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ऋषि चिंतन

There is a perception in the world that happiness, peace and prosperity can be attained by accumulating material resources and wealth. A lot of efforts are being made for the same. At the same time we must remember that wealth can be beneficial only when our emotional level is also high. A dispassionate person may very well convert prosperity into adversity and distress. A person with no conscience can misuse wealth. If there is dearth of food, people can survive by eating whatever comes but if there is dearth of emotions then only pain will remain. 

It has been observed that the life of rich people is more disturbed and disgraceful compared to the poor. Examples of our ancient Rishis show that life can be lived happily in poverty too. There is no enmity or conflict with accumulating wealth, but if our emotional quotient is also high along with materialistic growth, then we can be more happy and peaceful, and so will be the society. If we neglect emotions and focus only on wealth then that money will be spent in destruction only. Can a sword in the monkey’s hand be of any assistance to any body? 

-Pt. Shriram Sharma Acharya

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Kalpana Shakti
साहित्यकार, कलाकार, धर्म नेता, विज्ञानी-प्रतिभा यहॉं तक कि सत्ताधारी भी युग की आवश्यकता और दिशा का पूर्वाभास अनुभव कर रहे हैं और उन्हें विश्वास हो गया है कि समय के साथ चलने में ही भलाई है । वे नियति की प्रेरणा और भगवान की इच्छा को समझने लगे हैं । तदनुसार उनमें सामयिक परिवर्तन सरलतापूर्वक हो सकेगा । इसकी स्पष्ट झलक-झॉंकी अगले ही दिनों सबके समझ आ जायेगी ।

किन्तु धनाधीशों के बारे में अभी यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे समय को न तो समझ ही पा रहे हैं और न उसके साथ बदलने को तैयार हैं । अधिकाधिक संग्रह, अधिकाधिक अपव्यय और अधिकाधिक अहंकार की पूर्ति में यह क्षेत्र उतने गहरे दलदल में फॅंस गया है कि वापस लौटना कठिन ही दीखता है । कोई धनी अपने को निर्धन बनाने के लिए तैयार नहीं । परमार्थ के नाम पर आत्मविज्ञापन के लिए बदले में परलोकगत विपुल सुख सुविधा खरीदने के लिए ही कोई कुछ पैसे-कौड़ी फेंक सकता है, इससे आगे की आशा नहीं की जा सकती । आज कोई भी भामाशाह, अशोक, मान्धाता, वाजिश्रवा, जनक, भरत, हरिशचन्द्र की तरह उपार्जन क्षमता का लाभ इन्द्रिय लिप्सा की अहंता की तृप्ति से आगे अन्य किसी काम में करने के लिए तैयार नहीं । उपार्जन की, न्याय की व औचित्य की मर्यादाएँ टूट चुकीं हैं । जिससे-जैसे बन पड़ रहा है वह उचित-अनुचित का भेदभाव किये बिना दोनों हाथों से कमाने में लगा है । कौशल के अन्तर कें कारण कोई आगे रहता है कोई पीछे , घुड़-दौड़ में भी यही होता रहता है पर दिशा सभी घोड़ों की एक ही है । उनकी चेतना इतनी परिपक्व हो गई है कि उस पर उपदेशों की बूँदें चिकने घड़े पर पड़ऩे के बाद इधर-उधर ढुलक कर रह जाती हैं । प्रभाव कुछ नहीं होता ।

लगता है विभूति का यह क्षेत्र दुबारा गलाने के लिए भट्टी में भेजना पड़ेगा । वहॉं नये सॉंचे में ढल सकने लायक नरमी पैदा हो सकेगी । गॉंधी की ट्रस्टीशिप, विनोबा का भूदान, सम्पत्ति दान, ऋषियों का अपरिग्रह अब दर्शनशास्त्र का एक पाठ्यप्रकरण भर है । उसे व्यवहार में उतारने की कोई गुजायश नहीं दिखती । फलत: उसके भाग्य में दुर्गति होती ही लिखी दीखती है । फ्राँस के लुई, रूस के जार, भारत के राजाधिराज, चीन के अमीर, महाकाल की एक लात से किस तरह चूर्ण-विचूर्ण हो गये, उसे कोई देख समझ सका तो मानवी निर्वाचन में प्रयुक्त होने वाले चंद पैसों को छोडक़र विपुल सम्पदा का उपयोग लोककल्याण के लिए और अभाव को मिटाने के लिए किया गया होता, मिलजुल कर बाँटा खाया गया होता, तो संसार में शान्ति और समृद्धि की कोई कमी न रहती । यों लंका में विभीषण भी हो सकते हैं, पर उतने भर से क्या बनेगा ?

समय आर्थिक क्षेत्र में साम्यवाद को ही प्रतिष्ठापित करेगा । यह प्रक्रिया कहाँ धीमी होती है, कहाँ झटके से उतरती हैं यह बात दूसरी है पर होना यही है । राजा महाराजाओं का स्वरूप अब अजायबघरों की शोभा बढ़ायेगा । इतिहास के पृष्ठों पर कौतूहलपूर्वक पढ़ा जायेगा । ठीक इसी प्रकार कुछ समय पश्चात् अमीर उमराव, धनाध्यक्ष और वैभवशाली वर्ग भी अपना अस्तित्व समाप्त कर लेगा, समय की आवश्यकता, उपयोगिता से बाहर की चीजें कूड़े-करकट के ढेर में डाली जाती रही हैं । सम्पन्नता की भी अगले दिनों ऐसी दुर्गति ही होने जा रही है ।

यह सब तो भविष्य का दिग्दर्शन हुआ । युग परिवर्तन के लिए आज जिन विभूतियों की आवश्यकता पड़ रही है, उनमें एक का नाम सम्पत्ति भी है । विद्या की तरह उसका भी महत्व है । कॉंटे से कॉंटा निकाला जाता है, तलवार से तलवार का मुकाबला होता है । सम्पत्ति के मोर्चे पर भी हमें लडऩा-अडऩा पड़ेगा । बौद्धिक परिवर्तन के लिए ज्ञानयज्ञ और संघर्षात्मक प्रवृत्तियों का अभिवर्धन भी साधनों की अपेक्षा करता है । इसकी पूर्ति धनी वर्ग चाहता तो अति सरलतापूर्वक कर सकता था पर वह मरणासन्न रोगी की तरह है उसके सुधरने-बदलने की आशा लगभग छोड़ ही देनी चाहिए और प्रयोजन की पूर्ति के लिए हमें सीता जन्म के लिए किये गये ऋषि रक्त संचय की तरह ही आत्मोत्सर्ग की एक और कड़ी जोडक़र, एक और परीक्षा उत्तीर्ण करनी चाहिए ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना – दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.४४)

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Maa to bs Maa h …..
Writers, artists, religious leaders, scientists as well as politicians, too, are feeling the need of our era and direction. Now they are sure that it is better to go with the flow.They have started understanding the inspiration of destiny and God’s will. Accordingly they can be changed with time easily.Everyone will get its clear picture within a few days. 

But one can’t say this about the rich because neither are they able to understand the time nor are they ready to change with it.They are so caught up in trying to collect as much as they can, be as extravagant as they can be and satisfying their arrogance as much as they can that their return seems difficult.No rich person is ready to become poor.They can donate some money only to self-publicize to buy comfort in the other world on name of doing good for others. One can’t hope for more from them.Today, no one is ready to profit from ability to earn for anything else except to satisfy one’s senses as Bhamashah, Ashok, Mandhata, Vajshrava, Janak, Bharat and Harishchandra had done.Limits of earning, justice and rightness have been broken.Everyone is busy trying to earn as much as one can without caring for right or wrong.Someone is ahead or back because of difference of skill. This is what happens in horse race but all horses are running in the same direction.Their consciousness has become so mature that preaching falls on deaf ears.It does not have any effect.It seems that this creation must be sent to furnace to be melted again.Enough softness will be generated there to help remodel.Gandhi’s trusteeship, Vinoba’s land donation, wealth donation, Saints’ renunciation arenothing more than texts of philosophy today.There doesn’t seem to be any possibility of bringing it in behaviour.As a result one can only see misfortune in its luck.France’s Louis, Czars of Russia, India’s Kings as well as wealthy people from Russia and China, all of them were destroyed by just one stroke of luck. Had someone seen and understood that then the wealth would have been used for public welfare and to end the poverty. Had people shared everything then the world would have been a much more peaceful and wealthier place.Though there can be good people in a bad world but are they enough? 

Time will establish socialism in the field of economics.Though it is a different matter as to where this process is slow and where it happens quickly. But this is what will happen.Now, the form of kings and emperors will adorn the museums.It will be read curiously in the pages of history.Similarly, some time later wealthy people, too, will no longer exist. Things that are not useful and required at a time are thrown in trash and junk.Wealth, too, is going to meet the same end in future. 

We’ve spoken about the world of future.Today, one of the things that we need to change the time is – Wealth.It, too, is important just like education.It takes a thorn to take another out, sword to fight a sword.On the wealth front, too, we’ll have to fight.The yagna of knowledge and increase of fighting spirits for change, too, requires resources.If wealthy people wanted to do so then it could have done so easily. But it is like a dying patient and one must not hope for it to improve or change and we will have to join hands just like the blood collection of Rishis for the birth of Seeta and pass another exam. 

-Pt. Shriram Sharma Acharya

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भौतिकता और आध्यात्मिकता की आवश्यकता भौतिकता और आध्यात्मिकता परस्पर दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं । एक के बिना दूसरी अधूरी है । जंगल में गुफा में रहने वाले विरक्त महात्मा का भी भोजन, प्रकाश, माला, कमण्डल, आसन, खड़ाऊँ, पुस्तक, कम्बल, आग आदि वस्तुओं की आवश्यकता रहेगी ही, इनके बिना उसका जीवित रहना भी सम्भव न रहेगा । इतनी भौतिकता तो गुफा निवासी महात्मा को भी बरतनी पड़ेगी और अपने परिवार के प्रति प्रेम और त्याग बरतने की आध्यात्मिकता चोर-उठाईगीर और निरन्तर भौतिकवादी को भी रखनी पड़ेगी । भौतिकता को तमतत्व और आध्यात्मिकता को सततत्व, माना गया है । दोनों के मिलने से रजतत्व बना है । इसी में मानव की स्थिति हैं । एक के भी समाप्त जाने पर मनुष्य का रूप नहीं रहता । तम नष्ट होकर सत ही रह जाए तो व्यक्ति देवता या परमहंस होगा । यदि सत नष्ट होकर तम ही रह जाए तो असुरता या पैशाचिकता ही बची होगी । दोनों स्थितियों में मनुष्यत्व का व्यतिरेक हो जाएगा ।


इसलिए मानव जीवन की स्थिति जब तक है, तब तक भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों ही साथ-साथ रहती हैं । अन्तर केवल प्राथमिकता का है । सज्जनों के लिए आध्यात्मिकता ही प्रमुख रहती है, वे उसकी रक्षा के लिए भौतिक आधार की बहुत अंशों तक उपेक्षा भी कर सकते हैं । इस प्रकार दुर्जंनों के लिए भौतिकता का स्थान पहला है । वे उस प्रकार के लाभों के लिए आध्यात्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन भी कर देते हैं । इतने पर भी दोनों ही प्रकृति के लोग किसी न किसी रूप में भौतिक और आत्मिक तथ्यों को अपनाते ही हैं, या उन्हें अपनाये ही रहना पड़ता ।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना – दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (२.५४)


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यह ठीक है कि जिस व्यक्ति के साथ अनाचार बरता गया अब उस घटना को बिना हुई नहीं बनाया जा सकता । सम्भव है कि वह व्यक्ति अन्यत्र चला गया हो । ऐसी दशा में उसी आहत व्यक्ति की उसी रूप में क्षति पूर्ति करना सम्भव नहीं । किन्तु दूसरा मार्ग खुला है । हर व्यक्ति समाज का अंग है । व्यक्ति को पहुँचाई गई क्षति वस्तुत: प्रकारान्तर से समाज की ही क्षति है । उस व्यक्ति को हमने दुष्कर्मों से जितनी क्षति पहुँचाई है उसकी पूर्ति तभी होगी जब हम उतने ही वजन के सत्कर्म करके समाज को लाभ पहुँचाये । समाज को इस प्रकार हानि और लाभ का बैलेन्स जब बराबर हो जायेगा तभी यह कहा जायेगा कि पाप का प्रायश्चित हो गया और आत्मग्लानि एवं आत्मप्रताडऩा से छुटकारा पाने की स्थिति बन गई ।

सस्ते मूल्य के कर्मकाण्ड करके पापों के फल से छुटकारा पा सकना सर्वथा असम्भव है । स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन, तीर्थ, व्रत आदि से चित्त में शुद्धता की वृद्धि होना और भविष्य में पाप वृत्तियों पर अंकुश लगाने की बात समझ में आती है । धर्म कृत्यों से पाप नाश के जो माहात्म्य शास्त्रों में बताये गये हैं उनका तात्पर्य इतना ही है कि मनोभूमि का शोधन होने से भविष्य में बन सकने वाले पापों की सम्भावना का नाश हो जाये।

ईश्वरीय कठोर न्याय व्यवस्था में ऐसा ही विधान है कि पाप परिणामों की आग में जल मरने से जिन्हें बचना हो वे समाज की उत्कृष्टता बढ़ाने की सेवा-साधना में संलग्न हों और लदे हुए भार से छुटकारा प्राप्त कर शान्ति एवं पवित्रता की स्थिति उपलब्ध कर लें ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना – दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (६.१८)

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स्वयं क्रियाकुशल और सक्षम होने के बावजूद भी कितने ही व्यक्ति अन्य औरों से तालमेल न बिठा पाने के कारण अपनी प्रतिभा का लाभ समाज को नहीं दे पाते । उदाहरण के लिए फुटबाल का कोई खिलाड़ी अपने खेल में इतना पारंगत है कि वह घण्टों गेंद को जमीन पर न गिरने दे परन्तु यह भी हो सकता है कि टीम के साथ खेलने पर अन्य खिलाड़ियों से तालमेल न बिठा पाने के कारण वह साधारण स्तर का भी न खेल सके ।

अक्सर संगठनों में यह भी होता है कि कोई व्यक्ति अकेले तो कोई जिम्मेदारी आसानी से निभा लेते हैं, किन्तु उनके साथ दो चार व्यक्तियों को और जोड़ दिया जाए तथा कोई बड़ा काम सौंप दिया तो वे जिम्मेदारी से कतराने लगते हैं । कुछ व्यक्तियों को यदि किसी कार्य की जिम्मेदारी सौंप दी जाय तो हर व्यक्ति यह सोचकर अपने दायित्व से उपराम होने लगता है कि दूसरे लोग इसे पूरा कर लेगें ।

बौद्ध साहित्य में सामूहिक जिम्मेदारी के अभाव का एक अच्छा प्रसंग आता है । किसी प्रदेश के राजा ने कोई धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए राजधानी के निवासियों को निर्देश दिया कि सभी लोग मिलकर नगर के बाहर तैयार किए गए हौज में एक-एक लोटा दूध डालें । हौज को ढक दिया गया था और निश्चित समय पर जब हौज का ढ़क्कंन हटाया गया तो पता चला कि दूध भरने के स्थान पर हौज पानी से भरा था । कारण का पता लगाया गया तो मालूम हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति ने यह सोच कर दूध के स्थान पर पानी डाला था कि केवल मैं ही तो पानी डाल रहा हूँ, अन्य और लोग तो दूध ही डाल रहे हैं ।

समाज में रहकर अन्य लोगों से तालमेल बिठाने तथा अपनी क्षमता योग्यता का लाभ समाज को देने की स्थिति भी सामाजिकता से ही प्राप्त हो सकती है ।

जीवन देवता की साधना – आराधना (2)-2.20
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प्रतिभाएँ वातावरण विनिर्मित भी करती हैं, पर उनकी संख्या थोड़ी सी ही होती है । हीरे जहाँ-तहाँ कभी-कभी ही निकलते हैं, पर काँच के नगीने ढेरों कारखाने में नित्य ढलते रहते हैं । अधिकांश लोग ऐसे होते हैं जो वातावरण के दबाब से भले या बुरे ढाँचे में ढलते हैं । सत्संग, कुसंग का प्रभाव इसी को कहते हैं । ऐसे लोग अपवाद ही हैं जो बुरे लोगों के सम्पर्क में रह कर भी अपनी गरिमा बनाये रहते हैं, साथ ही अपने प्रभाव से क्षुद्रों को महान बनाने, बिगड़ों को सुधारने में समर्थ होते हैं । प्रधानता वातावरण की है । सामान्यजन प्रवाह के साथ बहते और हवा के रुख पर उड़ते देखे जाते हैं । पारस के उदाहरण कम ही मिलते है । सूरज चाँद जैसी आभा किन्हीं बिरलों में ही होती है, जो अँधेरे में उजाला कर सकें ।

आत्मोत्कर्ष का लक्ष्य लेकर चलने वालों को तो विशेष रूप से इस आवश्यकता को अनुभव करना चाहिए । उसे जुटाने के लिए प्रयत्नशील भी रहना चाहिए । इसके दो उपाय हैं । एक यह कि जहाँ इस प्रकार का वातावरण हो, वहाँ जाकर रहा जाय । दूसरा यह कि जहाँ अपना निवास है, वहीं प्रयत्नपूर्वक वैसी स्थिति उत्पन्न की जाय । कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि अपने निज के लिए कुछ समय के लिए वैसी स्थिति उत्पन्न कर ली जाए जिनके आधार पर अच्छे वातावरण का लाभ उठाया जा सके । एकान्त, स्वाघ्याय, मनन, चिन्तन ऐसे ही आधार हैं ।

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The governments of our society can punish criminals but personal stupidity, ignorance, and corruption cannot be eliminated. In a democracy, it is difficult to control and regulate the personal flaws of people which can be easily altered in a dictatorship. In a democracy, social reforms are done by social workers or social leaders. Only these types of people are capable of raising the awareness levels of a person or society. In ancient history, one can find that a nation’s pride was elevated to the highest level by social workers. They invested their time in two aspects; One, to develop their own personality in all respects so that people could follow them, and two, to devote themselves with full enthusiasm and energy in order to inspire and motivate people to achieve excellence in all areas of life. These concepts were a great tradition of Saints, Brahmins, and Vanprasthis (those that left their houses & families to live in the ASHRAMS). This is the secret of our history, but unfortunately, all of the aspects of this culture are demolished. Whatever we have seen in these forms has diverted itself now. Today’s targets, focuses, and ideals are entirely different and useless. It is not worth crying over these unfortunate happenings. Rather, we have to compensate for the loss in some other way. If household people are ready, it is their religious duty to devote and contribute some time for the enhancement of good acts in the society. The compensation is possible because development is based on this involvement and devotion. Today, there is a need for people who are patriotic and have a zeal for society and the betterment of people. The lives of these people are really worth noting and they play pivotal roles in society. 

-Pt. Shriram Sharma Acharya

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सरकार अपराधियों को दण्ड देकर आर्थिक प्रगति के थोड़े साधन जुटा सकती है पर व्यक्तिगत मूढ़ता एवं दृष्टता को, सामाजिक भ्रष्टता एवं अस्त-व्यस्तता को मिटाना उसके बलबूते की बात नहीं । अधिनायकवाद की बात दूसरी है । प्रजातंत्र में यह बात नहीं । प्रजातंत्र में व्यक्ति अथवा समाज-सुधार का कार्य लोकसेवियों पर निर्भर रहता है । उन्हीं की सत्ता, व्यक्ति या समाज का स्तर ऊँचा उठा सकने में समर्थ हो सकती है । प्राचीनकाल में देश का गौरव उच्च शिखर पर पहुँचाये रखने का सारा श्रेय यहाँ के लोक-सेवियों को है । वे अपना सारा समय दो कार्यों में खर्च करते थे । प्रथम – अपना व्यक्तित्व उच्चकोटि का विनिर्मित करना, ताकि जनता पर उसका उचित प्रभाव पड़ सके । द्वितीय – निरन्तर अथक परिश्रम तथा अनवरत उत्साह के साथ जन-मानस में उत्कृष्टता भरने के लिए संलग्न रहना । साधु-ब्राह्मण और वानप्रस्थों की यही परम्परा एवं कर्म पद्धति थी । उनकी संख्या जितनी बढ़ती थी उसी अनुपात से राष्ट्रीय जीवन की हर दिशा में समृद्धि का अभिवर्द्धन होता चलता था । यही रहस्य था अपने गौरवमय इतिहास का । दुर्भाग्य ही कहना चाहिए, कि वे तीनों ही संस्थाएँ आज नष्ट हो गई । ब्राह्मण, साधु और वानप्रस्थ तीनों ही दिखाई नहीं पड़ते । उनकी तस्वीरें और प्रतिमाएँ बड़ी संख्या में घूमती- फिरती नजर आती हैं पर उनका लक्ष्य, आदर्श और कर्त्तव्य सर्वथा विपरित हो गया, ऐसी दशा में उनकी उपयोगिता भी नष्ट हो गई । 

दुर्भाग्य का रोना-रोने से काम न चलेगा । अभाव की पूर्ति दूसरी तरह करनी होगी । हम गृहस्थ लोग ही थोड़ा थोड़ा समय निकाल कर लोक-मंगल की सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्द्धन करना अपना धर्म कर्त्तव्य समझें और उसके लिए निरन्तर कुछ न कुछ योगदान देने के लिए तत्परता प्रकट करने लगें तो उस आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है, जिस पर प्रगति का सारा आधार अवलम्बित है । आवश्यकता ऐसे लोगों की है, जिनके अन्त:करण में देशभक्ति, समाज-सेवा एवं लोक-मंगल के लिए कुछ करने की उमंग भरी भावनाएँ लहरा रही हों । ऐसे ही नर-रत्न अपना जीवन धन्य करते हैं, अपने समय की महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ सम्पादित करते हैं ।

देशभक्त नवनिर्माण के कार्य में जुट जाए
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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Tradition is a gift of past and transformation is a symbol of future. Man is related to the present more than the past or future. Man has to live in present. Treasure of past cannot be used in any work, and the dreams of future are also useless. Man should build his present, but the essential ingredients used for this purpose are not available in present. These has to be collected from the past experiences and the imaginations of the future. Building of present can be built on the bed-rocks of past and future. 

-Pt. Shriram Sharma Acharya

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