m-150x150

yugnirman.org

ब्लॉग आर्काइव

Donate blood save lives

blood

Our visiters

  • 1388Total visitors:
  • 11Visitors today:
  • 0Visitors currently online:

हमारे महापुरुष

महात्मा तिरूवल्लुवर जुलाहे थे। बड़े होकर वे कपड़े बुनते और जो कुछ मिलता उससे ही अपनी जीविका चलाते। एक दिन संध्या के समय कोई युवक उनके पास आया और बुनी हुई साड़ी का दाम पूछने लगा। इस साड़ी को बुनने में दिन भर लग गया था। संत ने दाम बताए-‘दो रूपये’।


चर्र से दो टुकड़े कर दिए बीच में से उस युवक ने और फिर पूछा-अब इन टुकड़ों के अलग-अलग क्या दाम हैं ? संत ने कहा-‘‘एक-एक रूपया।’’ फिर उसने उन टुकड़ों के भी टुकड़े कर दिए और बोला-‘‘अब’’ तो संत ने उसी गंभीरता से कहा-‘‘आठ आने।’’ इस प्रकार वह युवक टुकड़े-पर-टुकड़े करता गया और संत धैर्यपूर्वक उसके दाम बताते रहे। 

युवक शायद उनके अक्रोध तप को भंग करने ही आया था, परंतु संत हार ही न रहे थे। युवक ने अब अंतिम वार किया। उसने तार-तार हुई साड़ी को गेंद की तरह लपेटा और कहा-‘‘अब इसमें रह ही क्या गया हैं, जिसके दाम दिए जाएँ ? यह लो तुम्हारी साड़ी के दो रूपये।’’

तिरूवल्लुवर ने कहा-‘‘बेटा ! जब तुमने साड़ी खरीदी ही नही तो फिर मैं उसका मोल कैसे लूँ ?’’ अब भी इतना धीर-गम्भीर उत्तर सुनकर उद्दंड युवक पश्चाताप से विदग्ध होकर नतमस्तक हो उठा।’’

व्यक्ति दंड द्वारा उतना नहीं सीखता, जितना प्रेम और क्षमा द्वारा। 
PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

सुकरात के विरोधियों ने उन पर नास्तिकता फैलाने का आरोप लगाया। उन्होनें कहा कि यह युवाओं में देवताओं के प्रति श्रद्धाभाव मिटाने का प्रयास कर रहा हैं। वह किसी भी देवता में विश्वास नहीं करता। सुकरात ने अदालत में कहा-‘‘मैं दिव्य शक्तियों में विश्वास रखता हू तो देवताओं के अस्तित्व को कैसे नकार सकता हूं। विद्वेषवश ही मेरे खिलाफ आरोप लगाए गए हैं। मेरे जैसे अनगिनत इन्हीं कारणों से पहले भी मारे जाते रहे हैं, पर सत्य सत्य ही रहेगा। बाह्य कर्मकांड की मैं उपेक्षा नहीं करता, पर उनकी आध्यात्मिकता को समझे बिना उन्हें करना मूर्खता मानता हू। यदि मेरे ऐसे उपदेश किसी को बुरे लगते हों तो मुझे मृत्युदंड मिलना चाहिए, पर मनुष्य सदा से अमर रहा हैं, अमर रहेगा। उसकी आत्मा को कोई नहीं मार सकता।’’ भारतीय दर्शन से पूरी तरह प्रभावित गीता के मर्म को भरी सभा में सुनाने वाले सुकरात को जहर का प्याला दे दिया गया, पर उससे हुआ क्या-सुकरात हमेशा के लिए अमर बन गए। 

ऐसे त्याग-बलिदान वालों ने ही तो संस्कृति को जिंदा रखा हैं।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

कल्याण के यशस्वी संपादक हनुमान प्रसाद पोद्धार बीकानेर में सत्संग गोष्ठियों में गए। जहा भी वे जाते उनकी निगाह श्रेष्ठ व्यक्तियों को परखती रहती थीं। बीकानेर राज्य के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति चिम्मन लाल गोस्वामी उनकी गोष्ठियों में आते। उनकी जिज्ञासाए बड़ी सटीक होती थीं। पोद्धार जी का कुछ दिनों का सान्निध्य उनके जीवन को बदल गया। बाद में वे पूरी तरह से गीताप्रेस के साथ कार्य करने की दृष्टि से जीवनदान कर बीकानेर राज्य की नौकरी छोड़कर 1933 में आ गए। 1971 के बाद उनके संपादन में कल्याण के कई खोजपूर्ण विशेषांक निकले। उन्होंने ज्ञान के सागर के पास रहकर जो साधना की, उसे जीवन भर वे समाज को बांटते रहे। यद्यपि 1974 में वे परलोक गमन कर गए, पर उन्होने हनुमान प्रसाद जी के पूरक के रूप में जो योगदान सांस्कृतिक-आध्यात्मिक वांग्मय को दिया, वह भुलाया नहीं जा सकता। 


PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

जीव गोस्वामी एवं रूप गोस्वामी चैतन्य महाप्रभु के संपर्क में आए। सब कुछ बदल गया। चिंतन में भगवत्ता का समावेश हो गया। वे गौड़ देश के नवाब के यहां काम करते थे। बड़े काम के आदमी थे। सल्तनत वास्तव में वे ही चलाते थे। नवाब से उन्होंने छुट्टी मांगी। उसने नहीं दी। उसने कहा कि पूरा राज्य कार्य ठप्प हो जाएगा। नहीं माने तो दोनों को जेल में डाल दिया गया। वहीं उनका कार्यालय स्थानांतरित कर उनसे काम करने को कहा गया। वहां भी वे काम करते, पर भगवन्नाम स्मरण नहीं भूलते। यह कहा जाए कि सोते ही नहीं थे, मात्र संकीर्तन करते थे। उन्हें सहज ही आभास हुआ कि महाप्रभु स्वयं जेल में आए और उनसे बोले-‘‘हठ ना करो, जो कर रहे हो, करते रहो। कर्म छूटेगा, स्वाभाविक रूप से कर्म करते-करते पकेगा, झड़ेगा।’’ ऊपर से तो वे कर्म करते, पर उनकी समाधि सहज ही लग जाती। काम पूरा निपटाते थे। मन में संसार था ही नहीं। नवाब को दया आ गई। सन्यास के लिए उसने आज्ञा दे दी एवं मुक्त कर दिया। ऐसे व्यक्ति योगी होते हैं, जो इंद्रियों से तो आचरण करते हैं पर भाव से निष्काम योगी का जीवन जीते हैं।


PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

दादू के शिष्य थे रज्जब। पहले जन्म की बात हैं, जिसमें दोनो गुरू-शिष्य के रूप में साथ थें। भिक्षा लेने गऐ। कहते जा रहे थे-‘‘दे माई सूत-ले भाई पूत।’’ उन दिनों घर-घर में सूत कातने की परंपरा थी। सूत के बदले सब कुछ ले लिया जाता था। वे वायदा कर रहे थे पूत (पुत्र) देने का। एक धनवान घर की महिला अंदर गई। उसने सूत का अंबार लगा दिया। फिर बोली-‘‘वचन मत भूलना। बेटा मिलेगा न !’’ रज्जब बोले-‘‘गुरू का आशीष होगा तो जरूर मिलेगां’’ दादू ने उनके आश्रम पहुचते ही कहा-‘‘ तू कौन होता हैं पूत देने वाला। अब कहा हैं तो शरीर छोड़ो और उसके यहां जन्म लो।’’ योगबल से रज्जब ने शरीर छोड़ा और उसी धनी महिला के यहा जन्मे। बड़े हुए मन में गुरू के संस्कार तो थे, पर घर की आसक्ति, ठाठ-बाट, ऐश्वर्य में सब भूले हुए थे। उनकी शादी का समय आ गया। सेहरा बांधे चले जा रहे थे। दादू उधर से आ निकले। दिव्यवाणी निकली-


फूलो फूलो फिरत हैं आज हमारो ब्याऊ।
छादू गाए बजाय के दियो काठ में पांव।।

बस रज्जब हो होश आ गया। सेहरा बांधे-बांधे ही वे वहां से भागे और दादू के चरणों में जा गिरे। पूर्वजन्म के गुरू का स्मरण हो आया। ऐसा कहा जाता हैं कि फिर पूरे जीवन वे सेहरा पहने ही दादू के उपदेश सुनते रहे।
PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

गणेशशंकर विद्यार्थी ने जब ‘प्रताप’ का प्रकाशन आरंभ किया, तब वे 22-23 वर्ष के युवक ही थे। वे न केवल तिलक, गांधी, एनी बेसेंट के अनुयायी थे, वरन सभी क्रांतिकारी नवयुवकों से भी परिचित थे। उन दिनो कानपुर क्रांतिकारी आंदोलन का मुख्य केंद्र था। बटुकेश्वरदत्ता, विजयकुमार, रामदुलारे जैंसे कितने ही क्रांतिकारी विद्यार्थी जी के अनन्य मित्रों में से थे। आजाद एवं भगत सिंह ने भी उनके यहा कई बार आश्रय लिया। भगतसिंह ने तो 1924 में महीनों तक ‘बलवंतसिंह’ नाम रखकर ‘प्रताप’ के संपादकीय विभाग में काम किया। काकोरी के शहीदों के लिए विद्यार्थी जी ने जो कुछ भी अपनी बेबाक लेखनी से लिखा, वह अधिकारियों ने पढ़ा और विद्यार्थी जी एवं उनका ‘प्रताप’ उनकी हिट लिस्ट में आ गया। उन्हीं दिनो कानपुर में भयंकर दंगा फैला। इसके पीछे सरकार का हाथ था, यह सुनिश्चित दिखाई दे रहा था। उसने इतना बड़ा रूप धारण कर लिया कि चार दिन में ही 500 से अधिक व्यक्ति मारे गए। विद्यार्थी जी ने स्थान-स्थान पर जाकर दंगों को शान्त करने की कोशिश की। कई हिंदू मुहल्लों में घिरे मुसलमान भाइयों को उन्होंने सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया, पर धर्मान्ध उन्मत्त लोगों ने उनको घेर लिया और इन्हें मार डाला। 1890 में जन्में विद्यार्थी का 1939 में इस तहर चले जाना बड़ा दुखद था, पर वे शहीद हो गए राष्ट्रीय एकता के लिए।


PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

राजा जनक विदेह कहलाते हैं देह से परे जीने वाले विदेह। अनेक ऋषि-मुनियों ने उन्हें बड़ा सम्मान दिया हैं एवं उनका उल्लेख करते हुए निष्काम कर्म, निर्लिप्त जीवन जीने वाला बताया हैं। अगणित लोगों को उन्होने ज्ञान का शिक्षण दिया। एक गुरू ने अपने शिष्य को व्यावहारिक ज्ञान की दीक्षा हेतु राजा जनक के पास भेजा। शिष्य उलझन में था कि मैंने इतने सिद्ध गुरूओं के पास शिक्षण लिया। भोग-विलासों में रह रहा राजा मुझे क्या उपदेश देगा ! जनक ने शिष्य के रहने की बड़ी सुंदर व्यवस्था की। सुंदर सुकोमल बिस्तर, किंतु शयनकक्ष में पलंग के ठीक ऊपर एक नंगी तलवार पतले धागे से लटकती देखी, तो वह रात भर सो न सका। सोचता रहा कि गुरूदेव ने कहां फंसा दिया, जनक से शिकायत की ! कि नींद क्या आती-आपके सेवकों ने तलवार लगी छोड़ दी थी। इससे अच्छी नींद तो हमें हमारी कुटी में आती थी। जनक ने कहा-‘‘चलो आओ। रात की बात छोड़ो, भोजन कर लेते हैं। ‘‘सुस्वादु भोजनों का थाल सामने रखा गया। राजा बोले-‘‘आराम से भोजन करें, पर आप अपने गुरू का संदेश सुन लें। उन्होंने कहा हैं कि शिष्य को सत्संग में ज्ञान प्राप्त होना जरूरी हैं। यदि न हो तो उसे आप सूली पर चढ़ा दें। आपको बताना था, सो बता दिया। अब आप भोजन करें। ‘‘भोजन तो क्या करता, उसे सूली ही दिखाई दे रही थी। बेमन से थोड़ा खाकर उठ गया। बोला-‘‘महाराज ! अब आप किसी तरह प्राण बचा दें।‘‘ जनक बोले-‘‘आप सत्संग की चिंता न करें, वह तो हो चुका। रात आप सो न सके, किंतु मुझे तो नंगी तलवार की तरह हर पल मृत्यु का ही ध्यान बना रहता हैं। अतः मैं रास-रंग में डूबता नहीं। सूली की बात सुनकर तुम्हें स्वाद नहीं आया। इसी प्रकार मुझे भी इस शाश्वत संदेश का सदा स्मरण रहता है। मैं माया के आकर्षणों में कभी लिप्त नहीं होता। संसार में रहो अवश्य, पर संसार तुममे न रहे। यही सबसे बड़ा शिक्षण लेकर जाओ।’’ अब शिष्य को ज्ञान हुआ कि जनक विदेह क्यों कहलाते हैं। 

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

कर्नाटक के एक छोटे से गाव में एक साधारण गृहस्थ के घर एक कन्या जन्मी, जो बड़ी सुंदर युवती बनी। उन दिनो मुसलिम संस्कृति और सभ्यता की आंधी दक्षिण में प्रवेश कर रही थी। अक्का महादेवी नाम की इस साधारण ग्रामबाला ने प्रतिज्ञा की कि वह आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर ईश्वर-उपासना और राष्ट्रसेवा करेगी, कभी भी विधर्मियों को अपने देश में घुसने नहीं देगी। संयम की तेजस्विता ने उसकी कांति में और वृद्धि कर दी। तत्कालीन मैसूर के राजा कौशिक ने अद्वितीय सौंदर्य की धनी महादेवी से विवाह का प्रस्ताव रखा। वे अपनी आति कामुकता एवं ढेरों उपपत्नियों के लिए प्रसिद्ध थे। अक्का महादेवी ने मना कर दिया। कौशिक ने उसे अपमान मानकर अक्का के माता-पिता को बंदी बनाकर पुनः प्रस्ताव भेजा। अक्का ने माता-पिता की खतिर राजा का प्रस्ताव मान लिया, पर एक शर्त पर कि वे समाजसेवा, संयम साधना का परित्याग नहीं करेंगी। कौशिक ने यह बात मान ली। विवाह के बाद अपनी निष्ठा से उन्होंने कामुक पति को भी संत बनाकर सहचर बना लिया। अक्का और कौशिक दोनों ने कन्नड़ संस्कृति की रक्षा के ढेरों प्रयास किए, जिनकी विरूदावली आज भी गाई जाती हैं। 


PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

ईरान का बादशाह नौशेरवा अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध था। एक दिन शिकार खेलते हुए वह काफी दूर निकल गया। देर शाम एक गाव के किनारे डेरा लगा। भोजन के साथ नमक न मिलने पर उनका एक सेवक गाव के एक घर से नमक ले आया और भोजन बनाने लगा। 

नौशेरवा ने पूछा-‘‘नमक के दाम देकर आये हो ना ?’’ उसने उत्तर दिया-‘‘इतने से नमक का क्या दाम दिया जाये ?’’ 
नौशेरवा ने कहा-‘‘अब आगे से ऐसा काम कभी न करना। उस नमक की कीमत जो भी हो, तुरंत देकर आओ। तुम नहीं समझते कि अगर बादशाह किसी के बाग से बिना दाम दिए एक फल भी ले ले, तो उसके कर्मचारी तो पूरा बाग ही उजाड़ कर खा जायेंगे।’’ नमूना स्वयं पेश किया जाता हैं, जाओ ! नौशेरवा की न्यायप्रियता नें ही उसे एक आदर्श आचरण वाले राजा के रूप में स्थापित किया।
PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

बुद्ध भगवान वेद एवं ब्राह्मणों के खिलाफ बोलते थे। उनकी टीका कर्मकांडो से जुड़े उस भ्रष्ट आचरण के प्रति थी, जिसमें हिंसा, बलि का जोर था। एक बार परिव्रज्या करते हुए योगवश वे एक ब्राह्मण के घर ही ठहरे। जब ब्राह्मण को मालूम हुआ कि यही वह बुद्ध हैं, तो उसने जी भरकर गालिया दीं और तुरंत निकल जाने को कहा। 

धैर्यपूर्वक सुन रहे बुद्ध ने कहा-‘‘द्विजवर ! कोई आपके यहा आए और आप पकवान मिष्टान्नों से स्वागत करें और यदि वह स्वीकार न करे तो क्या आप उसे फेंक देते हैं ?’’ 
ब्राह्मण बोले-‘‘नहीं। फेकेंगे क्यों ? हम स्वयं ग्रहण करेंगे।’’ 
बुद्ध ने कहा-‘‘ तो फिर गालियों की यह भेंट आप स्वयं स्वीकार करें। आपकी, अपनी वस्तु आप ही ग्रहण करें।’’ 
यह कहकर बुद्ध मुस्करा कर अगले स्थान के लिए रवाना हो गये।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest