, फिर से आलोक जगाना है॥ 
ऐ धरती के रहने वालो, धरती को स्वर्ग बनाना है॥ 

-मंगल विजय 
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दयाकर दान भक्ति का , हमें परमात्मा देना । 
दया करना हमारी आत्मा में, शुद्घता देना॥ 

हमारे ध्यान में आओ, प्रभु आँखों में बस जाओ । 
हमारे दिल में आकर के , परम ज्योति जगा देना । । 

बहा दे प्रेम की गंगा, दिलों में प्रेम का सागर । 
हमें आपस में मिल जुलकर , प्रभु रहना सिखा देना॥ 

हमारा धर्म हो सेवा, हमारा कर्म हो सेवा । 
सदा ईमान हो सेवा, व सेवकचर बना देना॥ 

वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना । 
वतन पर जाँ फिदा करना, प्रभु हमको सिखा देना॥ 
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हरो विश्व विपदा श्री राम, हे अन्तर्यामी सुखधाम । 

जब-जब विपत्ति धरा पर आई, दुख दर्दों की बदली छाई । 
तब-तब शपथ तुम्हीं ने खाई, और आसुरी वृत्ति जलाई । 
पुनः सम्भालो बिगड़े काम, अजर-अमर हे नाथ अकाम॥ 
हरो विश्व………………..॥ 

तुमने ही हर युग में आकर, दमकाया कर्तव्य दिवाकर । 
अर्जुन को संदेश सुनाकर, रची विश्व हित गीता सुखकर॥ 
करते विनय सुबह और शाम, रचो परिस्थितियाँ अभिराम॥ 
हरो विश्व……………….॥ 

असुर वृत्तियाँ दूर भगा दो, साहस और विवेक जगा दो । 
नवल सृजन में चित्त लगा दो, सद्गुण की गंगा उमगा दो॥ 
भरो प्रेरणा आठों याम हो समृद्घ नगरी और ग्राम॥ 
हरो विश्व……………….॥ 

– बाबूलाल जलज 
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आओ आओ सुहागिन नारि कलश सिर धारण करो । 
आओ सीता लक्ष्मी नारि, कलश सिर धारण करो॥ 

कलश के मुख में विष्णु जी सोहें, 
कंठ में लगकर शंकर सोहें । 
ऐ जी ब्रह्मा सोहें मूलाधार, कलश ….
तेरी चूड़ी अमर हो जाय…..

सात समुद्र का निर्मल जल है, 
सात द्वीप अरू पृथ्वी अंचल है । 
गंगा यमुना की पावन धार,कलश.. …
तेरो ललना अमर हो जाय, कलश….. 

चारों वेद का ज्ञान भरा है, 
वसुधा और संसार भरा है । 
ये तो मन वांछित दातार , कलश… 
तेरी बिंदिया अमर जो जाय…..

आओ माता बहिनों आओ, 
कलश गीत को मिलकर गाओ । 
ये तो गायत्री सावित्री परिवार कलश…. 
तेरी बिंदिया अमर हो जाय….. 

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देवदूत बनकर आये, तपोपूत तुम कहलाये । 
ऋषि बनकर सबको भाये, नमन तुम्हें शत बार है॥ 

राष्ट्र धर्म में मस्त रहे, जप तप के अभ्यस्त रहे । 
नये सृजन में व्यस्त रहे, जान गया संसार है॥ 

तुमने कार्य महान किया, जगती का कल्याण किया । 
संस्कृति का उत्थान किया, जो युग का उपचार है॥ 

यज्ञ और गायत्री को, सविता को, सावित्री को । 
माता देवी धरित्री को, दिया नया उपहार है॥ 

संस्कृति को विज्ञान से, जीवन को सद्ज्ञान से । 
पौरूष को निर्माण से, जोड़ा सभी प्रकार है । 

वर्ग भेद को दूर किया, अहंकार को चूर किया । 
अनुशासन भरपूर दिया, जग का हुआ सुधार है॥ 

मिटा गये अज्ञान तुम, लुटा गये अनुदान तुम । 
बाँट गये वरदान तुम, यह अद्भूत व्यापार है । 

हे गुरुवर श्री राम तुम्हारी, महिमा अपरम्पार है॥ 

– विरेश्वर उपाध्याय 


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(पं0 श्री देवेन्द्र कुमार जी पाठक ‘अचल’)

दान ही को मान होत, दान ही महान होत,
दान ही से नम्रता, विनम्रता फरत हैं। 
दान से अभाव जात, वैरी दुर्भाव जात,
दान की सुबेलि ही से सुमन झरत है।।

दान ही से ज्ञान होत दान ही से ध्यान होत,
दान ही से द्वेष दम्भ जियत जरत है।
दान ही से हारे देव दान से विजय स्वमेव,
दान द्वारे भोर होत ध्वजा फहरत हैं।।1।।

राखी दान मरजाद डोम के बिकानो हाथ,
मृत पुत्र देख हरीचंद नहीं गीलो है।
कर्र कर्र चीरो अरकसिया चला के पुत्र,
मोरध्वज दृढ़, दान हित गर्वीलो है।।

साढे़ तीन पग भूमि बलि दियो बामन को,
शेष पै नपायो तन अलग हठीलो हैं।
दान-दानी मारग को कहाँ लौं बखान करौं,
सुनत में सूदो चलिबे मे पथरीलो हैं।।2।।

साभार – कल्याण (दानमहिमा अंक-जनवरी 2011)

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सहनशीलता में धरती हैं, मन विस्तृत आकाश हैं, 
अविश्वास की झंझा में माँ ममतामय विश्वास हैं। 

माँ से अधिक न प्रेरक होते नए-नए प्रतिमान भी,
मूल्यहीन हैं उसके सम्मुख बड़े-बड़े अनुदान भी, 
माँ के निकट पहुँचकर देखो, जब भी मन असहाय हो,
उस आँचल में थम जाएँगे भीषणतम तूफान भी,

इसके आशीषों में होता ईश्वर का आभास हैं। 
अविश्वास की झंझा में माँ ममतामय विश्वास हैं।

स्नेह उसी ने भरा दीप में, फिर जलने की सीख दी, 
हर विपरीत हवा में निर्भय हो चलने की सीख दी,
वाणी से ही नहीं, आचरण से, अविरल अभ्यास से,
हमें फसल पाने को बीजों-सा गलने की सीख दी,

अपना सब-कुछ उसे त्यागने, देने में उल्लास हैं।
अविश्वास की झंझा में माँ ममतामय विश्वास हैं। 

ऐसा हैं माहौल कि घर भी लगता अब बाजार हैं, 
कीमत से आँका जाता अब हर नाता, हर प्यार हैं,
मन मरूथल हो गए, सूखता हैं नयनों का नीर भी,
कहीं न मिलती दूर-दूर तक कोई सजल बयार हैं,

इस मौसम में केवल माँ ही सहज-विमल वातास हैं।
अविश्वास की झंझा में माँ ममतामय विश्वास हैं। 

ऐसी माँ का मन न दुखाना जाने या अनजान में, 
उसे न हीन समझना धन-पद-शिक्षा के अभिमान में,
माँ के मन का एक शब्द भी सरल-सहज आशीष का,
स्वयं परावर्तित हो जाता हैं दैवी वरदान में,

प्राण प्रवाहित करता सबमें माता का हर श्वास हैं। 
अविश्वास की झंझा में माँ ममतामय विश्वास हैं। 

-शचीन्द्र भटनागर
अखण्ड ज्योति सितम्बर 2010
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सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।

महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
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