m-150x150

yugnirman.org

ब्लॉग आर्काइव

Donate blood save lives

blood

Our visiters

  • 231Total visitors:
  • 7Visitors today:
  • 0Visitors currently online:

हमारे महापुरुष

एक बार एक सेठ जी स्वयं महामना मालवीय जी के पास अपने एक प्रीतिभोज में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए पहुँचे।

महामना जी ने उनके इस निमंत्रण को इन विनम्र किंतु मर्मस्पर्शी शब्दों में अस्वीकार कर दिया-
‘यह आपकी कृपा है, जो मुझ अकिंचन के पास स्वयं निमंत्रण देने पधारें, किंतु जब तक मेरे इस देश में मेरे हजारों-लाखों भाई आधे पेट रहकर दिन काट रहे हों तो मैं विविध व्यंजनों से परिपूर्ण बड़े-बड़े भोजों मे कैसे सम्मिलित हो सकता हूँ- ये सुस्वादु पदार्थ मेरे गले कैसे उतर सकते हैं।’’
महामना जी की यह मर्मयुक्त बात सुन सेठ जी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने प्रीतिभोज में व्यय होने वाला सारा धन गरीबों के कल्याण हेतु दान दे दिया।

बाद में उनका हृदय इस सत्कार्य से आनन्दमग्न हो उठा।

शिक्षा:-”अन्य लोगों के कष्टपीड़ित और अभावग्रस्त रहते स्वयं मौज- मस्ती में रहना मानवीय अपराध हैं।”

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

कोर्टमार्शल के सम्मुख तात्या टोपे को उपस्थित करने के बाद अँगरेज न्यायाधीशें ने कहा-‘‘यदि अपने बचाव के लिए तुम्हें कुछ कहना है तो कह सकते हो।’’

‘‘मैंने ब्रिटिश शासन से टक्कर ली हैं।’’

तात्या ने स्वाभिमानपूर्वक कहा-‘‘मैं जानता हूँ कि इसके बदले मुझे मृत्युदंड़ प्राप्त होगा। मैं केवल ईश्वरीय न्याय और उसके न्यायालय में विश्वास करता हूँ, इसलिए अपने बचाव के पक्ष में कुछ नहीं कहना चाहता।’’

नियमानुसार उन्हें फाँसी ही दी गई। वधस्थल पर ले जाते समय उनके हाथ-पैर बाँधे जाने लगे तो वे बोले-‘‘तुम मेरे हाथ-पैर बाँधने का कष्ट क्यों करते हो, लाओ, फाँसी का फंदा मैं स्वयं अपने हाथों से पहन लेता हूँ।’’

कर्तव्य का पालन करते हुए मृत्यु भी आ जाए तो श्रेष्ठ है।

                                                       आप भी युग निर्माण योजना में सहभागी बने।
PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest
माँ कहा-बच्चे ? अब तुम समझदार हो गए हो। स्नान कर लिया करो और प्रतिदिन तुलसी के इस पौधे में जल भी चढ़ाया करो। तुलसी उपासना की हमारी परम्परा पुरखों से चली आ रही है।“

बच्चे ने तर्क किया-माँ ? तुम कितनी भोली हो, इतना भी नहीं जानतीं कि यह तो पेड़ है। पेड़ों की भी कहीं पूजा की जाती हैं ? इसमें समय व्यर्थ खोने से क्या लाभ ?


लाभ है मुन्ने ? श्रद्धा ही है। श्रद्धा छोटी उपासना से विकसित होती है और अंत में जीवन को महान बना देती है, इसलिए यह भाव भी निर्मूल नहीं।

तब से विनोबा भावे जी (बच्चे) ने प्रतिदिन तुलसी को जल देना शुरू कर दिया। माँ की शिक्षा कितनी सत्य निकली, इसका प्रमाण अब सबके सामने है।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest
बापू का जन्मदिन था। नित्य की भांति संध्या समय प्रार्थना सभा हुई। खासतोर से तैयार की गई जगह पर गांधीजी प्रार्थना के लिए बैठे। प्रार्थना सम्पन्न हुई। प्रार्थना के पश्चात बापू का प्रवचन हुआ। अंत में बापू ने पूछा आज यह घी का दीपक किसने जलाया हैं। 

सारी सभा एकदम शान्त हो गई। सब एक दूसरे का मुँह देख रहे थे। बोले तो कौन बौले ? यह देखकर बापू ने कोमल वाणी में कहा, ‘आज यदि कोई बुरी बात हुई हैं, तो वह यह कि आपने यह घी का दीपक जलाया हैं।’ सुनते ही सब स्तब्ध रह गए। सोचने लगे सब भला इसमें ऐसी क्या बुरी बात हो गई हैं। कुछ देर रूक कर बापू बोले, ‘कस्तूरबा ! इतने दिनों से तुम मेरी जीवन संगिनी हो, फिर तुम भी कुछ नहीं सीख पाई। अरे, हमारे गांवो में लोग कितने निर्धन हैं, कैसे बुरे दिन काट रहै हैं? उन्हें नमक व तेल तक नहीं मिलता और हम बिना वजह ही घी जला रहे हैं।’ बीच-बचाव करते जमनालाल बजाज बोले, ‘आज आपका जन्मदिन हैं, इसलिए।’ बात काटते हुए बापू ने कहा,‘ इसका मतलब तो यह हुआ कि जन्मदिन को मितव्ययिता त्याग दी जाए और दुरूपयोग करना प्रारम्भ कर दिया जाए।’ सभी जैसे पत्थर हो गए। नम आंखों से पुनः बापू बोले,‘ जो हुआ सो हुआ पर आगे ध्यान रखना। जो वस्तु आम आदमी को उपलब्ध नहीं हो रही हो, उसे हमें भी उपयोग में लेने का कोई अधिकार नहीं हैं। जब तक हर आदमी में यह भावना नहीं आएगी, देश में खुशहाली कैसे आ पाएगी ?’ देश के वर्तमान अर्थ संकट एवं ऊर्जा मितव्ययिता के दौर में बापू का यह दृष्टान्त अत्यन्त ही प्रेरणास्पद एवं अनुकरणीय हैं।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

महर्षि दयानन्द की बीकानेर महाराज से मित्रता थी। वे अक्सर स्वामी जी से अपने ब्रह्मचर्य की शक्ति के प्रदर्शन की बात कहा करते थे, पर स्वामी जी उसे हँसकर टाल देते थे। एक दिन महाराज चार घोड़ों की बग्घी जोतकर प्रात:भ्रमण के लिए तैयार हुए। कोचवान ने घोड़ों को चलने के लिए बहुतेरा चाबुक फटकारा। घोड़े पूरी ताकत लगाकर बढे, किन्तु एक इंच भी आगे न बढ़ सके। बात क्या है, यह देखने के लिए नरेश ने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि महर्षि ने एक हाथ से बग्घी पकड़ रखी है। वे संयम की इतनी शक्ति देखकर आश्चर्यचकित रह गए।
PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

एक प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला पुरूष सामान्य वेशभूषा में जा रहा था। सड़क के किनारे खड़े बालक ने झिझक के साथ कुछ राशि की गुहार की । उस गणमान्य नागरिक ने कहा-‘‘बेटे ! यह तो तुम्हारे पढ़ने-लिखने की उम्र हैं, भीख क्यों माँगते हो ?’’ लड़के ने करूण स्वर में कहा-‘‘मेरी माता बीमार पड़ी हैं। छोटा भाई भूखा है। कल से हम सबके मुँह में अन्न का एक दाना भी नहीं गया। पिता एक वर्ष पूर्व गुजर गए। मैं विवश होकर आपसे कह रहा हूँ।’’ उन सज्जन ने कुछ सिक्के, जिनसे सात दिन की दवा व खाने की व्यवस्था हो जाए, देकर घर का पता पूछा और कहा-‘‘मैं कोई व्यवस्था करता हूँ।’’ वे स्वयं उसके घर पहुँच गएं सब देखा सब सही था। बच्चे की कापी से एक पन्ना फाड़कर कुछ लिखा और कहा-‘‘यह जो डाक्टर आएँ, उन्हें दिखा देना।’’ और चले गए। बच्चा डाक्टर को लकर आया। डाक्टर ने आकर देखा, पढ़ा तो खुशी के मारे आँखों में अश्रु आ गए। बोला-‘‘बहन ! तुम्हारे पास तो इस देश के राजा स्वयं किंग जोसेफ द्वितीय आए थे। उन्होंने लिखा हैं कि तुम्हारे इलाज हेतु श्रेष्ठतम व्यवस्था की जाए और बड़ी धनराशि की व्यवस्था भी की जाए।’’ माँ के मुँह से निकला-‘‘जिस देश का राजा इतना दयालु हैं, वहाँ की जनता को क्या कष्ट हो सकता हैं !’’ किंग जोसेफ द्वितीय सादा वेश में निरन्तर भ्रमण करते थे। कहा जाता हैं, उनके राज्य में कोई दुखी नहीं था।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

पौराणिक कथाओं के अनुसार हजारो वर्ष पूर्व एक बार देवासुर संग्राम में देवताओं की हार हुई और वृत्रासुर ने देवलोक पर अधिकार कर लिया। असुरगण को वरदान था की धातु व लकड़ी का बना कोई भी अस्त्र उसका वध नही कर सकता। ऐसे मे असुरों की पराजय असंभव ही जान पड़ती थी। युग-युगों से सत्य व धर्म की रक्षा करने हेतु, अवतारी शक्तियाँ मनुष्य शरीर मे जन्म लेती रहीं हैं और उसी संकल्प को पूरा करने के हेतु एक दिव्य शक्ति ने ऋषि अथर्वण व चित्ति के यहाँ जन्म लिया और उनका नाम दधीचि रखा गया। सूर्य की ऊर्जा को कौन बांध सकता है। जैसे-जैसे दधीचि बडे़ होते गये, उनकी तपस्या की कीर्ति चारों दिशाओं में फैलने लगी। ऐसे मे, आशीर्वाद एवं दिशादर्शन के उद्देश्य से देवराज इंद्र दधीचि की शरण मे पहुँचे। उसके आगे की कथा मानवता के इतिहास में, त्याग और बलिदान का श्रेष्ठतम उदाहरण है देवत्व की रक्षा के लिये, महर्षि दधीचि द्वारा अपनी अस्थियों का दान कर दिया। जिनके जोड़ से बना अस्त्र वृत्रासुर की मृत्यु का कारण बना। 

आज इस अंधेरे में, जब आस्था और विश्वास के दीये हवा के झोंको से डगमगा जाते हो, महर्षि दधीचि के बलिदान की गाथा, सभी के लिये अटूट ज्योति की किरण के समान है।

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

रामप्रसाद बिस्मिल को ब्रिटिश सरकार ने फाँसी की सजा सुना दी। आज उनका अंतिम दिन था। जेलर ने उनको देखा तो आश्चर्य से कहा- अरे, तुम्हारी एक घंटे बाद तो फाँसी होने वाली हैं और तुम योगासन, कसरत, प्राणायाम कर रहे हो। क्या तुम्हें मौत से भय नहीं ? इसकी बजाय तो तुम भगवान को याद करो। बिस्मिल ने कहा- भगवान ने मुझे धरती पर स्वस्थ शरीर देकर भेजा था और मैं चाहता हूँ कि जब वापस भगवान के पास जाऊँ तो लटके चेहरे के साथ नहीं स्वस्थ शरीर के साथ जाऊँ। 

PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

एक युवक-युवती आपस में एक-दूसरे को बेहद चाहते थे, पर युवती को न जाने क्या सूझा कि उसने किसी दूसरे व्यक्ति से शादी कर ली। यह देखकर वह सदमें मे चला गया। उसका खाना-पीना छूट गया। उस पर नशे का भूत सवार हो गया, मात्र दो सालों में वह सूखकर कंकाल हो गया। एक दिन न्यूज पेपर में उसने देखा-एक युवक ने फाँसी खाकर आत्महत्या कर ली। वह यह देखकर चैक उठा क्योंकि वह युवक और कोई नहीं उसकी प्रेमिका का पति था। उसने लिखा था- मैंने जिससे शादी की वह औरत इतनी गुस्सैल थी कि मैं उससे तंग आकर आत्महत्या कर रहा हूँ। यह पढ़ते ही उसने दोनो हाथ ऊपर उठाए और भगवान से कहा-तेरा लाख-लाख शुक्रिया हैं। अगर मेरी शादी उससे हो जाती तो आज अखबार में उसका नहीं मेरा फोटो छपा होता। वही व्यक्ति आगे चलकर दुनिया का महान् लेखक स्वेट मार्डन के नाम से मशहूर हुआ।


PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest

सुकरात शिष्यों को पढ़ा रहे थे। पत्नी ने आवाज दी- भोजन तैयार हैं, खा लो। सुकरात तो पढ़ाने में मग्न थे। फिर जोर से आवाज आई- खाना खालो। सुकरात ने कहा- आ रहा हूँ। थोड़ी देर बाद भी सुकरात नही पहुँचे तो पत्नी क्रोधित हो गई। इस बार उसने गुस्से में लाल होकर कहा- जल्दी आ जाओ और खाना खा लो। शिष्य समझ गए, उन्होंने कहा- गुरूदेव चले जाइए, पर सुकरात तो पढ़ाने में मस्त थे। पत्नी का पारा चढ़ गया, उसने उठाया पानी का मटका और सुकरात के माथे पर उँडेल दिया। सभी शिष्य भौचक्के रह गए। मुस्कुराते हुए सुकरात ने कहा- देखो, मेरी पत्नी कितनी अच्छी हैं, यह पहले तो गरजती हैं फिर बरसती भी हैं। 


PLEASE SHARE THIS POSTShare on FacebookTweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+Pin on Pinterest