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ज्ञान दीप

‘‘अरी मूर्ख गौरैया! तू दिन भर ऐसे ही तिनके चुनने में लगी रहेगी क्या ? छिः-छिः तू भी अजीब है, न कुछ मौज, न मस्ती-बस, वही दिन-रात परिश्रम, परिश्रम।’’

कौए की विद्रूप वाणी सुनकर भी गौरैया चुपचाप तिनके चुनने ओर घोंसला बनाने में लगी रही। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। कुछ दिन ही बीते थे, वर्षा ऋतु आ गई। एक दिन बादल घुमड़े और जोर का पानी बरसने लगा। गौरैया अपने बच्चों सहित घोंसले में छिपी रही और कौआ इधर-उधर मारा-मारा फिरता रहा। शाम को वह गौरैया के पास जाकर बोला-‘‘बहन ! सचमुच मुझसे भूल हुई जो तुझे बुरा-भला कहा। तुझे इस प्रकार सुरक्षित बैठे देखकर अब मुझे मालूम हुआ कि मेहनत का फल सदा मीठा होता है।’’
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एक युवक को नौकरी का इंटरव्यू देने के लिए 24 तारीख को बुलाया गया। युवक 22 तारीख को चलने को हुआ तो घर वालों ने कहा आज शनिवार है, अच्छा दिन नहीं, कल जाना। दूसरे दिन पंडि़त जी बोले रवि, शुक्र को पश्चिम की यात्रा वर्जित है, सो वह दिन भी गया। 23 तारीख को ‘योगिनी बाएँ पड़ेगी’ कहकर ज्योतिषी ने चक्कर में ड़ाल दिया। 24 को कपड़े पहनकर चलने को हुआ कि एक बच्ची ने छ़ीक दिया, लड़की को जुकाम था, पर घर वालों ने नहीं जाने दिया। 25 को घर से बाहर निकलते ही बिल्ली रास्ता काट गई। अपशकुन टालने के लिए, जब तक लड़के को रोककर रखा गया, रेलगाड़ी निकल गई। युवक 26 तारीख को आफिस पहुँचा तो दरवाजे पर लिखा पाया- “नो वेकेन्सी” अब कोई स्थान खाली नहीं।

अंधविश्वासों के कारण अक्सर बड़ी हानियाँ उठानी पड़ती हैं।

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एक बार भगवान कृष्ण से भेंट करने उद्धव गए। उद्धव और माधव दोनों बचपन के दोस्त थे। द्वारपाल ने कहा-‘‘इस समय भगवान पूजा में बैठे हैं, इसलिए अभी थोड़ी देर आपको ठहरना होगा।’’ समाचार पाते ही भगवान शीघ्र पूजा कार्य से निवृत होकर उद्धव से मिलने आए। कुशल प्रश्न के बाद भगवान ने पूछा-‘‘उद्धव ! तुम किसलिए आए हो ?’’

उद्धव ने कहा-‘‘यह तो बाद में बताऊँगा, पहले मुझे यह बतलाएँ कि आप किसका ध्यान कर रहे थे ?’’ भगवान ने कहा-‘‘उद्धव ! तुम यह नहीं समझ सकते।’’ लेकिन उद्धव ने जिद की, तब भगवान ने कहा-‘‘उद्धव ! तुझे क्या बताऊँ, मैं तेरा ही ध्यान कर रहा था।’’ 

सेवक स्वामी का जितना ध्यान रखते हैं, स्वामी भी सेवक का उतना ही ध्यान, सम्मान रखते हैं।

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सुप्रसिद्ध अँगरेज अभिनेता टाल्या के स्वास्थ्य और सौंदर्य से आकर्षित होकर ड़ाइरेक्टरों ने उसकी माँग स्वीकार कर ली और उसे रंगमंच पर पहुँचा दिया, किंतु उस बेचारे से न तो एक शब्द बोलते बना, न नाचते-कूदते। फिल्म ड़ाइरेक्टर नें गले की कमीज पकड़ी और झिड़ककर नीचे उतार दिया। कई अच्छे लोगों की सिफारिस के कारण एक बार फिर रंगमंच पर पहुँच तो गया, पर बेचारे की एक ड्रामे में बोलते समय ऐसी घिग्गी बँधी कि कुछ बोल ही नहीं पाया। फिल्म की आधी रीलें बेकार गई। ड़ाइरेक्टरों ने ड़ाँटकर कहा-‘‘अब दुबारा आने का प्रयत्न मत करना महाशय ?’’

और उसे ड़ाँटकर वहाँ से भगा दिया। टाल्या फिर भी हिम्मत न हारा, कुलियों जैसे सामान उठाने के छोटे-छोटे पार्ट अदा करते-करते एक दिन सुप्रसिद्ध अभिनेता बन गया। किसी ने पूछा-‘‘तुम्हारी सफलता का रहस्य क्या है ?’’ तो उसने हँसकर कहा-‘‘जितनी बार गिरो, उतनी बार उठो।यह सिद्धान्त स्वीकार कर लें तो आप भी निरंतर उठते चले जाएँगे, किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ेगी।’’

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स्वाति नक्षत्र था। वारिद जलबिंदु तेजी से चला आ रहा था।

वृक्ष की हरित नवल कोंपल ने रोककर पूछा-‘‘पिय ! किधर चले ?’’

‘‘भद्रे ! जलनिधि पर सूर्य की कोपदृष्टि हुई, वह उसे सुखाए ड़ाल रहा है। जलनिधि की सहायता करने जा रहा हूँ।’’

‘‘छोड़ो भी व्यर्थ की चिंता। खुद को मिटाकर भी कोई किसी की सहायता करता है ! चार दिन की जिंदगी है, कर लो आनंदभोग। कहाँ मिलेगी कोमल शय्या!’’

जलबिंदु ने एक न सुनी। तेजी से लुढ़क पड़ा सागर की ओर। नीचे तैर रही थी सीप। उसने जलबिंदु को आँचल में समेट लिया, वह जलबिंदु न रहकर हो गया मोती। सागर की लहरों से एक धीमी-सी ध्वनि निकली- ‘‘निज अस्तित्व की चिंता छोड़कर समाज के कल्याण के लिए जो अग्रसर होते हैं, वे बन जाते हैं जनमानस के मोती।’’

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भिखारी दिन भर भीख माँगता-माँगता शाम को एक सराय में पहुँचा और भीतर की कोठरी में भीख की झोली रखकर सो गया।

थोड़ी देर पीछे एक किसान आया। उसके पास रूपयों की एक थैली थी। किसान बैल खरीदने गया था।

भीख की झोली रूपयों की थैली से बोली-‘‘बहन ! हम तुम एक बिरादरी के हैं, इतनी दूर क्यों हैं, आओ हम तुम एक हो जाएँ ?’’

रूपयों की थैली ने हँसकर कहा-‘‘बहन ! क्षमा करो, यदि मैं तुमसे मिल गई तो संसार में परिश्रम और पुरूषार्थ का मूल्य ही क्या रह जाएगा !’’

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एक बार देवता मनुष्यों के किसी व्यवहार से क्रुद्ध हो गए। उन्होंने दुर्भिक्ष को पृथ्वी पर भेजा और मनुष्यो के होश दुरस्त करने की आज्ञा दे दी।

दुर्भिक्ष ने अपना विकराल रूप बनाया। अन्न और जल के अभाव में असंख्य मनुष्य रोते-कलपते मृत्यु के मुख में जाने लगे। अपनी सफलता का निरीक्षण करने दुर्भिक्ष दर्पपूर्वक निकला तो उस भयंकर विनाश के बीच एक प्रेरक दृश्य उसने देखा।

एक क्षुधित मनुष्य कई दिन के बाद रोटी का छोटा टुकड़ा कहीं से पाता है, पर वह उसे स्वयं नहीं खाता, वरन भूख से छट-पटाकर प्राण त्यागने की स्थिति में पहुँचे हुए एक सड़े कुते को वह रोटी का टुकड़ा खिला देता है।

इस दृश्य को देखकर दुर्भिक्ष का हृदय उमड़ पड़ा आँखें भर आई। उसने अपनी माया समेटी और स्वर्ग को वापस लौट गया।

देवताओं ने इतनी जल्दी लौट आने का कारण पूछा तो उसने कहा-‘‘जहाँ सहृदयता का आर्दश जीवित हो, वहाँ देवलोक ही होता। धरती पर भी मैंने स्वर्ग के दृश्य देखे और वहाँ से उलटे पाँवों लौटना पड़ा।’’

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खलीफा उमर एक बार अपने धर्मस्थान पर बैठे हुए थे। उन्हें स्वर्ग में एक फरिश्ता उड़ता हुआ दिखाई दिया। उसके कंधे पर बहुत मोटी पुस्तक लदी हुई थी। खलीफा ने उसे पुकारा, वह नीचे उतरा तो उन्होंने उस पुस्तक के बारे में पूछा कि इसमें क्या हैं ? फरिश्ते ने कहा-‘‘इसमें उन लोगों के नाम लिखे हैं, जो खुदा की इबादत करते हैं।’’

उन्होंने अपना नाम तलाश कराया तो फरिश्ते ने सारी पुस्तक ढूँढ़ डाली, उसका नाम कहीं न मिला। इस पर खलीफा बहुत दुखी हुए कि हमारा इतना परिश्रम बेकार ही चला गया।

कुछ दिन बाद एक और फरिश्ता छोटी-सी किताब लिए उधर से गुजरा। खलीफा ने उसे भी बुलाया और पूछा कि इसमें क्या हैं ? फरिश्ते ने कहा-‘‘इसमें उन लोगों के नाम लिखे हैं, जिसकी इबादत खुदाबंद करीम खुद करते हैं।’’

खलीफा ने पूछा-‘‘क्या ईश्वर भी किसी की इबादत करता हैं?’’फरिश्ते ने कहा-‘‘हाँ! जो लोग खुदा के आदेशों का पालन करते हैं, उन पर दुनिया को चलाने की कोशिश करते हैं, उन्हें खुदा बहुत आदर की दृष्टि से देखता है और उनकी इबादत वह खुदा करता है।’’

क्या इसमें मेरा भी नाम है ? खलीफा ने पूछा। फरिश्ता बोला कुछ नहीं, पुस्तक वहीं छोड़कर आगे अढ़ गया। खलिफा ने खोलकर देखा तो उनका नाम सबसे पहला था।

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एक बार एक व्यक्ति ने एक ऊँची बल्ली पर रत्नजडि़त कीमती कमंड़लु टाँग दिया और घोषणा की कि जो कोई साधु इस बल्ली पर सीधा चढ़कर कमंड़लु उतार लेगा उसे यह कीमती पात्र ही नहीं, बहुत दक्षिणा भी दूँगा। बहुत से त्यागी और विद्वान साधुओं ने भी प्रयत्न किया, पर किसी को सफलता न मिली। अंत में कष्यप नामक नट विद्या में बहुत-सा जीवन बिताकर साधु बने एक बौद्व भिक्षु ने उस बल्ली पर चढ़कर कमंडलु उतार लिया। उसकी बहुत प्रशंसा हुई और धन मिला।

जब यह समाचार भगवान बुद्व के पास पहुँचा तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने सब शिष्यों को बुलाकर कहा-‘‘भविष्य में तुम में से कोई भिक्षु इस प्रकार का चमत्कार न दिखाए और न उन लोगों से भिक्षा ग्रहण करे जो साधु का आचार नहीं, चमत्कार देखकर उसे बड़ा मानते हों।’’

चमत्कार नहीं, चरित्र और ज्ञान ही साधुता की कसौटी है।
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एक धनपति था। वह नित्य ही एक घृतदीप जलाकर मंदिर में रख आता था। एक दूसरा निर्धन व्यक्ति था। वह सरसों के तेल का एक दीपक जलाकर नित्य अपनी गली में रख देता था। वह अँधेरी गली थी। दोनों मरकर जब यमलोक पहुँचे तो धनपति को निम्न स्थिति की सुविधाए दी गई और निर्धन व्यक्ति को उच्च श्रेणी की। यह व्यवस्था देखी तो धनपति ने धर्मराज से पूछा-‘‘यह भेद क्यों, जबकि मैं भगवान के मंदिर में दीपक जलाता था, वह भी घी का।’’

धर्मराज मुस्कराए और बोले-‘‘पुण्य की महत्ता मूल्यों के आधार पर नहीं, कार्य की उपयोगिता और भावना के आधार पर होती हैं। मंदिर तो पहले से ही प्रकाशमान था। उस व्यक्ति ने ऐसे स्थान पर प्रकाश फैलाया, जिससे हजारों व्यक्तियों ने लाभ उठाया। उसके दीपक की उपयोगिता अधिक थी।’’

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