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ऋषि चिंतन

motivation

यदि कर्म का फल तुरन्त नहीं मिलता तो इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गयें ।

कर्म-फल एक ऐसा अमिट तथ्य है जो आज नहीं तो कल भुगतना अवश्य ही पड़ेगा । कभी-कभी इन परिणामों में देर इसलिये होती है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा करना चाहता है कि व्यक्ति अपने कर्तव्य-धर्म समझ सकने और निष्ठापूर्वक पालन करने लायक विवेक बुद्धि संचित कर सका या नहीं । जो दण्ड भय से डरे बिना दुष्कर्मों से बचना मनुष्यता का गौरव समझता है और सदा सत्कर्मों तक ही सीमित रहता है, समझना चाहिए कि उसने सज्जनता की परीक्षा पास कर ली और पशुता से देवत्व की और बढऩे का शुभारम्भ कर दिया ।
लाठी के बल पर जानवरों को इस या उस रास्ते पर चलाया जाता है और अगर ईश्वर भी बलपूर्वक अमुक मार्ग पर चलने के लिए विवश करता तो फिर मनुष्य भी पशुओं की श्रेणी में आता, इससे उसकी स्वतंत्र आत्म-चेतना विकसित हुई या नहीं इसका पता ही नहीं चलता । भगवान ने मनुष्य को भले या बुरे कर्म करने की स्वतंत्रता इसीलिए प्रदान की है कि वह अपने विवेक को विकसित करके भले-बुरे का अन्तर करना सीखे और दुष्परिणामों के शोक-संतापों से बचने एवं सत्परिणामों का आनन्द लेने के लिए स्वत: अपना पथ निर्माण कर सकने में समर्थ हो ।

अतएव परमेश्वर के लिए यह उचित ही था कि मनुष्य को अपना सबसे बड़ा बुद्धिमान और सबसे जिम्मेदार बेटा समझकर उसे कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान करे और यह देखे कि वह मनुष्यता का उत्तरदायित्व सम्भाल सकने मे समर्थ है या नहीं ?

परीक्षा के बिना वास्तविकता का पता भी कैसे चलता और उसे अपनी इस सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य में कितने श्रम की सार्थकता हुई यह कैसे अनुभव होता । आज नहीं तो कल उसकी व्यवस्था के अनुसार कर्मफल मिलकर ही रहेगा । देर हो सकती है अन्धेर नहीं । ईश्वरीय कठोर व्यवस्था, उचित न्याय और उचित कर्म-फल के आधार पर ही बनी हुई है सो तुरन्त न सही कुछ देर बाद अपने कर्मों का फल भोगने के लिए हर किसी को तैयार रहना चाहिए ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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motivation

मन का स्वभाव है कि…  वह किसी बात पर अधिक समय स्थिर नहीं रहता और उचटकर बार-बार इधर-उधर उड़ता है । आप किसी बात को सोचना चाहते हैं, किंतु मन उस पर नहीं जमता । ऐसी दशा में उस चिंतनीय विषय का कोई ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो सकेगा । इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होने पर उत्तम मस्तिष्क वाले भी उतना काम नहीं कर सकते जितना कि साधारण मस्तिष्क के किंतु स्थिर चित्त वाले कर सकते हैं । कोई मनुष्य कितना ही चतुर क्यों न हो, यदि उसके मन को उचटने की आदत है और इच्छित विषय में एकाग्र नहीं होता, तो उसकी चतुरता किसी काम न आवेगी और उसके निर्णय अपूर्ण एवं असंतोषजनक होंगे ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

Mental Stability

It is the nature of mind that it does not stay on one topic for a long time and keeps wandering off aimlessly.

This restless tendency gets in the way of critical thinking and is a huge obstacle in the way of thoughtful, well reasoned decision making.

A brilliant and highly distracted mind performs poorly compared to an average yet calm mind.

No matter how smart we are, if our minds wander and are continuously distracted, our intelligence will be of little use and our decisions will be incomplete and unsatisfactory.
-Pt. Shriram Sharma Acharya
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तुम व्यर्थ में दूसरों के अनर्थकारी संदेशों को ग्रहण कर लेते हो। तुम वह सच मान बैठते हो, जो दूसरे कहते हैं। तुम स्वयं अपने आप को दु:खी करते हो कि दूसरे लोग हमें चैन नहीं लेने देते। तुम स्वयं ही दु:ख का कारण हो, स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो किसी ने कुछ कह दिया, तुमने मान लिया। यही कारण है कि तुम उद्विग्न रहते हो।

सच्चा मनुष्य एक बार उत्तम संकल्प करने के लिए यह नहीं देखता कि लोग क्या कह रहे हैं। वह अपनी धुन का पक्का होता है। सुकरात के सामने जहर का प्याला रखा गया, पर उसकी राय को कोई न बदल सका। बंदा बैरागी को भेड़ों की खाल पहना कर काले मुँह गली-गली फिराया गया, किन्तु उसने दूसरों की राय न मानी।

दूसरे के इशारों पर नाचना, दूसरों के सहारे पर निर्भर रहना, दूसरों की झूठी टीका-टिप्पणी से उद्विग्न होना मानसिक दुर्बलता है। जब तक मनुष्य स्वयं अपना स्वामी नहीं बन जाता, तब तक उसका संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। दूसरों का अनुकरण करने से मनुष्य अपनी मौलिकता से हाथ धो बैठता है।

स्वयं विचार करना सीखो। दूसरों के बहकावे में न आओ। कर्तव्य-पथ पर बढ़ते हुए, दूसरे क्या कहते हैं, इसकी चिंता न करो। यदि ऐसा करने का साहस तुम में नहीं है, तो जीवन भर दासत्व के बंधनों में जकड़े रहोगे।

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ऐसा सबसे उपयुक्त साथी जो निरंतर मित्र, सखा, सेवक, गुरु, सहायक की तरह हर घड़ी प्रस्तुत रहे और बदले में कुछ भी प्रत्युपकार न माँगे, केवल एक ईश्वर ही हो सकता है।

ईश्वर को जीवन का सहचर बना लेने से मंजिल इतनी मंगलमय हो जाती है कि यह धरती ही ईश्वर के लोक, स्वर्ग जैसी आनंदयुक्त प्रतीत होने लगती है। 

यों ईश्वर सबके साथ है और वह सबकी सहायता भी करता है, पर जो उसे समझते हैं, वास्तविक लाभ उन्हें ही मिल पाता है। किसी के घर में सोना गड़ा है और उसे वह प्रतीत न हो, तो गरीबी ही अनुभव होती रहेगी, किंतु यदि मालूम हो कि घर में इतना सोना है, तो उसका भले ही उपयोग न किया जाए, मन में अमीरी का गर्व और विश्वास बना रहेगा। ईश्वर को भूले रहने पर हमें अकेलापन प्रतीत होता है, पर जब उसे अपने रोम-रोम में समाया हुआ, अजस्र प्रेम और सहयोग बरसाता हुआ अनुभव करते हैं, तो साहस हजारों गुना अधिक हो जाता है। आशा और विश्वास से हृदय हर घड़ी भरा रहता है। जिसने ईश्वर को भुला रखा है, अपने बलबूते पर ही सब कुछ करता है और सोचता है, उसे जिंदगी बहुत भारी प्रतीत होती है। इतना वजन उठाकर चलने में उसके पैर लडख़ड़ाने लगते हैं। अपने साधनों में कमी दीखने पर भविष्य अंधकारमय प्रतीत होने लगता है। जिसे ईश्वर पर विश्वास है, वह सदा यही अनुभव करेगा कि कोई बड़ी शक्ति मेरे साथ है। जहाँ अपना बल थकेगा, उसका बल मिलेगा। 
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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ऐसी सामाजिक रीति-नीति, प्रथा-परम्परा हमें विकसित करनी चाहिए । धन का मान घटाया जाय और मनुष्य का मूल्यांकन उसके उच्च-चरित्र एवं लोक-मंगल के लिए प्रस्तुत किये त्याग, बलिदान के आधार पर किया जाये । सभी को सम्मान इसी आधार पर मिले । कोई व्यक्ति कितना ही धनी क्यों न हो इस कारण सम्मान प्राप्त न कर सके कि वह दौलत का अधिपति है । उचित तो यह है कि ऐसे लोगों का मूल्य और सम्मान लोक-सेवियों की तुलना में बहुत घटाकर रखा जाय । धन के कारण सम्मान मिलने से लोग अधिक अमीर बनने और किसी भी उपाय से पैसा कमाने को प्रेरित होते हैं । यदि धन का सम्मान गिर जाय, संग्रह को कंजूसी और स्वार्थपरता का प्रतीक मानकर तिरस्कृत किया जाय तो फिर लोग धन के पीछे पागल फिरने की अपेक्षा-सामाजिक सम्मान प्राप्त करने के लिए सत्कर्मों की और प्रवृत होने लगेंगे ।

सादगी को सराहा जाय और उद्धत वेशभूषा एवं भडक़ीली श्रृंगार-सज्जा एवं चित्र-विचित्र बनावट को ओछेपन का प्रतीक माना जाय और जो बचकानी श्रृंगारिकता, भौंड़ी फैशन, अर्द्धनग्ना, हिप्पी साज-सज्जा पनपी है उसे तिरस्कृत किया जाना चाहिए । केवल सत्त्प्रवृत्तियॉं सराही जायें, उन्हीं की चर्चा की जाये और उन्हीं को ही सम्मानित किया जाय ।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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ईश्वर और परलोक आदि के मानने की बात मुँह से न कहिये । जीवन से न कहकर मुँह से कहना अपने को और दुनिया को धोखा देना है । हममें से अधिकांश ऐसे धोखेबाज ही हैं । इसलिये हम कहा करते है कि हजार में नौ-सौ निन्यानवे व्यक्ति ईश्वर को नहीं मानते । मानते होते तो जगत में पाप दिखाई न देता ।

अगर हम ईश्वर को मानते तो क्या अँधेरे में पाप करते ? समाज या सरकार की आँखों में धूल झोंकते ? उस समय क्या यह न मानते कि ईश्वर की आँखों में धूल नहीं झोंकी गई ? हममें से कितने आदमी ऐसे हैं जो दूसरों को धोखा देते समय यह याद रखते हों कि ईश्वर की आँखें सब देख रही हैं ? अगर हमारे जीवन में यह बात नहीं है, तो ईश्वर की दुहाई देकर दूसरों से झगड़ना हमें शोभा नहीं देता ।

धर्म तत्त्व का दर्शन एवं मर्म (53)-2.70″
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 
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संसार की हर एक जड़ चेतन वस्तु चाहती है कि मेरे साथ सद्व्यवहार हो । जिसके साथ दुर्व्यवहार करेंगे वही बदला लेगी । अगर छाते को लापरवाही से पटक देंगे तो जरूरत पड़ने पर उसकी तानें टूटी और कपड़ा फटा पायेंगे । जूते के साथ लापरवाही बरतेंगे तो वह या तो काट लेगा या जल्दी टूट जायेगा । सूई को यहाँ-वहाँ पटक देंगे तो वह पैर में चुभ कर अपनी उपेक्षा का बदला लेगी, कपड़े उतार कर जहाँ-तहाँ डाल देंगे तो दुबारा तलाश करने पर वे मैले, सलवट पड़े हुए, दाग-धब्बे युक्त मिलेंगे । यदि आप घर की सब वस्तुओं को संभाल कर रखेंगे तो वे समय पर सेवा करने के लिए हाजिर मिलेंगी । इसी प्रकार स्त्री, पुरुष, भाई, बहिन, माता, पिता, मित्र, सम्बन्धी, परिचित, अपरिचित यदि आपसे भलमनसाहत का व्यवहार पायेंगे तो बदले में उसी प्रकार का वर्ताव लौटा देंगे ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

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भौतिकता और आध्यात्मिकता परस्पर दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं । एक के बिना दूसरी अधूरी है । जंगल में गुफा में रहने वाले विरक्त महात्मा का भी भोजन, प्रकाश, माला, कमण्डल, आसन, खड़ाऊँ, पुस्तक, कम्बल, आग आदि वस्तुओं की आवश्यकता रहेगी ही, इनके बिना उसका जीवित रहना भी सम्भव न रहेगा । इतनी भौतिकता तो गुफा निवासी महात्मा को भी बरतनी पड़ेगी और अपने परिवार के प्रति प्रेम और त्याग बरतने की आध्यात्मिकता चोर-उठाईगीर और निरन्तर भौतिकवादी को भी रखनी पड़ेगी । भौतिकता को तमतत्व और आध्यात्मिकता को सततत्व, माना गया है । दोनों के मिलने से रजतत्व बना है । इसी में मानव की स्थिति हैं । एक के भी समाप्त जाने पर मनुष्य का रूप नहीं रहता । तम नष्ट होकर सत ही रह जाए तो व्यक्ति देवता या परमहंस होगा । यदि सत नष्ट होकर तम ही रह जाए तो असुरता या पैशाचिकता ही बची होगी । दोनों स्थितियों में मनुष्यत्व का व्यतिरेक हो जाएगा ।

इसलिए मानव जीवन की स्थिति जब तक है, तब तक भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों ही साथ-साथ रहती हैं । अन्तर केवल प्राथमिकता का है । सज्जनों के लिए आध्यात्मिकता ही प्रमुख रहती है, वे उसकी रक्षा के लिए भौतिक आधार की बहुत अंशों तक उपेक्षा भी कर सकते हैं । इस प्रकार दुर्जंनों के लिए भौतिकता का स्थान पहला है । वे उस प्रकार के लाभों के लिए आध्यात्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन भी कर देते हैं । इतने पर भी दोनों ही प्रकृति के लोग किसी न किसी रूप में भौतिक और आत्मिक तथ्यों को अपनाते ही हैं, या उन्हें अपनाये ही रहना पड़ता ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना – दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (२.५४)

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Spirituality and Materialism are both mutually connected. One is incomplete without the other. The saint, even when living in a cave in the jungle, needs food, fire, clothes, carpet, books, blanket, utensils, and many amenities without which it is difficult for him to survive. So, some materialism is being practiced even by those deemed highly spiritual.On the other hand, even the extreme materialists such as robbers practice some spirituality in the form of love and sacrifice for their families and loved ones. Amongst the three attributes (three Gunas: Sattva, Rajas, Tamas) spiritualism is considered as Sattvik (= pure or, divine) whereas materialism is considered as Tamasik (dark, impure, or ignorant).The combination of the two extremes is Rajas, associated with force, energy, and a desire to act. The dynamics of the universe is maintained by a perfect balance of these three attributes. If Tamas is destroyed, man will become God and if Sattva is removed, the man will become a devil. In either case, the human nature is lost. Humanity lies in the delicate balance of the extremes. Therefore, so long as human life exists, materialism and spirituality will both co-exist in man. Giving a higher priority to one is what makes all the difference. For the generous and kind people, spirituality is the primary preference, to the extent that they might end up neglecting the material basis of all things. On the other hand, the selfish people prefer materialism so strongly that they transgress all the ethical limits set by spirituality. 

In spite of these facts, each of the two types of people – whether materialist or spiritualist, accept the other viewpoint and are often compelled to consider it. 

-Pt. Shriram Sharma Acharya
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सुख-सुविधा की साधन-सामग्री बढ़ाकर संसार में सुख-शान्ति और प्रगति होने की बात सोची जा रही है और उसी के लिए सब कुछ किया जा रहा है पर साथ ही हमें यह भी सोच लेना चाहिए कि समृद्धि तभी उपयोगी हो सकती है जब उसके साथ-साथ भावनात्मक स्तर भी ऊँचा उठता चले, यदि भावनाएँ निकृष्ट स्तर की रहें तो बढ़ी हुई सम्पत्ति उलटी विपत्ति का रूप धारण कर लेती है । दुर्बुद्धिग्रस्त मनुष्य अधिक धन पाकर उसका उपयोग अपने दोष-दुर्गुण बढ़ाने में ही करते हैं । अन्न का दुर्भिक्ष पड़ जाने पर लोग पत्ते और छालें खाकर जीवित रह लेते हैं पर भावनाओं का दुर्भिक्ष पडऩे पर यहॉँ नारकीय व्यथा-वेदनाओं के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रहता ।

सम्पन्न लोगों का जीवन निर्धनों की अपेक्षा कलुषित होता है, उसके विपरीत प्राचीनकाल में ऋषियों ने अपने जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करके यह सिद्ध किया था कि गरीबी की जीवन व्यवस्था में भी उत्कृष्ट जीवन जीना संभव हो सकता है । यहाँ सम्पन्नता एवं समृद्धि का विरोध नहीं किया जा रहा है, हमारा प्रयोजन केवल इतना ही है भावना स्तर ऊँचा उठने के साथ-साथ समृद्धि बढ़ेगी तो उसका सदुपयोग होगा और तभी उससे व्यक्ति एवं समाज की सुख-शान्ति बढ़ेगी । भावना स्तर की उपेक्षा करके यदि सम्पत्ति पर ही जोर दिया जाता रहा तो दुर्गुणी लोग उस बढ़ोत्तरी का उपयोग विनाश के लिए ही करेंगे । बन्दर के हाथ में गई हुई तलवार किसी का क्या हित साधन कर सकेगी ?

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना – दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.३३)

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