m-150x150

yugnirman.org

ब्लॉग आर्काइव

Donate blood save lives

blood

Our visiters

  • 3774Total visitors:
  • 6Visitors today:
  • 0Visitors currently online:

ज्ञान दीप

motivation

हनुमान चालीसा में एक चोपाई आती है —

साधू- संत के तुम रखवारे,
असुर निकंजन राम दुलारे…….

यहाँ पर आदरणीय तुलसीदासजी ने साधू और संत , दो अलग-अलग शब्दों का प्रयोग किया है,
कारन ये है की साधू और संत में बहुत ही महीन और बड़ा अंतर है, और वो ये है की,
” साधू ” वह है जो भगवान् को चाहे, और ” संत” वह है जिन्हें भगवान् स्वंम चाहें ……..

अब ये हमारे ऊपर निर्भर है की हमें क्या बनना है. ……..

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

motivation

अगर एक अंडा बाहरी ताकत से फोड़ दिया जाता है…

तो एक जिन्दगी खत्म हो जाती है…

अगर यह अन्दरूनी ताकत से फूटता है तो…

एक जिन्दगी जन्म लेती है…

महान बातें हमेशा व्यक्ति के अन्दर से जन्म लेती हैं.

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest
संत फ्रांसिस ने एक कोढ़ी को चिकित्सा के लिए धन दिया, वस्त्र दिए, स्वयं ने उनकी सेवा की। एक गिरजाघर की मरम्मत के लिए दुकान की कपड़े की कई गाँठें और अपना घोड़ा बेचकर सारा धन दे दिया। उनके पिता को इन बातों का पता चला तो उन्होंने उन्हें मारा-पीटा ही नहीं, अपनी संपदा के उत्तराधिकार से वंचित भी करने की धमकी दी।

पिता की यह धमकी सुनकर-‘‘आपने मुझे एक बहुत बड़े मोह बंधन से मुक्त कर दिया हैं। मैं स्वंय उस संपति को दूर से प्रणाम करता हूँ, जो परमार्थ और लोकमंगल के काम में नहीं आ सकती।’’

यह कहते हुए उन्होंने उनके कपड़े तक उतार दिए। उन्होंने पिता की संपदा के अधिकार को लात मार दी। 

लोकसेवा के मार्ग में बाधा बनने वाली संपदा का परित्याग ही उचित है।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest
राँका कुम्हार ने बरतन पकाने की भट्ठी तैयार की तथा पकाने के लिए बरतन उसमें रख दिए। उनमें से एक बरतन में बिल्ली के बच्चे भी थे। राँका को इसका पता नहीं था। उसने भट्ठी में आग दी। बरतन पक रहे थे तब बिल्ली आकर चक्कर काटने लगी। राँका सब बात समझकर बड़ा दुःखी हुआ और भगवान से प्रार्थना करता हुआ बैठा रहा दूसरे दिन पके बरतन भट्ठी से निकालने लगा तो देखा की एक बरतन कच्चा रह गया है, उसमें से म्याऊ-म्याऊ की आवाज निकल रही है। यह देखकर वह निहाल हो गया।

निश्छल मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest
एक बार मनु नाव में वेद रखे हुए जा रहे थे कि समुद्र में तूफान आ गया। तूफान शांत हुआ तो देखा कि एक बड़ी मछली उनकी नाव को सहारा दिए खड़ी है। मनु ने विनीत भाव से पूछा-

भगवान् ! आपने ही मेरी रक्षा की, आप कौन हैं ? ‘‘मत्स्य भगवान दिव्य रूप में प्रकट होकर बोले-‘‘वत्स ! तूने ज्ञान की रक्षा का व्रत लिया, इसलिए तेरी सहायता के लिए मुझे आना पड़ा।’’

सदुद्देश्य के लिए प्रयत्न करने वालों का भगवान स्वयं सहायक होता हैं।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest
सम्राट पुष्यमित्र का अश्वमेध सानंद संपन्न हुआ और दूसरी रात को अतिथियों की विदाई के उपलक्ष्य में नृत्योत्सव रखा गया।

यज्ञ के ब्रह्मा महर्षि पतंजलि उस उत्सव में सम्मिलित हुए। महर्षि के शिष्य चैत्र को उस आयोजन में महर्षि की उपस्थिति अखरी। उस समय तो उसे कुछ न कहा, पर एक दिन जब महर्षि योगदर्शन पढ़ा रहे थे तो चैत्र ने उपालम्भपूर्वक पूछा-‘‘गुरूवर ! क्या नृत्य गीत के रसरंग चितवृतियों के निरोध में सहायक होते हैं ?’’

महर्षि ने शिष्य का अभिप्राय समझा। उन्होंने कहा-‘‘सौम्य! आत्मा का स्वरूप रसमय है। रस में उसे आनंद मिलता है और तृप्ति भी। वह रस विकृत न होने पाए और शुद्ध स्वरूप में बना रहे, इसी सावधानी का नाम संयम है। विकार की आशंका से रस का परित्याग कर देना उचित नहीं। क्या कोई किसान पशुओं द्वारा खेत चर लिए जाने के भय से कृषि करना छोड़ देता है ? यह तो संयम नहीं, पलायन रहा। रस रहित जीवन बनाकर किया गया संयम-प्रयत्न ऐसा ही है, जैसे जल को तरलता और अग्नि को ऊष्मा से वंचित करना। सो हे भद्र! भ्रम मत करो।’’

रस नहीं, हेय और त्याज्य तो उसकी विकृति है।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest
आम यद्यपि पक चुका था, इसी में था कि किसी की तृप्ति बनता, पर वृक्ष में लगे रहने का मोह छूटा नहीं। पेड़ का मालिक पके आमों की खोज-बीन करने वृक्ष पर चढ़ा भी, पर आम पतों की झुरमुट में ऐसा छिपा कि हाथ आया ही नहीं। दूसरे दिन उसने देखा कि उसके सब पड़ोसी जा चुके, उसका अकेले ही रहने का मोह नहीं टूटा था और अब मित्रों की विरह-व्यथा और सताने लगी। आम कभी तो सोचता-नीचे कूद जाऊँ और अपने मित्रों में जा मिलूँ, फिर उसे मोह अपनी ओर खींचता, आम इसी उधेड़बुन में पड़ा रहा। संशय का यही कीड़ा धीरे-धीरे आम को खाने लबा और एक दिन उसका सारा रस चूस लिया, सूखा-पिचका आम नर कंकाल के समान पेड़ में लगा रह गया।

आम की आत्मा यह देखकर बहुत पछताई-कुछ संसार की सेवा भी न बन पड़ी और अंत हुआ तो ऐसा दुःख।

इतनी कथा सुनाने के बाद वसिष्ठ ने अजामिल से कहा-‘‘वत्स ! समझदार होकर भी जो सांसारिकता के मोह में फँसे ‘अब निकलें’-‘अब निकलें’ सोचते रहते हैं उनका भी अंत ऐसे ही होता है।’’

संशयग्रस्त मनःस्थिति के लोग न तो इधर के रहते हैं और न उधर के।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest
हज यात्रा पूरी करके एक दिन अब्दुल्ला बिन मुबारक कावा में सोए हुए थे। सपने में उन्होंने दो फरिश्तों को आपस में बातें करते देखा। एक ने दूसरे से पूछा-‘‘इस साल हज के लिए कितने आदमी आए और उनमें से कितनों की दुआ कबूल हुई ?’’

जवाब में दूसरे फरिश्ते ने कहा-‘‘यों हज करने को 40 लाख आए थे, पर इनमें से दुआ किसी की कबूल नहीं हुई है। इस साल दुआ सिर्फ एक की कबूल हुई है और वह भी ऐसा है, जो यहाँ नहीं आया।’’

पहले फरिश्ते को बहुत अचंभा हुआ। उसने पूछा-‘‘भला वह कौन खुशनसीब है, जो यहा आया भी नहीं और उसकी हज कबूल हो गई ?’’

दूसरे फरिश्ते ने पहले को बताया-‘‘वह है दमिश्क का मोची अली बिन मूफिक।’’

इस पाक हस्ती को देखने के लिए अब्दुल्ला बिन मुबारक अगले ही दिन दमिश्क के लिए चल पड़े और वहाँ उन्होंने मोची मूफिक का घर ढ़ूँढ़ निकाला।

मूफिक की आँखों में आँसू भर आए और सिर हिलाते हुए कहा-‘‘मेरा मुकद्दर ऐसा कहाँ, जो हज को जा पाता। जिंदगी भर की मेहनत से 700 दिरम उस यात्रा के लिए जमा किए थे, पर एक दिन मैंने देखा कि पड़ोस के गरीब लोग पेट की ज्वाला बुझाने के लिए उन चीजों को खा रहे थे, जिन्हें खाया नहीं जा सकता। उनकी बेबसी ने मेरा दिल हिला दिया और हज के लिए जो जमा की थी, सो उन मुफलिसों को बाँट दिया।’’

दीन-दुखियों की सहायता ही सच्ची तीर्थयात्रा है।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest
अलबानिया की रानी एलिजाबेथ एक दिन समुद्री यात्रा पर जा रही थी। तूफान आया और जहाज बुरी तरह डगमगाने लगा। मल्लाहों का धीरज टूट गया और वे डूबने की आशंका व्यक्त करने लगे। रानी ने गंभीर मुद्रा में मल्लाहों से कहा-‘‘अलबानिया के राजपरिवार का कोई सदस्य अभी तक जलयान की दुर्घटना में डूबा नहीं हैं। मैं जब तक इस पर सवार हूँ, तब तक तुममें से किसी को भी डूबने की आशंका करने की जरूरत नहीं।’’ 

मल्लाह निश्चिन्त होकर डाँड चलाते रहे। तूफान ठंढ़ा हुआ और जहाज शांतिपूर्वक निश्चित स्थान पर पहुँच गया। यदि उन्हें घबराहट रही होती तो अस्त-व्यस्त काम करते और जहाज को डुबो बैठते।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

कोर्टमार्शल के सम्मुख तात्या टोपे को उपस्थित करने के बाद अँगरेज न्यायाधीशें ने कहा-‘‘यदि अपने बचाव के लिए तुम्हें कुछ कहना है तो कह सकते हो।’’

‘‘मैंने ब्रिटिश शासन से टक्कर ली हैं।’’

तात्या ने स्वाभिमानपूर्वक कहा-‘‘मैं जानता हूँ कि इसके बदले मुझे मृत्युदंड़ प्राप्त होगा। मैं केवल ईश्वरीय न्याय और उसके न्यायालय में विश्वास करता हूँ, इसलिए अपने बचाव के पक्ष में कुछ नहीं कहना चाहता।’’

नियमानुसार उन्हें फाँसी ही दी गई। वधस्थल पर ले जाते समय उनके हाथ-पैर बाँधे जाने लगे तो वे बोले-‘‘तुम मेरे हाथ-पैर बाँधने का कष्ट क्यों करते हो, लाओ, फाँसी का फंदा मैं स्वयं अपने हाथों से पहन लेता हूँ।’’

कर्तव्य का पालन करते हुए मृत्यु भी आ जाए तो श्रेष्ठ है।

                                                       आप भी युग निर्माण योजना में सहभागी बने।
PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest