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अनमोल रतन

1) आत्मा का साक्षात्कार ही मनुष्य की सारी सफलताओं का प्राण है। यह तभी संभव है, जब मानव अपने वर्तमान जीवन को श्रेष्ठ, उदार तथा उदात्त भावनाओं से युक्त करने का प्रयास करता है।
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2) आत्मज्ञान, आत्मविश्वास और आत्मसंचय यही तीन जीवन को बल एवं शक्ति प्रदान करते है।

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3) औरों की अच्छाइयाँ देखने से अपने सद्गुणों का विकास होता है।

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4) आज का जीवन बीते कल की परछाई है।

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5) आज प्रदर्शन हमारे मन में इतना गहरा बैठ गया हैं कि हम दर्शन करना भूलते जा रहे है।

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6) आज जो न्याय हैं, कल वही अन्याय साबित हो सकता है।

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7) आज लोग अपना अधिकार तो मानते हैं, पर कर्तव्य का पालन नहीं करते। अधिकार तो कर्तव्य का दास है।

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8) आज, दो कल के बराबर है।

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9) आनन्द का मूल सन्तोष है।

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10) आनन्द गहरे कुएँ का जल है, जिसे उपर लाने के लिए देर तक प्रबल पुरुषार्थ करना पडता है। मोती लाने वाले गहराई में उतरते और जोखिम उठाते है। आनन्द पाने के लिए गौताखोरों जैसा साहस और कुँआ खोदने वालों जैसा संकल्प होना चाहिए।

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11) आलस्य परमेश्वर के दिए हुए हाथ-पैरो का अपमान है।

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12) आलस्य दरिद्रता का दूसरा नाम है।

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13) अस्त-व्यस्त रीति से समय गॅवाना अपने ही पैरों पर कुल्हाडी मारना है।

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14) असली आत्मवेत्ता अपने आदर्श प्रस्तुत करके अनुकरण का प्रकाश उत्पन्न करते हैं और अपनी प्रबल मनस्विता द्वारा जन-जीवन में उत्कृष्टता उत्पन्न करके व्यापक विकृतियों का उन्मूलन करने की देवदूतो वाली परम्परा को प्रखर बनाते है।

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15) अव्यवस्थित और असंयत रहकर सौ वर्ष जीने की अपेक्षा, ज्ञानार्जन करते हुए और धर्मपूर्वक एक वर्ष जीवित रहना अच्छा है।

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16) अवसर हाथ से मत जाने दो।

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17) अवसर उन्ही को मिलते हैं, जो स्पष्ट ध्येय बनाकर अपनी जीवन यात्रा का निर्धारण सही तरीके से, सही समय पर कर लेते है।

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18) अच्छी शिक्षा का आदर्श हमें नीति निपुण सर्व आत्मभावनादायक विश्व के समस्त प्राणियों के प्रति दया, सेवा, अपनत्व, भलाई आदि गुण स्वभाव संस्कार वाले बनाना है।

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19) अच्छी शिक्षा क्या हैं तो इसका जवाब होगा ऐसी शिक्षा जो अच्छा इन्सान बनाये और वो इन्सान उत्तम आचरण करे। – प्लेटो।

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20) अच्छी पुस्तकें मनुष्य को धैर्य, शान्ति और सान्त्वना प्रदान करती है।

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21) अच्छी नसीहत मानना अपनी योग्यता बढाना है।

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22) अच्छा शासक वही बन सकता हैं, जो खुद किसी के अधीन रह चुका हो।

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23) अच्छाई का अभिमान बुराई की जड है।

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24) अच्छाई के अहं और बुराई की आसक्ति दोनो से उपर उठ जाने में ही सार्थकता है।

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1) आध्यात्मिक विकास की सबसे बडी बाधा मनुष्य के अहंकार पूर्ण विचार ही है।
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2) आध्यात्मिक साधनाएँ बरगद के वृक्ष की तरह घीरे-धीरे बढती हैं, पर होती टिकाउ है।

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3) आध्यात्मिक वातावरण श्रेष्ठतर मानव जीवन को गढने वाली प्रयोगशाला है।

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4) आधा भोजन दुगुना पानी, तिगुना श्रम, चैगुनी मुस्कान

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5) आकांक्षा एक प्रकार की चुम्बक शक्ति हैं, जिसके आकर्षण से अनुकूल परिस्थितियाँ खिंची चली आती है।

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6) आप ढूँढे तो परेशानी का आधा कारण अपने में ही मिल जाता है।

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7) आपका व्यवहार गणित के शून्य की तरह होना चाहिये, जो स्वयं में तो कोई कीमत नहीं रखता लेकिन दूसरो के साथ जुडने पर उसकी कीमत बढा देता है।

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8) अज्ञान ही वह प्रधान बाधा हैं, जिसके कारण हम अपने लक्ष्य की ओर नही बढ पाते है।

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9) अज्ञान से मुक्ति ही सबसे बडा पुरुषार्थ हैं, सारे कर्मो का मर्म है।

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10) अज्ञानी रहने से जन्म न लेना अच्छा हैं, क्योंकि अज्ञान सब दुःखों की जड है।

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11) अज्ञानी दुःख को झेलता हैं और ज्ञानी दुःख को सहन करता हैं 

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12) आस्थाहीनता व्यक्ति को अपराध की ओर ले जाती है।

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13) आदमी वह ठीक हैं जिसका इरादा ठीक है।

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14) आदर-निरादर शरीर का और निन्दा-प्रशंसा नाम की होती हैं। आप इनसे अलग है।

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15) आत्मविद्या इस संसार की सबसे बडी विद्या और विश्व मानव की सुख-शान्ति के साथ प्रगति-पथ पर अग्रसर होते रहने की सर्वश्रेष्ठ विधि व्यवस्था है। किन्तु दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि इस संसार में प्राण-दर्शन की बडी दुर्गति हो रही हैं और इस विडम्बना के कारण समस्त मानव जाति को भारी क्षति उठानी पड रही है।

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16) आत्म ज्ञान का सूर्य प्रायः वासना और तृष्णा की चोटियों के पीछे छिपा रहता हैं, पर जब कभी, जहाँ कहीं वह उदय होगा, वहीं उसकी सुनहरी रश्मियां एक दिव्य हलचल उत्पन्न करती हुई अवश्य दिखाई देगी।

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17) आत्मबल का पूरक परमात्मबल है।

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18) आत्मविश्वास हो तो सफलता की मंजिल दूर नहीं।

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19) आत्मविश्लेषण किया जाए, तो शांति इसी क्षण, अभी और यहीं उपलब्ध है।

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20) आत्मविश्वास महान् कार्य करने के लिये सबसे जरुरी चीज है।

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21) आत्मनियन्त्रण से असीम नियन्त्रण शक्ति प्राप्त होती है।

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22) आत्मीयता का अभ्यास करने की कार्यशाला अपना घर है।

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23) आत्मा की पुकार अनसुनी नहीं करे।

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24) आत्मा का निर्मल रुप सभी ऋद्धि-सिद्धियों से परिपूर्ण होता है।

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1) अपने मन को केवल दूसरों के कल्याण की भावना देते रहने मात्र से स्वयं का कल्याण हो जायेगा।
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2) अपने मन में वजनदार निर्भयता या प्रेम भावना हो तो घने जंगलो में भी आनन्द से रहा जा सकता है।

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3) अपने मूल्यांकन की एक ही कसौटी हैं- सद्गुणों का विकास और इनका एकमात्र सच्चा स्त्रोत हैं- व्यक्ति की पवित्र भावना। यह भावना जिसमें जितनी हैं, उसमें उसी के अनुरुप सद्गुणो की फसल लहलहायेगी। यदि भावना में कलुष हैं तो वहाँ पर दुर्गुणो को फलते-फूलते देर न लगेगी।

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4) अपने मित्रों को एकान्त में भला बुरा कहो, परन्तु उनकी प्रशंसा सबके सम्मुख करो।

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5) अपने सिद्धान्त पर जीने की शर्त के लिये त्याग आवश्यक है।

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6) अपने विश्वास की रक्षा करना, प्राण रक्षा से भी अधिक मूल्यवान है।

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7) अपने विचारों को लिखें, आखिर एक छोटी सी पेन्सिल, लम्बा याद रखने से बेहतर है।

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8) अपने निकट सम्बन्धी का दोष सहसा नहीं कहना चाहिये, कहने से उसको दुःख हो सकता हैं, जिससे उसका सुधार सम्भव नही।

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9) अपने पर विश्वास करना आस्तिकता की निशानी है।

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10) अपने शत्रुओं की बातों पर सदैव ध्यान दीजिये, क्योकि तुम्हारी कमजोरियों को उनसे अधिक कोई नही जानता है।

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11) अपने स्वार्थ से पहले दूसरों के लाभ का भी ध्यान रखना चाहिये।

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12) अपने सुख-दुःख का कारण दूसरों को न मानना चाहिये।

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13) अपने उपर विजय प्राप्त करना सबसे बडी विजय है।

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14) अपने दृष्टिकोण को सदा पवित्र रखे।

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15) अपने दोष-दुर्गुण खोजें एवं उसे दूर करे।

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16) अपने दोषो की ओर से अनभिज्ञ रहने से बडा प्रमाद इस संसार में और कोई नहीं हो सकता।

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17) अपने दोषो को सुनकर चित्त में प्रसन्नता होनी चाहिये।

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18) अपने दोष ही अंततः विनाशकारी सिद्ध होते है।

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19) अपने व्यक्तित्व को सुसंस्कारित और चरित्र को परिष्कृत बनाने वाले साधक को गायत्री महाशक्ति मातृवत् संरक्षण प्रदान करती है।

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20) अपने जीवन को अन्तरात्मा द्वारा निर्धारित उच्चतम मानदण्डो पर जीने का प्रयास करे।

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21) अपने आपको जानना हैं, दूसरों की सेवा करना हैं और ईश्वर को मानना हैं। ये तीनो क्रमशः ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग है। साथ में योग (समता) का होना आवश्यक है।

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22) अपने आचरण से शिक्षा देने वाला आचार्य कहलाता है।

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23) अपने गुण कर्म स्वभाव का शोधन और जीवन विकास के उच्च गुणों का अभ्यास करना ही साधना है।

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24) आराधना के समय उन लोगो से दूर रहो, जो भक्त और धर्मनिष्ठ लोगो का उपहास करते हो।

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1) अपनी पीडा सह लेना और दूसरे जीवों को पीडा न पहुँचाना, यही तपस्या का स्वरुप है।
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2) अपनी प्रशंसा आप न करे, यह कार्य आपके सत्कर्म स्वयं करा लेगे।

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3) अपनी प्रसन्नता दूसरों की प्रसन्नता में लीन कर देने का नाम ही प्रेम है।

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4) अपनी सभी इच्छाएँ समाप्त कर गुरु को सन्तोष देने वाला कष्टसाध्य कार्य में प्रवत्त होना ही सच्ची गुरु भक्ति है।

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5) अपनी सभी आशाओं को ईश्वर पर केन्द्रित कर दो तो कोई व्यक्ति निराश या निरस्त नहीं कर सकता ।

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6) अपनी आस्था ऊँची और सुदृढ हो तो झूठा विरोध देर तक नहीं टिकता। कुमार्ग पर चलने के कारण जो विरोध तिरस्कार उत्पन्न होता हैं, वही स्थिर रहता हैं। नेकी अपने आप में एक विभूति हैं, जो स्वयं को तारती हैं और दूसरे को भी।

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7) अपनी आत्मा की शान में विश्वास न करने वाला वेदान्त की नजरमें नास्तिक है।

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8) अपनी आत्मा ही सबसे बड़ा मार्गदर्शक है।

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9) अपने मानस पटल पर स्पष्टतः अंकित कर दीजिये-‘‘नकारात्मक विचारों का प्रवेश बन्द’’।

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10) अपनी ओर से कुछ चाहना नहीं, किन्तु दूसरे का जो आदेश हो, उसे प्राण-प्रण से पालन करना। इसी का नाम समपर्ण है।

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11) अपनी गलती मान लेना महान् चरित्र का लक्षण है।

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12) अपनी गलती स्वीकार करने में लज्जा की कोई बात नहीं है।

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13) अपना बन कर जब उजियारे छलते हैं, 

अँधियारों का हाथ थामना अच्छा हैं। 
रोज-रोज गर शबनम धोखा दे तो, 
अंगारों का हाथ थामना अच्छा है।

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14) अपना काम अपने हाथ से करो।

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15) अपना सुधार संसार की सबसे बडी सेवा है।

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16) अपना दुःख भूलकर दूसरो के आनन्द में जुट जाने के सिवाय और दूसरा रास्ता आनंदित होने का इस दुनिया में नहीं है।

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17) अपना आदर करने वालो के सामने अपना अपमान कई गुना असह्य हो जाता है।

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18) अपना आन्तरिक स्तर परिष्कृत करना ही सर्वश्रेष्ठ तप-साधना है।

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19) अपना-अपना करो सुधार, तभी मिटेगा भ्रष्टाचार।

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20) अपने हृदय में स्थित अन्तर्यामी से सम्पर्क बन जाने के बाद ही जीव निर्भय बन सकता है।

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21) अपने हृदय से किसी को बुरा न समझे, किसी का बुरा न चाहें और किसी का बुरा न करे। यह नियम ले लें तो आपकी सब बुराई मिट जायेगी और बडा भारी लाभ होगा।

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22) अपने इष्टदेव के ढाँचे में ढलने का प्रयत्न करना ही सच्ची भगवद्भक्ति है।

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23) अपने को ऊँचा बनाने का भाव राक्षसी, आसुरी भाव हैं । दूसरों को ऊँचा बनाने का भाव दैवी भाव है।

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24) अपने कल्याण के इच्छुक व्यक्ति को बुधवार व शुक्रवार के अतिरिक्त अन्य दिनो में क्षौर कर्म नहीं करना चाहिए।

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1) अभिलाषा के बिना पौरुष जाग्रत नही होता और पुरुषार्थ के बिना कोई महत्वपूर्ण सफलता कठिन है।
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2) अविश्वास धीमी आत्म हत्या है।

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3) अविश्वास, अकर्मण्यता, ईर्ष्या, असंतोष, मन की चंचलता तथा ऐसे अनेको मनोजनित रोग केवल भय की ही विभिन्न स्थितियाँ है।

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4) अविवेकशील मनुष्य दुःख को प्राप्त होते है।

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5) अनिश्चितता और विलम्ब असफलता के माता-पिता है।

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6) अहं की भावना रखना एक अक्षम्य अपराध है।

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7) अहंकार को मिटा देने से भगवान मिल जाते है।

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8) अहंकार को गलाने के लिये निष्काम सेवाभाव एकमात्र उपाय है।

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9) अहंकार विहीन प्रतिभा जब अपने चरमोत्कर्ष को छूती हैं तो वहाँ ऋषित्व प्रकट होता है।

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10) अहंकार समस्त महान् गलतियों की तह में होता है।

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11) अहंकार अज्ञानता की पराकाष्ठा है।

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12) अहंकारी सदैव उलटा सोचता हैं तथा अत्यधिक क्रोधी भी बन जाता है।

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13) अहंकारी और अधिकार के मद में चूर व्यक्ति कभी किसी को प्रेरणा नहीं दे पाता है।

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14) अहंता बडप्पन पाने की आकांक्षा को कहते हैं, दूसरों की तुलना में अपने को अधिक महत्व, श्रेय, सम्मान, मिलना चाहिये। यही हैं अहंता की आकांक्षा।

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15) अहम् का त्याग होने पर व्यक्तित्व नहीं रहता।

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16) अहमन्यता एक प्रकार की जोंक हैं, उससे पीछा छुडाने के लिये ऐसे छोटे काम अपने हाथे से करने होते हैं, जिन्हे आमतौर से छोटे लोगों द्वारा किया जाने योग्य समझा जाता है।

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17) अभक्ष्य आहार से जिव्हा की सूक्ष्म शक्ति नष्ट हो जाती है।

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18) अपमान को निगल जाना चरित्र पतन की आखिरी सीमा है।

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19) अपराध करने के बाद भय पैदा होता हैं और यही उसका दण्ड है।

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20) अपनी बुराई अपने इसी जीवन में मरने दो।

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21) अपनी मान्यताओं को ही सर्वश्रेष्ठ मानकर आलोचना नहीं करनी चाहिये।

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22) अपनी विद्वता पर अभिमान करना सबसे बडा अज्ञान है।

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23) अपनी भूख मार कर जो भिखारी को भीख दे वही तो दाता है।

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24) अपनी भूल अपने ही हाथों सुधर जायें, तो यह उससे कहीं अच्छा हैं कि कोई दूसरा उसे सुधारे।

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1) अध्ययन से थोडा ज्ञान ही होगा लेकिन साधना से समग्र ज्ञान हो जाता है।
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2) अध्यापक हैं युग निर्माता, छात्र राष्ट्र के भाग्य विधाता।

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3) अध्यात्म एक क्रमबद्ध विज्ञान हैं, जिसका सहारा लेकर कोई भी व्यक्ति उसी तरह लाभान्वित हो सकता हैं ,जिस तरह कि बिजली, भाप, आग आदि को शक्तियों का विधिवत प्रयोग करके अभीष्ट प्रयोजन पूरा किया जाता है।

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4) अध्यात्म एक नकद धर्म है, जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या से ही प्राप्त किया जा सकता है।

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5) अध्यात्म क्षैत्र में वरिष्ठता योग्यता के आधार पर नहीं, आत्मिक सद्गुणों की अग्नि परीक्षा में जाँची जाती है। इस गुण श्रंखला में निरहंकारिता को, विनयशीलता को अति महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

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6) अशिक्षितों की अपेक्षा सुशिक्षित ही मानवता के अधिक दूर हैं और वे ही विभिन्न प्रकार की समस्यायें उत्पन्न कर के संसार की सुख-शान्ति के लिए अभिषाप बने हुए है।

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7) अध्यात्म का अर्थ ही आत्मनिर्भरता और आत्मिक पूर्णता है।

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8) अध्यात्म मे बहुत ज्यादा बुद्धि का प्रयोग करना अच्छा नहीं होता है।

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9) अध्यात्म में पवित्रता सर्वोपरि है।

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10) अध्यात्म में सारा चमत्कार श्रद्धा का है।

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11) अध्यात्म व्यक्ति को अकर्मण्य नहीं बनाता, वरन् अधिक महत्वपूर्ण और अधिक भारी कार्य कर सकने की क्षमता प्रदान करता है।

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12) अध्यात्म नकद धर्म हैं। आप सही तरीके से इस्तेमाल तो कीजिये।

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13) अभिमान अविवेकी को होता है, विवेकी को नहीं।

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14) अंतमुर्खी व्यक्ति ही आत्मा और परमात्मा के रहस्य को समझ पाता हैं, और उनका साक्षात्कार कर पाता हैं बहिर्मुखता से केवल पदार्थ और संसार की उपलब्धि होती हैं, जो क्षणभंगुर है।

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15) अठारह पुराणों में व्यास जी की दो ही बातें प्रधान हैं-परोपकार पुण्य हैं और दूसरों को पीडा पहुँचाना पाप है।

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16) अब तक का इतिहास बताता, मानव हैं निज भाग्य विधाता।

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17) अकर्मण्य पिछडते हैं और प्रगति से वंचित रहते है।

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18) अकर्मण्यता दरिद्रता की सहेली हैं। जहाँ अकर्मण्यता रहेगी वहाँ किसी न किसी प्रकार दरिद्रता जरुर पहुँच जायेगी।

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19) अकेले से तप, दो से अध्ययन, तीन से गायन, चार से यात्रा, पाँच से खेती और बहुतो से युद्ध भली-भाँति बनता है।

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20) अमंगल करने वाले जो मूहूर्त अथवा योग दोष हैं, वे सब गायत्री के प्रचण्ड तेज से भस्म हो जाते है।

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21) अधिक से अधिक मौन रहने का अभ्यास करिये।

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22) अभिप्राय में उदारता, कार्य सम्पादन में मानवता, सफलता में संयम इन्ही तीन चिन्हो से मानव महान् बन जाता है।

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23) अधिकार को भूलें, कर्तव्य को याद रखे।

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24) अधिकारों का वह हकदार, जिसको कर्तव्यों से प्यार।

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1) जगत् में कुछ भी मुश्कित नहीं, केवल संकल्प की दृढता चाहिये।
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2) न इतने कठोर बनो कि लोग तुमसे डरने लगे और न इतने को कि लोग सिर चढे।

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3) न अशुभ सोचें, न दोष ढूँढे, न अन्धकार में भटके।

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4) न्यायसंगत बात कहने के लिये हर समय उपयुक्त है।

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5) नशा (व्यसन) उज्ज्वल मन का भयानक अन्धकार है।

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6) नकारात्मक विचार व्यक्ति की शक्ति क्षीण करते है।

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7) नम्र बनेंगे तो लोग नमन करते हुए सहयोग देगे।

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8) नम्रता, भक्ति, श्रद्धा और विश्वास के बगैर कोई धर्म नहीं रह सकता है।

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9) नम्रता, प्रेमपूर्ण व्यवहार तथा सहनशीलता से मनुष्य तो क्या देवता भी वश में हो जाते है।

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10) नहीं विरोधी से भी द्वेष, यह अपना सिद्धान्त विशेष।

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11) नहीं वस्तु कोई बेकार, दृष्टि चाहिये परखनहार।

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12) नरक कोई स्थान नहीं, संकीर्ण स्वार्थपरता की ओर निकृष्ट दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया मात्र है।

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13) नरक और कहीं नहीं, महत्वाकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमने वाले जीवन में है।

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14) नास्तिकता ईश्वर की अस्वीकृति को नही, आदर्शो की अवहेलना को कहते है।

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15) नेतृत्व जीवन के क्रिया-कलापों द्वारा किया जाता हैं, बातों से नही।

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16) नारी का सम्मान जहाँ, संस्कृति का उत्थान वहाँ।

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17) नारी का असली श्रंगार, सादा जीवन उच्च विचार।

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18) नारी के बिना पुरुष की बाल्यावस्था असहाय, युवावस्था आनन्दरहित और वृद्धावस्था सांत्वना शून्य हो जाती है।

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19) नारी के प्रति भोग्या भाव, यह हैं पशुओं का बर्ताव।

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20) नारी पवित्रता की धुरी है।

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21) नाशवान् में मोह होता हैं, अविनाशी में प्रेम होता है।

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22) नवयुग यदि आयेगा तो विचार-शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नहीं, विचारों की विचारों से काट द्वारा होगी, समाज का नवनिर्माण होगा तो वह सद्विचारों की प्रतिष्ठापना द्वारा ही सम्भव होगा।

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23) नैतिक बल के विकास के समानुपातिक आत्मबल का विकास होता है।

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24) नैतिकता एक गरिमापूर्ण जीवन शैली है।

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1) जो अपनी जरुरत के समय मदद माँगने में नहीं हिचके वास्तव में वही सबसे मजबूत है।
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2) जो अपनी जीवन शैली को नहीं बदल सकते हैं, उनमें हमारी तप-शक्ति भी विशेष काम नहीं कर पाती। परमपूज्यगुरुदेव।

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3) जो अपने को छोटा मानता हैं, वही वास्तव में बडा होता है।

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4) जो अपने को सबसे बडा ज्ञानी समझता हैं वह सामान्यतः सबसे बडा मूर्ख होता है।

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5) जो अपने हिस्से का काम किये बिना ही भोजन पाते हैं वे चोर है।

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6) जो अपने लिये नहीं ओरो के लिये जीते हैं वे जीवन मुक्त है।

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7) जो अपने प्रति वैरभाव रखता हो, उसकी प्रतिदिन सुबह-शाम मन-ही-मन परिक्रमा करके उसे दण्डवत प्रणाम करना चाहिये ऐसा करने से कुछ ही दिनों में वैरभाव मिट जाता है।

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8) जो अपने सेवक को अपना भेद देता हैं, वह अपने सेवक को अपना स्वामी बनाता है।

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9) जे आसानी से वायदा नहीं करता, वह उसे बेहद ईमानदारी से निभाता है।

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10) जो आदर्शो की पराकाष्ठा पर पहुँचने हेतु परमार्थ करता हैं, उसे धर्मराज कहते है।

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11) जो आदमी संकल्प कर सकता हैं, उसके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है।

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12) जननी और जन्मभूमि-दोनो स्वर्ग से कहीं बढकर है।

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13) जो आलस्य और कुकर्म से जितना बचना चाहता हैं, वह ईश्वर का सबसे बडा भक्त हैं।

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14) जो टूटे को बनाना और रुठे को मनाना जानता हैं, वही बुद्धिमान है।

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15) जो लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश का इच्छुक हैं उसे साधक पहले बनना चाहिये।

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16) जो-जो भी विभूतियुक्त, एश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु हैं, उस-उस को प्रभु के तेज के अंश की अभिव्यक्ति मानना चाहिये।

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17) जानना वही सार्थक हैं, जो करके जान लिया जाये।

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18) जैसे विज्ञान में यन्त्र होते हैं वैसे ही अध्यात्म में मन्त्र होते है।

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19) जागरुकता का अभाव ही लापरवाही है।

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20) जागकर जीना सीखो, त्याग कर पाना सीखो।

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21) जागरण के बीज निद्रा में रहते है।

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22) जागो शक्ति स्वरुपा नारी, तुम हो दिव्य कान्ति चिन्गारी।

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23) जुबान की अपेक्षा, जीवन से शिक्षा देना कहीं अधिक प्रभावशाली है।

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24) जैसा अन्न खाते हैं, मन बुद्धि का निर्माण भी वैसा ही होता है।

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1) जो दूसरों से कहना और करना हैं, उसे कार्यान्वित करने के लिये शुभारम्भ अपने आप से करना चाहिये।
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2) जो व्यक्ति योग्य अतिथि का प्रसन्नता पूर्वक स्वागत करता हैं, लक्ष्मी को उसके घर में वास करने से प्रसन्नता होती है।

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3) जो व्यक्ति रात्रि साढे ग्यारह से साढे बारह बजे तक अथवा ग्यारह से एक बजे तक जगकर भजन-स्मरण, नाम-जप करता हैं, उसको अन्त समय में मूर्च्छा नही आती और भगवान् की स्मृति बनी रहती है।

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4) जो व्यक्ति समाज में आत्म प्रदर्शन के लिये जितना उत्सुक हैं, वह उतना ही दुःखी है।

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5) जो व्यक्ति सागर के समान गम्भीर हैं, धैर्य उनका स्वाभाविक गुण होता है।

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6) जो व्यक्ति सत्य के साथ कर्तव्य-परायणता में लीन हैं, उसके मार्ग में बाधक होना कोई सरल कार्य नहीं है।

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7) जो व्यक्ति दूसरों का भला चाहता हैं उसने अपना भला पहले ही कर लिया।

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8) जो व्यक्ति वृक्ष लगाते हैं, अगले जन्म में वे उनके पुत्रों के रुप में जन्म लेते है।

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9) जो व्यक्ति अपने रहस्य को छिपाये रखता हैं, वह अपनी कुशलता अपने हाथ में रखता है।

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10) जो व्यक्ति आपको समय दे रहा हैं, समझिये वह आपको सबसे कीमती उपहार दे रहा है।

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11) जो वक्ता श्रोता को अज्ञानी समझकर बोलता हैं वह वक्ता स्वयं अज्ञानी हैं। क्योंकि यहाँ सबमें परमात्मा बैठा हैं। कौन यहाँ अज्ञानी हैं। ‘‘ईश्वर अंस जीव अबिनासी।’’

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12) जो वीरता से भरा हैं जिसका नाम लोग बडे गौरव से लेते हैं, शत्रु भी जिसके गुणों की प्रशंसा करते है, वही आदर्श पुरुष है।

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13) जो वास्तविक मौन को साध लेता हैं , वह भौतिक जीवन में गम्भीर, शान्त, सम्माननीय और वजनदार प्रतीत होता हैं, और आध्यात्मिक जीवन में ईश्वरोन्मुख बनता चला जाता है।

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14) जो चुनौतियों से डरता हैं उसका जीवन के संघर्ष में असफल होना तय है।

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15) जो फूल सूरज-मुख रहता हैं वह बादल-भरे दिनों में भी वैसा ही रहता है।

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16) जो तर्क करता हैं, मूर्ख हैं। जो तर्क सुनता नहीं, तानाशाह हैं। जो तर्क करने की हिम्मत नही रखता, गुलाम है।

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17) जो तुम दूसरों से चाहते हो, उसे पहले स्वयं करो।

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18) जो जीवन साधना की डगर पर चलने के लिये उत्सुक एवं इच्छुक हैं, उन्हे अपने पहनावे के प्रति जागरुक होना चाहिये।

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19) जो जैसा सोचेगा वह वैसा हीं बनेगा।

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20) जो न पूर्ति अपनी कर पाते, वे मानव नर पशु कहाते।

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21) जो नर्म दिल हैं, विनम्र हैं, वही सबसे बडा सन्त है।

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22) जो अभिभावक अपनी सन्तान के लिये धन, वस्तु, सुख, आमोद-प्रमोद के साधन ही न छोडकर उत्तम पुस्तकों का संग्रह छोड जाते हैं, वे बहुत बडी सम्पति छोडते है।

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23) जो अपनी विचारणा को नहीं सुधार सका, वह परिस्थिति को क्या सुधारेगा।

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24) जो अपनी प्रसुप्त सुसंस्कारिता को जगाकर अपनी पात्रता विकसित कर लेता हैं, स्वयं भगवान उसे ढूँढने पहुँचते है।

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1) जो पाप का पश्चाताप करता हैं वह साधु हैं और जो पाप का अभिमान करता हैं वह शैतान है।
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2) जो पुरुष कार्य पूर्ण होने तक कार्यरत रहते है, उन्हे ही विजयश्री मिलती है।

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3) जो दूसरों के अवगुणो की चर्चा करता हैं वह अपने अवगुण प्रकट करता है।

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4) जो पुस्तकें हमें सबसे अधिक सोचने की लिए विवश करती हैं, वे हमारी सबसे अधिक सहायक होती है।

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5) जो प्रतिशोध लेने का विचार करता हैं, वह अपने ही घाव को हरा रखता हैं, जो अब तक कभी का अच्छा हो गया होता।

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6) जो प्राप्त करना चाहते हो वह देना शुरु करो।

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7) जो शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता में राजी-नाराज होता हैं, वह हाड-माँस का भक्त है, भगवान् का नहीं।

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8) जो संकटो का भविष्यदृष्टा होता हैं, वह दो बार संकट उठाता है।

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9) जो सद्गुण अपने में नहीं है, उनकी अपने में कल्पना करो और उन्हे अपने जीवन का अभिन्न अंग बना डालो।

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10) जो स्वयं भीतर की निर्बलता से लडे, वह साहस है।

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11) जो स्वर चल रहा हों उसी कदम को घर से निकालते हुए आगे बढो।

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12) जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अपना स्वामी, अपना प्रिय मानते हैं, उनके संकल्प में आने वाली बाधाएँ भी प्रकारान्तर से उनकी सहायक ही बनती है।

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13) जो सच हैं उसको मानना ही आस्था है।

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14) जो सफलता बिना धोखे या बेईमानी के प्राप्त होती हैं, वही सच्ची सफलता है।

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15) जो सेवा करते नहीं, प्रत्युत सेवा लेते हैं, उनके लिये जमाना खराब आया है। सेवा करने वाले के लिये तो बहुत बढिया जमाना आया है।

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16) जो उपहास विरोध पचाते, वही नया कार्य कर पाते।

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17) जो उपहास और व्यंग्य विरोध से नहीं डरता, वही बडे परिवर्तन ला सकता है।

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18) जो उपदेश आत्मा से निकलता हैं, वही आत्मा पर सबसे ज्यादा कारगर होता है।

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19) जो उपलब्ध हैं उसकी श्रेष्ठता न समझी जाए, तो अभावों के अतिरिक्त और कुछ दिखेगा ही नहीं।

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20) जो उदारता, त्याग, सेवा और परोपकार के लिए कदम नहीं बढा सकता, उसे जीवन की सार्थकता का श्रेय और आनन्द भी नहीं मिल सकता।

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21) जो दीपक की तरह प्रकाश उत्पन्न करने के लिये तैयार हैं, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी में होगा।

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22) जो दुनिया का गुरु बनता हैं, वह दुनिया का गुलाम हो जाता हैं। जो अपना गुरु बनता हैं, वह दुनिया का गुरु हो जाता है।

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23) जो दूसरो के लिये अनुपयोगी हैं, उसका मूल्य शुन्य होता है।

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24) जो दूसरों के दुःख से दुःखी होता हैं, उसको अपने दुःख से दुःखी नहीं होना पडता।

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