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विशिष्ट लेख

यज्ञ शब्द के तीन अर्थ हैं- १- देवपूजा, २-दान, ३-संगतिकरण । संगतिकरण का अर्थ है-संगठन । यज्ञ का एक प्रमुख उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को सत्प्रयोजन के लिए संगठित करना भी है । इस युग में संघ शक्ति ही सबसे प्रमुख है । परास्त देवताओं को पुनः विजयी बनाने के लिए प्रजापति ने उसकी पृथक्-पृथक् शक्तियों का एकीकरण करके संघ-शक्ति के रूप में दुर्गा शक्ति का प्रादुर्भाव किया था । उस माध्यम से उसके दिन फिरे और संकट दूर हुए । मानवजाति की समस्या का हल सामूहिक शक्ति एवं संघबद्धता पर निर्भर है, एकाकी-व्यक्तिवादी-असंगठित लोग दुर्बल और स्वार्थी माने जाते हैं । गायत्री यज्ञों का वास्तविक लाभ सार्वजनिक रूप से, जन सहयोग से सम्पन्न कराने पर ही उपलब्ध होता है ।

यज्ञ का तात्पर्य है- त्याग, बलिदान, शुभ कर्म । अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान् सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है । वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है । हवन हुए पदार्थ् वायुभूत होकर प्राणिमात्र को प्राप्त होते हैं और उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं । यज्ञ काल में उच्चरित वेद मंत्रों की पुनीत शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंतःकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती है । इस प्रकार थोड़े ही खर्च एवं प्रयतन से यज्ञकर्ताओं द्वारा संसार की बड़ी सेवा बन पड़ती है ।

वैयक्तिक उन्नति और सामाजिक प्रगति का सारा आधार सहकारिता, त्याग, परोपकार आदि प्रवृत्तियों पर निर्भर है । यदि माता अपने रक्त-मांस में से एक भाग नये शिशु का निर्माण करने के लिए न त्यागे, प्रसव की वेदना न सहे, अपना शरीर निचोड़कर उसे दूध न पिलाए, पालन-पोषण में कष्ट न उठाए और यह सब कुछ नितान्त निःस्वार्थ भाव से न करे, तो फिर मनुष्य का जीवन-धारण कर सकना भी संभव न हो । इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य का जन्म यज्ञ भावना के द्वारा या उसके कारण ही संभव होता है । गीताकार ने इसी तथ्य को इस प्रकार कहा है कि प्रजापति ने यज्ञ को मनुष्य के साथ जुड़वा भाई की तरह पैदा किया और यह व्यवस्था की, कि एक दूसरे का अभिवर्धन करते हुए दोनों फलें-फूलें ।

यदि यज्ञ भावना के साथ मनुष्य ने अपने को जोड़ा न होता, तो अपनी शारीरिक असमर्थता और दुर्बलता के कारण अन्य पशुओं की प्रतियोगिता में यह कब का अपना अस्तित्व खो बैठा होता । यह जितना भी अब तक बढ़ा है, उसमें उसकी यज्ञ भावना ही एक मात्र माध्यम है । आगे भी यदि प्रगति करनी हो, तो उसका आधार यही भावना होगी ।

प्रकृति का स्वभाव यज्ञ परंपरा के अनुरूप है । समुद्र बादलों को उदारतापूर्वक जल देता है, बादल एक स्थान से दूसरे स्थान तक उसे ढोकर ले जाने और बरसाने का श्रम वहन करते हैं । नदी, नाले प्रवाहित होकर भूमि को सींचते और प्राणियों की प्यास बुझाते हैं । वृक्ष एवं वनस्पतियाँ अपने अस्तित्व का लाभ दूसरों को ही देते हैं । पुष्प और फल दूसरे के लिए ही जीते हैं । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, वायु आदि की क्रियाशीलता उनके अपने लाभ के लिए नहीं, वरन् दूसरों के लिए ही है । शरीर का प्रत्येक अवयव अपने निज के लिए नहीं, वरन् समस्त शरीर के लाभ के लिए ही अनवरत गति से कार्यरत रहता है । इस प्रकार जिधर भी दृष्टिपात किया जाए, यही प्रकट होता है कि इस संसार में जो कुछ स्थिर व्यवस्था है, वह यज्ञ वृत्ति पर ही अवलम्बित है । यदि इसे हटा दिया जाए, तो सारी सुन्दरता, कुरूपता में और सारी प्रगति, विनाश में परिणत हो जायेगी । ऋषियों ने कहा है- यज्ञ ही इस संसार चक्र का धुरा है । धुरा टूट जाने पर गाड़ी का आगे बढ़ सकना कठिन है । 

यज्ञीय विज्ञान 
मन्त्रों में अनेक शक्ति के स्रोत दबे हैं । जिस प्रकार अमुक स्वर-विन्यास ये युक्त शब्दों की रचना करने से अनेक राग-रागनियाँ बजती हैं और उनका प्रभाव सुनने वालों पर विभिन्न प्रकार का होता है, उसी प्रकार मंत्रोच्चारण से भी एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगें निकलती हैं और उनका भारी प्रभाव विश्वव्यापी प्रकृति पर, सूक्ष्म जगत् पर तथा प्राणियों के स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों पर पड़ता है ।

यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्त्व वायुमण्डल में फैलाये जाते हैं, उनसे हवा में घूमते असंख्यों रोग कीटाणु सहज ही नष्ट होते हैं । डी.डी.टी., फिनायल आदि छिड़कने, बीमारियों से बचाव करने वाली दवाएँ या सुइयाँ लेने से भी कहीं अधिक कारगर उपाय यज्ञ करना है । साधारण रोगों एवं महामारियों से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है । दवाओं में सीमित स्थान एवं सीमित व्यक्तियों को ही बीमारियों से बचाने की शक्ति है; पर यज्ञ की वायु तो सर्वत्र ही पहुँचती है और प्रयतन न करने वाले प्राणियों की भी सुरक्षा करती है । मनुष्य की ही नहीं, पशु-पक्षियों, कीटाणुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों के आरोग्य की भी यज्ञ से रक्षा होती है ।

यज्ञ की ऊष्मा मनुष्य के अंतःकरण पर देवत्व की छाप डालती है । जहाँ यज्ञ होते हैं, वह भूमि एवं प्रदेश सुसंस्कारों की छाप अपने अन्दर धारण कर लेता है और वहाँ जाने वालों पर दीर्घकाल तक प्रभाव डालता रहता है । प्राचीनकाल में तीर्थ वहीं बने हैं, जहाँ बड़े-बड़े यज्ञ हुए थे । जिन घरों में, जिन स्थानों में यज्ञ होते हैं, वह भी एक प्रकार का तीर्थ बन जाता है और वहाँ जिनका आगमन रहता है, उनकी मनोभूमि उच्च, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनती हैं । महिलाएँ, छोटे बालक एवं गर्भस्थ बालक विशेष रूप से यज्ञ शक्ति से अनुप्राणित होते हैं । उन्हें सुसंस्कारी बनाने के लिए यज्ञीय वातावरण की समीपता बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है ।

कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मों से विकृत मनोभूमि में यज्ञ से भारी सुधार होता है । इसलिए यज्ञ को पापनाशक कहा गया है । यज्ञीय प्रभाव से सुसंस्कृत हुई विवेकपूर्ण मनोभूमि का प्रतिफल जीवन के प्रत्येक क्षण को स्व्ार्गीय आनन्द से भर देता है, इसलिए यज्ञ को स्वर्ग देने वाला कहा गया है ।

यज्ञीय धर्म प्रक्रियाओं में भाग लेने से आत्मा पर चढ़े हुए मल-विक्षेप दूर होते हैं । फलस्वरूप तेजी से उसमें ईश्वरीय प्रकाश जगता है । यज्ञ से आत्मा में ब्राह्मण तत्त्व, ऋषि तत्त्व की वृद्धि दिनानु-दिन होती है और आत्मा को परमात्मा से मिलाने का परम लक्ष्य बहुत सरल हो जाता है । आत्मा और परमात्मा को जोड़ देने का, बाँध देने का कार्य यज्ञाग्नि द्वारा ऐसे ही होता है, जैसे लोहे के टूटे हुए टुकड़ों को बैल्डिंग की अग्नि जोड़ देती है । ब्राह्मणत्व यज्ञ के द्वारा प्राप्त होता है । इसलिए ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए एक तिहाई जीवन यज्ञ कर्म के लिए अर्पित करना पड़ता है । लोगों के अंतःकरण में अन्त्यज वृत्ति घटे-ब्राह्मण वृत्ति बढ़े, इसके लिए वातावरण में यज्ञीय प्रभाव की शक्ति भरना आवश्यक है ।

विधिवत् किये गये यज्ञ इतने प्रभावशाली होते हैं, जिसके द्वारा मानसिक दोषों-र्दुगुणों का निष्कासन एवं सद्भावों का अभिवर्धन नितान्त संभव है । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, कायरता, कामुकता, आलस्य, आवेश, संशय आदि मानसिक उद्वेगों की चिकित्सा के लिए यज्ञ एक विश्वस्त पद्धति है । शरीर के असाध्य रोगों तक का निवारण उससे हो सकता है ।

अग्निहोत्र के भौतिक लाभ भी हैं । वायु को हम मल, मूत्र, श्वास तथा कल-कारखानों के धुआँ आदि से गन्दा करते हैं । गन्दी वायु रोगों का कारण बनती है । वायु को जितना गन्दा करें, उतना ही उसे शुद्ध भी करना चाहिए । यज्ञों से वायु शुद्ध होती है । इस प्रकार सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा का एक बड़ा प्रयोजन सिद्ध होता है ।

यज्ञ का धूम्र आकाश में-बादलों में जाकर खाद बनकर मिल जाता है । वर्षा के जल के साथ जब वह पृथ्वी पर आता है, तो उससे परिपुष्ट अन्न, घास तथा वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनके सेवन से मनुष्य तथा पशु-पक्षी सभी परिपुष्ट होते हैं । यज्ञाग्नि के माध्यम से शक्तिशाली बने मन्त्रोच्चार के ध्वनि कम्पन, सुदूर क्षेत्र में बिखरकर लोगों का मानसिक परिष्कार करते हैं, फलस्वरूप शरीरों की तरह मानसिक स्वास्थ्य भी बढ़ता है ।

अनेक प्रयोजनों के लिए-अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए, अनेक विधानों के साथ, अनेक विशिष्ट यज्ञ भी किये जा सकते हैं । दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ करके चार उत्कृष्ट सन्तानें प्राप्त की थीं, अग्निपुराण में तथा उपनिषदों में वर्णित पंचाग्नि विद्या में ये रहस्य बहुत विस्तारपूर्वक बताये गये हैं । विश्वामित्र आदि ऋषि प्राचीनकाल में असुरता निवारण के लिए बड़े-बड़े यज्ञ करते थे । राम-लक्ष्मण को ऐसे ही एक यज्ञ की रक्षा के लिए स्वयं जाना पड़ा था । लंका युद्ध के बाद राम ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे । महाभारत के पश्चात् कृष्ण ने भी पाण्डवों से एक महायज्ञ कराया था, उनका उद्देश्य युद्धजन्य विक्षोभ से क्षुब्ध वातावरण की असुरता का समाधान करना ही था । जब कभी आकाश के वातावरण में असुरता की मात्रा बढ़ जाए, तो उसका उपचार यज्ञ प्रयोजनों से बढ़कर और कुछ हो नहीं सकता । आज पिछले दो महायुद्धों के कारण जनसाधारण में स्वार्थपरता की मात्रा अधिक बढ़ जाने से वातावरण में वैसा ही विक्षोभ फिर उत्पन्न हो गया है । उसके समाधान के लिए यज्ञीय प्रक्रिया को पुनर्जीवित करना आज की स्थिति में और भी अधिक आवश्यक हो गया है । 

यज्ञीय प्रेरणाएँ 
यज्ञ आयोजनों के पीछे जहाँ संसार की लौकिक सुख-समृद्धि को बढ़ाने की विज्ञान सम्मत परंपरा सन्निहित है-जहाँ देव शक्तियों के आह्वान-पूजन का मंगलमय समावेश है, वहाँ लोकशिक्षण की भी प्रचुर सामग्री भरी पड़ी है । जिस प्रकार ‘बाल फ्रेम’ में लगी हुई रंगीन लकड़ी की गोलियाँ दिखाकर छोटे विद्यार्थियों को गिनती सिखाई जाती है, उसी प्रकार यज्ञ का दृश्य दिखाकर लोगों को यह भी समझाया जाता है कि हमारे जीवन की प्रधान नीति ‘यज्ञ’ भाव से परिपूर्ण होनी चाहिए । हम यज्ञ आयोजनों में लगें-परमार्थ परायण बनें और जीवन को यज्ञ परंपरा में ढालें । हमारा जीवन यज्ञ के समान पवित्र, प्रखर और प्रकाशवान हो । गंगा स्नान से जिस प्रकार पवित्रता, शान्ति, शीतलता, आदरता को हृदयंगम करने की प्रेरणा ली जाती है, उसी प्रकार यज्ञ से तेजस्विता, प्रखरता, परमार्थ-परायणता एवं उत्कृष्टता का प्रशिक्षण मिलता है । यज्ञ की प्रक्रिया को जीवन यज्ञ का एक रिहर्सल कहा जा सकता है । अपने घी, शक्कर, मेवा, औषधियाँ आदि बहुमूल्य वस्तुएँ जिस प्रकार हम परमार्थ प्रयोजनों में होम करते हैं, उसी तरह अपनी प्रतिभा, विद्या, बुद्धि, समृद्धि, सार्मथ्य आदि को भी विश्व मानव के चरणों में समर्पित करना चाहिए । इस नीति को अपनाने वाले व्यक्ति न केवल समाज का, बल्कि अपना भी सच्चा कल्याण करते हैं । संसार में जितने भी महापुरुष, देवमानव हुए हैं, उन सभी को यही नीति अपनानी पड़ी है । जो उदारता, त्याग, सेवा और परोपकार के लिए कदम नहीं बढ़ा सकता, उसे जीवन की सार्थकता का श्रेय और आनन्द भी नहीं मिल सकता ।

यज्ञीय प्रेरणाओं का महत्त्व समझाते हुए ऋग्वेद में यज्ञाग्नि को पुरोहित कहा गया है । उसकी शिक्षाओं पर चलकर लोक-परलोक दोनों सुधारे जा सकते हैं । 

वे शिक्षाएँ इस प्रकार हैं-
१- जो कुछ हम बहुमूल्य पदार्थ अग्नि में हवन करते हैं, उसे वह अपने पास संग्रह करके नहीं रखती, वरन् उसे सर्वसाधारण के उपयोग के लिए वायुमण्डल में बिखेर देती है । ईश्वर प्रदत्त विभूतियों का प्रयोग हम भी वैसा ही करें, जो हमारा यज्ञ पुरोहित अपने आचरण द्वारा सिखाता है । हमारी शिक्षा, समृद्धि, प्रतिभा आदि विभूतियों का न्यूनतम उपयोग हमारे लिए और अधिकाधिक उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए ।

२- जो वस्तु अग्नि के सम्पर्क में आती है, उसे वह दुरदुराती नहीं, वरन् अपने में आत्मसात् करके अपने समान ही बना लेती है । जो पिछड़े या छोटे या बिछुड़े व्यक्ति अपने सम्पर्क में आएँ, उन्हें हम आत्मसात् करने और समान बनाने का आदर्श पूरा करें ।

३- अग्नि की लौ कितना ही दबाव पड़ने पर नीचे की ओर नहीं होती, वरन् ऊपर को ही रहती है । प्रलोभन, भय कितना ही सामने क्यों न हो, हम अपने विचारों और कार्यों की अधोगति न होने दें । विषम स्थितियों में अपना संकल्प और मनोबल अग्नि शिखा की तरह ऊँचा ही रखें ।

४- अग्नि जब तक जीवित है, उष्णता एवं प्रकाश की अपनी विशेषताएँ नहीं छोड़ती । उसी प्रकार हमें भी अपनी गतिशीलता की गर्मी और धर्म-परायणता की रोशनी घटने नहीं देनी चाहिए । जीवन भर पुरुषार्थी और कर्त्तव्यनिष्ठ रहना चाहिए ।

५- यज्ञाग्नि का अवशेष भस्म मस्तक पर लगाते हुए हमें सीखना होता है कि मानव जीवन का अन्त मुट्ठी भर भस्म के रूप में शेष रह जाता है । इसलिए अपने अन्त को ध्यान में रखते हुए जीवन के सदुपयोग का प्रयत्न करना चाहिए ।

अपनी थोड़ी-सी वस्तु को वायुरूप में बनाकर उन्हें समस्त जड़-चेतन प्राणियों को बिना किसी अपने-पराये, मित्र-शत्रु का भेद किये साँस द्वारा इस प्रकार गुप्तदान के रूप में खिला देना कि उन्हें पता भी न चले कि किस दानी ने हमें इतना पौष्टिक तत्त्व खिला दिया, सचमुच एक श्रेष्ठ ब्रह्मभोज का पुण्य प्राप्त करना है, कम खर्च में बहुत अधिक पुण्य प्राप्त करने का यज्ञ एक सर्वोत्तम उपाय है ।

यज्ञ सामूहिकता का प्रतीक है । अन्य उपासनाएँ या धर्म-प्रक्रियाएँ ऐसी हैं, जिन्हें कोई अकेला कर या करा सकता है; पर यज्ञ ऐसा कार्य है, जिसमें अधिक लोगों के सहयोग की आवश्यकता है । होली आदि बड़े यज्ञ तो सदा सामूहिक ही होते हैं । यज्ञ आयोजनों से सामूहिकता, सहकारिता और एकता की भावनाएँ विकसित होती हैं ।

प्रत्येक शुभ कार्य, प्रत्येक पर्व-त्यौहार, संस्कार यज्ञ के साथ सम्पन्न होता है । यज्ञ भारतीय संस्कृति का पिता है । यज्ञ भारत की एक मान्य एवं प्राचीनतम वैदिक उपासना है । धार्मिक एकता एवं भावनात्मक एकता को लाने के लिए ऐसे आयोजनों की सर्वमान्य साधना का आश्रय लेना सब प्रकार दूरदर्शितापूर्ण है ।

गायत्री सद्बुद्धि की देवी और यज्ञ सत्कर्मों का पिता है । सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए गायत्री माता और यज्ञ पिता का युग्म हर दृष्टि से सफल एवं समर्थ सिद्ध हो सकता है । गायत्री यज्ञों की विधि-व्यवस्था बहुत ही सरल, लोकप्रिय एवं आकर्षक भी है । जगत् के दुर्बुद्धिग्रस्त जनमानस का संशोधन करने के लिए सद्बुद्धि की देवी गायत्री महामन्त्र की शक्ति एवं सार्मथ्य अद्भुत भी है और अद्वितीय भी ।

नगर, ग्राम अथवा क्षेत्र की जनता को धर्म प्रयोजनों के लिए एकत्रित करने के लिए जगह-जगह पर गायत्री यज्ञों के आयोजन करने चाहिए । गलत ढंग से करने पर वे महँगे भी होते हैं और शक्ति की बरबादी भी बहुत करते हैं । यदि उन्हें विवेक-बुद्धि से किया जाए, तो कम खर्च में अधिक आकर्षक भी बन सकते हैं और उपयोगी भी बहुत हो सकते हैं ।

अपने सभी कर्मकाण्डों, धर्मानुष्ठानों, संस्कारों, पर्वों में यज्ञ आयोजन मुख्य है । उसका विधि-विधान जान लेने एवं उनका प्रयोजन समझ लेने से उन सभी धर्म आयोजनों की अधिकांश आवश्यकता पूरी हो जाती है ।

लोकमंगल के लिए, जन-जागरण के लिए, वातावरण के परिशोधन के लिए स्वतंत्र रूप से भी यज्ञ आयोजन सम्पन्न किये जाते हैं । संस्कारों और पर्व-आयोजनों में भी उसी की प्रधानता है ।

प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी को यज्ञ प्रक्रिया से परिचित होना ही चाहिए । 

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गायत्री महामंत्र और उसका अर्थ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

भावार्थ उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ।

गायत्री उपासना हम सबके लिए अनिवार्य 

गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है । वेदों से लेकर धर्मशास्त्रों तक समस्त दिव्य ज्ञान गायत्री के बीजाक्षरों का ही विस्तार है । माँ गायत्री का आँचल पकड़ने वाला साधक कभी निराश नहीं हुआ । इस मंत्र के चौबीस अक्षर चौबीस शक्तियों-सिद्धियों के प्रतीक हैं । गायत्री उपासना करने वाले की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसा ऋषिगणों का अभिमत है ।

गायत्री वेदमाता हैं एवं मानव मात्र का पाप नाश करने की शक्ति उनमें है । इससे अधिक पवित्र करने वाला और कोई मंत्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है । भौतिक लालसाओं से पीड़ित व्यक्ति के लिए भी और आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु के लिए भी एकमात्र आश्रय गायत्री ही है । गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गए हैं, जो विधिपूर्वक उपासना करने वाले हर साधक को निश्चित ही प्राप्त होते हैं ।

भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को नित्य-नियमित गायत्री उपासना करनी चाहिए । विधिपूर्वक की गयी उपासना साधक के चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण करती है व विभिन्न विपत्तियों, आसन्न विभीषिकाओं से उसकी रक्षा करती है । प्रस्तुत समय संधिकाल का है । आगामी वर्षों में पूरे विश्व में तेजी से परिवर्तन होगा । इस विशिष्ट समय में की गयी गायत्री उपासना के प्रतिफल भी विशिष्ट होंगे । युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री के तत्त्वदर्शन को जन-जन तक पहुँचाया व उसे जनसुलभ बनाया है । प्रत्यक्ष कामधेनु की तरह इसका हर कोई पयपान कर सकता है । जाति, मत, लिंग भेद से परे गायत्री सार्वजनीन है । सबके लिए उसकी साधना करने व लाभ उठाने का मार्ग खुला हुआ है । 

गायत्री उपासना का विधि-विधान 

गायत्री उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है । हर स्थिति में यह लाभदायी है, परन्तु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकाण्डों के साथ की गयी उपासना अति फलदायी मानी गयी है । तीन माला गायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है । शौच-स्नान से निवृत्त होकर नियत स्थान, नियत समय पर, सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की जानी चाहिए ।

उपासना का विधि-विधान इस प्रकार है 

(१) ब्रह्म सन्ध्या – जो शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिए की जाती है । इसके अंतर्गत पाँच कृत्य करने होते हैं ।

(अ) पवित्रीकरण – बाएँ हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढँक लें एवं मंत्रोच्चारण के बाद जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें । 
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थांगतोऽपि वा । 
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ 
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।

(ब) आचमन – वाणी, मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें । हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाए । 
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा । 
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा । 
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा ।

(स) शिखा स्पर्श एवं वंदन – शिखा के स्थान को स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे । निम्न मंत्र का उच्चारण करें । 
ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते । 
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥

(द) प्राणायाम – श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है । श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं । प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए ।
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् । 
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । 
ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ ।

(य) न्यास – इसका प्रयोजन है-शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि देव-पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । बाएँ हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों को उनमें भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।
ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु । (मुख को)
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु । (नासिका के दोनों छिद्रों को)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु । (दोनों नेत्रों को)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । (दोनों कानों को)
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु । (दोनों भुजाओं को)
ॐ ऊर्वोमे ओजोऽस्तु । (दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु । (समस्त शरीर पर)

आत्मशोधन की ब्रह्म संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि साधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि हो तथा मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो । पवित्र-प्रखर व्यक्ति ही भगवान् के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते हैं ।

(२) देवपूजन – गायत्री उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतम्भरा गायत्री है । उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें । भावना करें कि साधक की प्रार्थना के अनुरूप माँ गायत्री की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापित हो रही है ।
ॐ आयातु वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि । 
गायत्रिच्छन्दसां मातः! ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते॥ 
ॐ श्री गायत्र्यै नमः । 
आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि, ततो नमस्कारं करोमि ।

(ख) गुरु – गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है । सद्गुरु के रूप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिवंदन करते हुए उपासना की सफलता हेतु गुरु आवाहन निम्न मंत्रोच्चारण के साथ करें ।

ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः । 
गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ 

अखण्डमंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम् । 
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ 

ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।

(ग) माँ गायत्री व गुरु सत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने हेतु पंचोपचार द्वारा पूजन किया जाता है । इन्हें विधिवत् संपन्न करें । जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य प्रतीक के रूप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं । एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पाँचों को समर्पित करते चलें । 
जल का अर्थ है – नम्रता-सहृदयता । 
अक्षत का अर्थ है – समयदान अंशदान । 
पुष्प का अर्थ है – प्रसन्नता-आंतरिक उल्लास । 
धूप-दीप का अर्थ है – सुगंध व प्रकाश का वितरण 
पुण्य-परमार्थ तथा नैवेद्य का अर्थ है – स्वभाव व व्यवहार में मधुरता-शालीनता का समावेश ।

ये पाँचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिए किये जाते हैं । कर्मकाण्ड के पीछे भावना महत्त्वपूर्ण है । 

(३) जप – गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः पंद्रह मिनट नियमित रूप से किया जाए । अधिक बन पड़े, तो अधिक उत्तम । होठ हिलते रहें, किन्तु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें । जप प्रक्रिया कषाय-कल्मषों-कुसंस्कारों को धोने के लिए की जाती है ।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए माला की जाय एवं भावना की जाय कि हम निरन्तर पवित्र हो रहे हैं । दुर्बुद्धि की जगह सद्बुद्धि की स्थापना हो रही है । 

(४) ध्यान – जप तो अंग-अवयव करते हैं, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है । साकार ध्यान में गायत्री माता के आँचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होने की भावना की जाती है । निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों को शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा रूपी अनुदान उतरने की भावना की जाती है, जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस क्रिया का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है । 

(५) सूर्यार्ध्यदान – विसर्जन-जप समाप्ति के पश्चात् पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में अर्ध्य रूप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है ।

ॐ सूर्यदेव! सहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते । 
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
ॐ सूर्याय नमः, 
आदित्याय नमः,
भास्कराय नमः॥

भावना यह करें कि जल आत्म सत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराट् ब्रह्म का तथा हमारी सत्ता-सम्पदा समष्टि के लिए समर्पित-विसर्जित हो रही है ।

इतना सब करने के बाद पूजा स्थल पर देवताओं को करबद्ध नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख दिया जाए । जप के लिए माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिए । सूर्योदय से दो घण्टे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री उपासना की जा सकती है । मौन-मानसिक जप चौबीस घण्टे किया जा सकता है । माला जपते समय तर्जनी उंगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें । 

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SHREE GAYATRI CHALISHA

DOHA

Hreem shreem kleem medha prabha 
jeevan jyoti prachand
Shanti, kranti, jagruti, pragati, 
rachana shakti akhand

Jagat janani, mangal karani, 
Gayatri sukhdham
Pranvo savitri, svadha, 
swaha puran kam
Invocation
O mother Gayatri, you pervade everywhere, as Goddess Saraswati in the form of “HRIM” beeja, as Goddess Laxmi in the form of “SHRIM” beeja, as Goddess Mahakali in the form of “KLIM” beeja. You stand omnipotent as the embodiment of intellect, touch of life. O mother, assuming the forms of peace, revolution, enlightenment, progress and inexhaustible power, you are the creator of everything. O universal mother Gayatri, you are the dispenser of all auspicious things to all. You are the abode of bliss. O Savitri, embodied in “OMKARA” O supreme power in the form of “SWAHA” and “SWADHA” O Gayatri, you are the fulfiller of all desired things.

Boor Bhuvaha Swaha Om Yut Janani 
Gayatri Nit Kalimal Dahani 
Akshar Chouvis Param Punita 
Inmein Base Shastra Shruti Gita 
Shasvat Satoguni Sat Rupa 
Satya Sanatan Sudha Anupa 
Hansarudh Sitamber Dhari 
Swarn Kanti Shuchi Gagan-Bihari

O Gayatri, incorporated in “OMKAR” and “Bhoorbhuvah Swaha” (Pranava- Sat-Chit-Anand), you are the remover of all impurities, arising through the impact of Kali. The twenty-four letters of the “Gayatri Mantra” are supremely holy. In them are embodied all the scriptures, Shrutis, and the Geeta. Having a Swan as her carrier, Gayatri, is clad in spotless white. Her lustrous form dazzles like gold. Betaker of the heavenly route O Mother, you are the embodiment of everlasting “Satwa Guna” as well as truth-incarnate and the dispenser of a unique nectar-like bliss.

Pustak, Pushp, Kamandalu, Mala 
Shubhra Varna Tanu Nayan Vishala
Dhyan Dharat Pulakit Hiy Hoi 
Sukha Upajat, Dukh Durmati Khoi
Kamdhenu Tum Sur Taru Chhaya 
Nirakar Ki Adbhut Maya
Tumhari Sharan Gahey Jo Koi 
Tarei Sakala Sankat So Soi

The book of the vedas, a lotus, a gourd and a rosary adorn each of the four hands respectively of mother Gayatri. She has a fair complexion, and has big eyes. One who meditates upon such a form of mother Gayatri, experiences a rare thrill. He is filled with happiness and all his miseries and evil intentions cease. O mother, you are like the desire-yielding cow, and grant the desired objects and aspirations of a person. O mother, though you are formless, your ‘Maya’ is amazing. Anyone who surrenders himself to you, is freed from all his troubles.

Saraswati Lakshmi Tum Kali 
Depai Tumhari Joyti Nirali
Tumhari Mahima Par Na Pavai 
Jo Sharad Shatmukh Gun Gavai
Char Ved Ki Matu Punita 
Tum Brahmani Gauri Sita
Mahamantra Jitne Jaga Mahin 
Kou Gayatri Sam Nahin

O mother Gayatri, you, who are the embodiment of Laxmi, Saraswati and Mahakali, have a splendor which is uniquely resplendent. Your prowess is limitless. Even if Goddess Saraswati were to extol your qualities even with her humdred mouths, she would not be able to do so properly. O holy mother, you are the mother of the four vedas. Brahmani, Gauri, and Sita are your manifestations only. Of all the existing mantras in the universe, there is none that can be at par with the greatness of this great Gayatri Mantra.

Sumirat Hiya Mein Gyan Prakashey 
Aalas Pap Avidya Nashey
Srushti Beej Jag Janani Bhavani 
Kalratri Varda Kalyani
Brahma Vishnu Rudra Sur Jete 
Tumso Paven Surata Te Te
Tum Bhaktan Ki Bhakt Tumhare 
Janani Hin Putra Pran Te Pyara

Thus the chanting of this great Gayatri Mantra gives rise to a great enlightenment in the heart. At the same time, idleness, sins, and wickedness are dispelled. O universal mother Bhavani, you are the primary fountain spring of the whole universal existence. O mother, you are the dark night of destruction too. At the same time, you are the benevolent mother showering bliss on one and all. O pristinely sanctifying mother, the godliness that is there in the three chief Gods, Brahma, Vishnu, and Mahesh has been attained by them through your grace. You are the sole mother of the devotees who are truly your children, one and all. O mother of the vedas, to a mother her children are ever dearer than life.

Mahima Aparampar Tumhari 
Jai Jai Jai Tripada Bhayhari
Purita Shakala Gyan Vigyana 
Tum Sam Adhik Na Jag mein Ana
Tumahi Jani Kachhu Rahey Na Shesha 
Tumahi Pae Kachhu Rahey Na Klesha
Janat Tumahi Tumahi Hai Jai 
Paras Parsi Kudhatu Suhai

O mother (of the Vedas), limitless is your greatness, victory, victory be to you! O Tripada (Gayatri), the dispelled of all the fears you are the fountain spring of all knowledge and sciences. Nothing in the world is, O mother, greater than you. O blessed mother, nothing else, remains to be known by him who has known you. O mother, no grief or troubles exist for him who has been fortunate enough to have your sight. Just as base iron turns into gold, at the touch of the paras (philosopher’s stone), in the same way one who knows you, becomes fully identified with you.

Tumhari Shakti Deepey Sab Thai 
Mata Tum Sab Thour Samai
Grah Nakshatra Brahmand Ghanere 
Sab Gativan Tumhare Prere
Sakala Srushti Ki Pran Vidhata 
Palak Poshak Nasak Trata
Mateswari Daya Vratdhari 
Tum San Tarain Pataki Bhari

O mother you are omnipresent and your sway pervades everywhere. All the heavenly bodies such as planets, stars – even this mighty universe – get their motivation when they are inspired through your grace. O mother, you are the creator and the sustainer of the whole creation. You maintain, nourish, and finally destroy all. Even the worst sinners committing the most heinous crimes are absolved through your grace. Thus being freed from all sins, they become sanctified.

Japar Krupa Tumhari Hoi 
Tapar Krupa Karey Saba Koi
Mand Buddhi Te Buddhi Bal Pavey 
Rogi Rog Rahit Ho Javein
Daridra Mitey, Katey Saba Pira 
Nashey Duhkh Harey Bhav Bhira
Gruh Klesha Chitt Chinta Bhari 
Nasai Gayatri Bhayahari

O mother Gayatri, a person lucky to be favored by your grace, becomes favored by all. Receiving your favor even the worst dullard becomes highly intelligent; similarly one afflicted with a disease is cured of his ailment, and an utter pauper gets rid of his poverty. Your grace protects one from terrible calamities. The worry of being caught in the cycle of birth and death ceases through your grace. O mother Gayatri, the redeemer from all the sins, frees a man from the terrible torments of domestic, strife, and other worries that eat away the very vitals of the heart.

Santati Heen Susantati Pavei 
Sukh Sampati Yut Moda Manavein
Bhoot Pishach Sabai Bhaya Khavein 
Yam Ke Dut Nikat Nahin Avein
Jo Sadhava Sumirein Chitta Lai 
Akshat Suhag Sada Sukhdai
Ghara Vara Sukhprada Lehein Kumari 
Vidhava Rahein Satyavratdhari

O Mother, childless persons, if they receive your favor through your remembrance get good issues and thus favored, they pass their days in a rich and blissful state. O fear dispelling mother, one gets rid of the fear from ghosts and evil spirits through your remembrance. The agents of the god of death, Yama, dare not come near one who worships you. Any woman with a husband living, enjoys the bliss of being in the unbroken conjugal state, if she remembers you sincerely. A virgin through your remembrance is endowed with a desirable husband of a good household, which makes her happy. A widow remembering you always, is able to remain constant in her vow of truth and good faith.

Jayati Jayati Jagdamba Bhavani 
Tum Sam Aur Dayalu Na Dani
Jo Sadguru So Deeksha Pavein 
So Sadguru Ko Safal Banavein
Sumiran Karein Suruchi Badbhagi 
Lahai Manorath Gruhi Viragi
Ashta Siddhi Nav Nidhi Ki Data 
Sab Samarth Gayatri Mata

O mother of the Universe, O Bhavani, victory be to you surely; there is none else so compassionate and the dispenser of all the desire. He who being initiated by a good guru with Gayatri, will have his aim of attaining accomplishment of his sadhana fully realized. Such a fortunate person, though he may be a householder or a renunciate, if he remembers mother Gayatri with love and devotion, will see all his desires are fulfilled by mother Gayatri. Eight types of accomplishments, and nine types of treasures are gifted to him by mother Gayatri, whose powers surpasses that of all other gods and goddesses.

Rishi, Muni, Yati, Tapasvi, Yogi 
Arat, Arthi, Chintit, Bhogi 
Jo Jo Sharan Tumhari Avein 
So So Mana Vanchhita Fala Pavein 
Bala, Buddhi, Vidya, Sheel Svabhau 
Dhan, Vaibhav, Yash, Tej, Uchhau 
Sakala Badhein Upajein Sukh Nana 
Jo Yah Path Karein Dhari Dhyana 

O merciful mother, you fulfill all the desires and grant all the expectations of all those who surrender themselves to you. Any one of these, be he a sage or a yati, an ascetic or a yogi, one performing penances or afflicted with a disease or one wishing to enjoy all the worldly pleasures or hankering for riddance from his anxieties, or longing for riches will have his wishes granted. If these forty verses are recited with a concentrated mind a person obtains strength, intellect, knowledge, good character, prosperity, wealth, and many other types of happiness.

Yeh Chalisha Bhaktiyut Path Kare Jo Koi
Tapar Krupa Prasannata Gayatri Ki Hoi

If these forty verses are recited with a concentrated mind, the person obtains strength, intellect, knowledge, good character, prosperity, wealth, and many other types of happiness.

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Gayatri is a Mantra, (Vedic hymn) which inspires righteous wisdom. The meaning of Gayatri Mantra is the Almighty God may illuminate our intellect which may lead us to righteous path. This is the most important teaching. All the problems of a person is solved if he is endowed with the gift of righteous wisdom. Having endowed with far sighted wisdom, a man is neither entangled in calamity nor does he tread wrong path. Righteous wisdom starts emerging as soon as a methodical recitation of this mantra is performed.

AUM – Almighty God

BHOOR – Embodiment of vital or spiritual energy

BHUVAHA – Destroyer of suffering

SWAHA – Embodiment of Happiness

TAT – That (indicating God)

SAVITUR – Bright, Luminous, like sun

VARENYAM – Supreme, Best

BHARGO – Destroyer of Sins 

DEVASYA – Divine

DHEEMAHI – May receive

DHEEYO – Intellect

YO – Who

NAH – Our

PRACHODAYAT – May inspire

It means- “O God, Thou art the giver of life, the remover of pain and sorrow, the bestower of  happiness;
O Creator of the Universe, may we receive Thy supreme, sin destroying light; may Thou guide our intellect in the right direction.”

Num.     
LETTERS  GLAND           POWER                      
01. Tat tapini success
02. Sa saphalata bravery
03. Vi vishwa perseverance
04. Tur tustu welfare
05. Va varada yoga
06. Re revati love
07. Ni sukshma wealth, money
08. Yam gyan brilliance
09. Bhar bharga protection
10. Go gomati intellect
11. De devika subjugation
12. Va varahi devotion
13. Sya simhani determination
14. Dhee dhyana Life force
15. Ma marayad self restraint
16. Hi sphuta penance
17. Dhi medha farsightedness
18. Yo yogamaya awakening
19. Yo yogini production
20. Naha dharini sweetness
21. Pra prabhav ideal
22. Cho ushma courage
23. Da drishya wisdom
24. Yat niranjana service, unselfishness

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पुराणों में सृष्टि के आरंभ का वर्णन करते हुए लिखा है कि विष्णु की नाभि से कमल उत्पन्न हुआ । कमल पुष्प पर ब्रह्मा विराजे । विधाता ने आकाशवाणी के माध्यम से ब्रह्मा से कहा-आपको सृष्टि सरंचना के लिए उत्पन्न किया गया है । उसकी क्षमता उत्पन्न करने के लिए तप कीजिए । तप से शक्ति उपलब्ध होती है और उसी विशिष्टता के आधार पर महत्वपूर्ण कार्य बन पड़ते हैं । 

ब्रह्माजी ने तप का आधार व स्वरूप पूछा तो आकाशवाणी ने कहा- ”गायत्री मंत्र की सम्यक् उपासना की तप है” । पीछे उन्हें गायत्री मंत्र बताया गया, जिसकी वे उपासना करने लगे । इस आधार पर उनकी चेतना जगी और सृष्टि निर्माण का ताना-बाना बुन लिया गया । उसकी सुव्यवस्थित योजना बना ली गयी । 

किन्त उस समय महाप्रलय का जल ही सर्वत्र भरा पड़ा था । कोई पदार्थ नहीं था । अब सृष्टि बने तो किस आधार पर बने? इसके लिए लिए पदार्थ की आवश्यकता पड़ी । उसे जुटाने के लिए उन्हें दुबारा तप करना पड़ा । इस बार उन्हें सावित्री का आश्रय लेना पड़ा सावित्री प्रकट हुई और उसका उन्होंने उपयोग करके सृष्टि की संरचना कर डाली । 

इस कथानक के अनुसार गायत्री और सावित्री दो का सहयोग ब्रह्माजी को लेना पड़ा । इसलिए यह दोनों उनकी सहायिकाएँ, सहभागिनी, पत्नियाँ कहलाई गायत्री अर्थात भौतिकी । भौतिकी का मूल भूत आधार पंच तत्व हैं । तत्व जड़ है । इसलिए प्रकृति को जड़ कहा जाता है । 

जड़ प्रकृति से समस्त ब्रह्माण्ड भरा पड़ा है । उसमें अनेकों ग्रह, पिण्ड और छुट्टल पदार्थ प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं, पर उनमें चेतना न होने से मात्र क्रिया भर होती है । उनके परमाणु और पिण्ड अपनी धुरी एवं कक्षा में भ्रमण करते हैं । कणों के साथ-साथ पिण्ड की मूलभूत सरंचना में प्रतिकण भी विद्यमान हैं । छाया व्यापार सब ओर चल रहा है । यह प्रक्रिया भी किन्हीं नियमों के अन्तर्गत व्यवस्थित रूप से इकालॉजी विज्ञान के अनुशासनों के अन्तर्गत चलती है । 

पृथ्वी पर बिखरा हुआ पदार्थ भी इसका अपवाद नहीं है, पर जड़ सृष्टि अपर्याप्त है । उसका न कोई उद्देश्य है, न प्रयास, न प्रतिफल, न आनन्द । इसका समावेश हुए बिना जड़ पदार्थ दृश्यमान, गतिशील होते हुए भी निरर्थक ही बना रहा । इस अभाव की पूर्ति के लिए ब्रह्माजी को आत्मिकी का-गायत्री का उपयोग करना पड़ा । इसी आधार पर प्राणी बने । इस प्रसंग का माहात्य शास्त्रों में बड़े विशद रूप में प्रकट हुआ है । 

परब्रह्मस्वरूप च निर्वाण पद दायिनी । 
ब्रह्मतेजोमयी शक्तिस्तदधिष्ठात् देवता॥ -देवी भागवत् स्कन्द ९ अ० १/४२ 

गायत्री मोक्ष देने वाली परमात्मास्वरूप और ब्रह्मतेज से युक्त शक्ति है और मंत्रों की अधिष्ठात्री है ।

गायत्री इदं सर्वम् । 
नृसिंहपूर्वतापनीयोप० ४/२ 

यह समस्त जो कुछ है गायत्री स्वरूप है । 

गायत्री परमात्मा । 
गायत्री तत्त्वे० 

गायत्री ही परमात्मा है ।

ब्रह्म गायत्रीति-ब्रह्म वै गायत्री । -शतपथ ब्राह्मण ८/५/३/७/-ऐतरेय ब्रह्म० अ० २७ ख० ५ 

ब्रह्म गायत्री है, गायत्री ही ब्रह्म है । 

परमात्मनस्तु या लोके ब्रह्म शक्तिर्विराजते । 
सूक्ष्मा च सात्विकी चैव गायत्रीत्यभिधीयते॥ ९ 

संसार में परमात्मा की जो सूक्ष्म और सात्विक ब्रह्म-शक्ति विद्यमान है, वह ही गायत्री कही जाती है । 

प्रभावादेत गायत्र्य भूतानामभिजायते । 
अंतःकरणेषु दैवानां तत्त्वानां हि समुद्भवः॥ १० 

प्राणियों के अंतःकरण में दैवी तत्वों का प्रादुर्भाव गायत्री के प्रभाव से ही होता है । 

प्राणियों के, सभी जीवधारियों के शरीर तो पदार्थ विनिर्मित थे । पर इसके अंतर्गत चेतना का समावेश एक विलक्षणता थी । चेतना न होने पर प्राणी अपने शरीरों का उपयोग किस प्रकार, किस निमित्त कर पाते । संसार में बिखरे हुए साधनों का किस प्रकार उपयोग कर पाते? इस उपयोग के बिना उन्हें संतोष, उत्कर्ष और आनन्द की प्राप्ति कैसे होती? यह काम चेतना का है । 

प्राणियों के शरीर पंच तत्त्वों से बने हैं और उनके भीतर काम करने वाली चेतना गायत्री है । इस चेतना को प्राण कहा गया है । प्राण रहने तक ही प्राणी जीवित रहते हैं । इनके निकल जाने पर शरीर मृतक बन जाता है । अपनी सत्ता नष्ट करने के लिए अपने भीतर से ही सड़न के कृमि-कीटक उत्पन्न हो जाते हैं और वे उसका सफाया करक स्वयं भी समाप्त हो जाते हैं । अन्यथा चील, कौए, सियार, कुत्ते आदि उसे खाकर समाप्त कर देते हैं । जल में डाल देने पर मछलियाँ, कछुए आदि उसे खा जाते हैं । 

इस प्रकार चेतना के बिना शरीर का स्वस्थ सक्रिय रहना तो दूर, अपनी सत्ता को बनाये रहने में भी समर्थ नहीं होता । इसलिए सावित्री से गायत्री का महत्त्व अधिक माना जा सकता है । किन्तु यह मान्यता भी अपूर्ण है । क्योंकि चेतना की चिन्तनात्मक क्षमता आधार हीन होने पर अपने पराक्रम का, अस्तित्व का परिचय नहीं दे सकती । इस तर्क के अनुसार सावित्री की भी समान महत्ता स्वीकार करनी पड़ती है । 

जहाँ तक चेतन का सम्बन्ध है, वहाँ आत्मिकी और भौतिकी की सम्मिश्रित प्रक्रिया ही कामकरती दिखती है और दोनों एक-दूसरे पर निर्भर प्रतीत होती हैं । दो पत्नियाँ होने पर वे मिलजुल कर सृष्टि की समग्र गृह व्यवस्था चलाती हैं । इसी प्रकार चेतन जगत का समस्त क्रिया-कलाप सावित्री और गायत्री के, भौतिकी और आत्मिकी के, संयुक्त प्रयास से ही चलना प्रत्यक्ष है । 

गायत्री पंच प्राणों से विनिर्मित है । प्राणों की गणना पाँच में होती है । उस प्राण भी पाँच ही हैं । इसलिए उसे प्राण विद्या कहा गया है । शास्त्रकारों ने गायत्री का स्वरूप निर्धारित करते समय उसे प्राण चेतना या प्राण विद्या कहा है । इस सम्बन्ध में शास्त्र मतों को देखा जा सकता है ।

पाँच प्रश्नों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए ”सर्व-सारोपनिषद” में कहा गया है- 

अन्नकार्यांणां कोशानां समूहऽन्नमयकोश इत्युच्यते 
प्राणादि चतुर्दश अन्नमय कोशे यदा वर्तन्ते तदा 
प्राणमय-कोश इत्युच्यते । एतत्कोश द्वय संसक्त मन । 
आदि चतुर्दशकरणरात्मा शब्दादि विषय संकल्पदिर्मानु 
यदा करोति तदा मनोमय कोश इत्युच्यते । 
एतत्कोशत्रयसंसक्त तद्गत विशेषज्ञो यदा भासते तदा 
विज्ञानमय कोश इत्युच्यते । एतत्कोश चतुष्टय संसक्त 
स्वाकारणा-ज्ञाने वटकनिकायामिव वृक्षों तदा वर्तते तदा 
आनन्दमय कोश इत्युच्यते । 

अर्थात-अन्न से अन्न के स्वरूप एवं शक्ति सत्ता से, प्रत्यक्षतः विनिर्मित कोशों को अन्नमय कोश कहते हैं । इन अन्नमय कोश में संचरित प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान इन पंच प्राणों पंच उपप्राणों आदि प्राणवायु के सभी शरीरस्थ रूपों का समुच्चय प्राणमय कोश है । 

मन समेत इंद्रियों द्वारा किए जाने और किए जा सकने वाले सूक्ष्म कार्य-क्षेत्र का नाम मनोमय कोश है । इन तीनों कोशों के संयुक्त स्वरूप से आत्मा बुद्धि द्वारा जो कुछ ज्ञानात्मक क्रिया-व्यापार करती है, उसे विज्ञानमय कोश कहते हैं । इन चारों कोशों से संसक्त आत्मा जब अपने कारण रूप के प्रति अनभिज्ञ रहती है और स्वतः में ही रमती रहती है, जैसे बटबीज में वृक्ष रहता है, तब उसे आनन्दमय कोश कहते हैं । 

पाँच प्राणों को ही पाँच देव बताया गया है- 
पंचदेव मयं जीव, पंच प्राणमयं शिव । 
कुण्डली शक्ति संयुक्त, शुभ्र विद्युल्लतोपम॥ 

यह जीव पाँच देव सहित है । प्राणवान होने पर शिव है । यह परिकर कुण्डलिनी शक्तियुक्त है । इनका आकार चमकती बिजली के समान है । 

सावित्री विद्या समर्थिंत पंच कोशों के जागरण से उत्पन्न ब्राह्मी शक्ति की पराशक्ति के रूप में अभ्यर्थना की गई है । 

देवी भागवत में कहा गया है- 
पंचप्राणधिदेवी या पंचप्राण स्वरूपिणी । 
प्राणाधिकप्रियतमा सर्वाभ्यः सुन्दरी परा॥ -देवी भागवत 

पाँच प्राण उसी पंचकोश सम्पदा के पाँच स्वरूप हैं । प्राणों की अधिष्ठात्री देवी वे ही हैं । सर्वाङ सुन्दरी है । पराशक्ति है । भगवान को प्राणों से प्यारी है 
‍ 
वस्तुतः गायत्री प्राणी सत्ता में समाई हुई है इसलिए उसे वह अपने सदृश ही मानता है । मनुष्य की उपासना में वह मानुषी है और उसकी आकृति वैसी ही है । दो हाथ, दो पैर ज्ञानेन्द्रियाँ भी उतनी हैं । किसी और प्राणी को यदि मनुष्य जैसी बुद्धिमत्ता होती तो वह अपनी जैसी आकृति जैसा चेतना के स्वरूप को समझ पाता । बैल का भगवान बैल जैसा और पक्षी का भगवान पक्षी जैसा होता । 

चर्चा प्रतीक के प्रसंग में चल रही है । गायत्री महाविज्ञान का ऊहापोह करते समय उपासना विज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश के लिए ध्यान की अनिवार्य आवश्यकता प्रतीत होती है । एकाग्रता और श्रद्धा के आधार पर ही ध्यान बन पड़ता है । इसलिए उस हेतु कोई न कोई नाम रूप वाली प्रतिमा बुद्धि कल्पित करती है । कल्पना बेपर की उड़ान भर हो हो तो बात दूसरी है अन्यथा वह ध्यान के अनुरूप ही साधक की आकृति बना लेती है । यदि ध्यान, श्रद्धा एवं विश्वास के संयोग से ठीक उसी प्रकार फलित होने लगता है, जैसे कि उस पर आस्था जमाई गई थी । 

इसी दृष्टि से गायत्री की प्रतिमा ठीक मानुषी जैसी गढ़ी गई है । उसके साथ दो उपकरण जोड़े गये हैं । एक जल भरा कमण्डल, दूसरे हाथ में पुस्तक । पुस्तक विवेक का प्रतिनिधित्व करती है और जल भावना का । विवेक और भावना का समन्वय ही मानवी गरिमा आस्था एवं आकांक्षा उत्पन्न करता है । 

गायत्री का वाहन हंस है । यह हंस भी साधक की अंतःचेतना के स्तर की ओर ही इंगित करता है । गायत्री का वाहन राजहंस है । सामान्य जलाशयों में रहने वाला हंस नामक पक्षी नहीं । हंस और राजहंस में मौलिक अन्तर है । राजहंस नीर, क्षीर, विवेक से सम्पन्न है । दूध और पानी मिला होने पर उसमें से दूध पीता है और पानी को छाँट देता है । इसी प्रकार वह मोती चुगता है । न मिलने पर प्राण त्याग देता है । यह विशेषताएँ साधारण हंसों में नहीं होती । वे जलाशयों में पाये जाने वाले कीड़े-मकोड़े खाते हैं । दूध उन बेचारों को कहाँ मिलता है? इसी प्रकार वे मोती पाने की स्थिति में भी नहीं होते । मोती बहुत गहरे पानी में मिलते हैं । उतनी डुबकी साधारण हंस नहीं लगा सकते ।राजहंस नाम का कोई पक्षी भी नहीं होता । यह एक अलंकारिक कल्पना है जिसका तात्पर्य आदर्शवादिता से है जो आत्मिकी का, चेतना का, असाधारण अनुदान प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें अपना जीवन सर्वथा श्वेत, उज्जवल रखना चाहिए । कषायों की, विकारों की कलौंच तनिक भी नहीं रहने देनी चाहिए । किन्तु साधारण हंसों में तो चोंच के इर्द-गिर्द तथा पंखों के नीचे कालापन में होता है । इसलिए यह अलंकारिक निरूपण ही समझा जा सकता है । 

सावित्री की, भौतिकी की सूक्ष्म विशिष्टता अपने शरीर में जिन्हे जागृत करनी होती है, उन्हें अध्यात्म की भाषा में उसी के साथ तद्रूप होना पड़ता है । ध्यान की तन्मयता स्तर तक विकसित करनी होती है । इसके लिए भी अलंकारिक चित्रण किया गया है । सावित्री पंचमुखी है । उसकी दश भुजाएँ हैं । कमलासन पर विराजमान है । आयुधों और आभूषणों से सुसज्जित है । 

पंचमुखी अर्थात् प्रकृति के पाँच तत्व और चेतना के पाँच प्राण । दश भुजाएँ अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रियों का समुच्चय । आभूषण, आयुध का अर्थ सुविधा सम्पन्न करने वाले साधन और कठिनाईयों को निरस्त करने वाले उपकरण भौतिकी के क्षेत्र में प्रगति करने वालों के लिए यह सारा सरंजाम जुटाना आवश्यक है । 

सावित्री का वाहन-आसन कमल पुष्प है । इसके कई तात्पर्य हैं । हृदय को कमल कहा गया है । हृदय सम्वेदना, सहानुभूति, सहयोग जैसी प्रवृत्तियों का उद्गम माना गया है । उसे मात्र रक्त समेटने-फेंकने की थैली तो शरीर शास्त्री ही मानते हैं । आत्मिकी के तत्त्ववेताओं ने शरीर अवयवों के साथ प्रवृत्तियों को भी जोड़ा है । मस्तिष्क के मध्य में रहने वाला सहस्रार कमल भी कमल पुष्प की उपमा में प्रयुक्त होता है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि मस्तिष्क की बुद्धि तीक्ष्ण् और हृदय का, स्वभाव सम्वेदना सहकारिता का, संतुलन का, माध्यम होना चाहिए, इस प्रकार गायत्री और सावित्री और की प्रतिमाओं का पृथक्करण होता है । 

इस संदर्भ में शास्त्रकारों का अभिमत स्पष्ट है । 
सविता सर्व भूतानां सर्व भापाश्च सूयत । 
सर्वनात्पे्ररणाच्च्व सविता तेन चोत्यते॥ 

अर्थात्-समस्त तत्वों, सभी प्राणियों और समस्त भावनाओं की प्रेरणा देने के कारण ही उस शक्ति को सविता कहा गया है । प्रतीक रूप में सविता देवता की उपासना की जाने का विधान है । (गायत्री तंत्र) 

इसी प्रकार कहा गया है । 
गायत्री को सद्भावनाओं का और सावित्री को सत्प्रवृत्तियों का माध्यम मानना चाहिए । सद्भभावनाओं के सहारे मनुष्य आत्मिक क्षेत्र में ऊँचा उठना है । महामानव, ऋषि, देवताबनता है । उसकी श्रद्धा, निष्ठा बलवती होती है । दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाता है और पवित्र जीवन वाला बनता है । निजी कठिनाईयों से जुझता और उन्हें परास्त करता है । ऐसी सूझ-बूझ दिशाधारा और रिति-नीति अपनाता है जिससे आत्मिक कल्याण हो सके और दूसरों को भी उपयुक्त प्रकाश मिल सके । 

भौतिक क्षेत्र में वैसी ही दो आवश्यकतायें पड़ती हैं जैसी आत्मिकी के क्षेत्र में । कठिनाई से जूझना और गुत्थियों को सुलझाना अपने-अपने ढंग से दोनों ही क्षेत्रों में अभीष्ट हैं । साधनों को जुटाना और उपयोगी सहयोग अर्जित करना दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से आवश्यक हैं । स्वरूप और तरीके दोनों क्षेत्रों के अलग-अलग अवश्य हैं । 

संघर्ष के बिना कोई गति नहीं । आत्मिक क्षेत्र में कुसंस्कारों, दुर्गुणों, पाप-कर्मों के अधोगामी प्रवाह को रोकना पड़ता है । संयमशील और तपस्वी बनकर आत्मशोधन करना होता है । इतना ही नहीं ऋषियों, विभूतियों को उपलब्ध करने के लिए व्यक्तित्व को अधिक पवित्र और प्रखर बनाना पड़ता है । इससे कम में कोई इन्हें पाने का अधिकारी बन नहीं सकता ।

यही बात भौतिक क्षेत्र के सम्बन्ध में भी है । स्वभावगत आलस्य प्रमाद को परास्त करके अपने को नियमित व्यवस्थित, सक्रिय बनाना होता है और साथ ही बहिरंग क्षेत्र के ईर्षालुओं, प्रतिद्वन्दियों, दुष्टों, आक्रामक-आततायियों से अपनी आत्मरक्षा के लिए इतनी साहसिकता और सहकारिता अर्जित करनी पड़ती है कि उसे देखते हुए आक्रामक दुष्प्रवृत्तियों का साहस ही शिथिल हो जाय और यदि वे दुस्साहस करें भी तो उन्हें नीचा देखना पड़े । इस प्रकार की तैयारी रखने वाले ही भौतिक के क्षेत्र में सफल होते हैं । 

जिस प्रकार शरीर और प्राण-पुरुषार्थ और स्वस्थ चित्त के समन्वय से ही कोई व्यक्ति आत्मिक विभूतियों का धनी बन सकता है, ठीक उसी प्रकार आन्तरिक साहस और बाह्म पुरुषार्थ के बलबूते भौतिक क्षेत्र की समृद्धि, सम्पति, प्रतिभा, विजय जैसी सिद्धियाँ हस्तगत होती हैं । दोनों क्षेत्रों में दोनों ही प्रकार की विशेषताओं की आवश्यकता पड़ती हैं । इसलिए दोनों सर्वथा परस्पर सम्बद्ध माना जाता है । एक क्षेत्र की तैयारियाँ समग्र एवं स्थिर प्रगति का आधार नहीं बन सकतीं । सुपात्र साधक जब साधना की परिपक्वता पा लेते हैं तो उनमें दैवी चेतन शक्ति का प्रादुर्भाव होता है । श्रुति कहती है- 

प्रादूर्यवन्ति वे सूक्ष्माश्चतुर्विशंति शक्तः । 
अक्षरेभ्यस्तु गायत्र्य मानवाहां ह मानसे॥ -गायत्री संहिता 

”मनुष्य के अंतःकरण में गायत्री के चौबीस अक्षरों से चौबीस सूक्ष्म शक्तियाँ प्रकट होती हैं ।” 

जाग्रत ग्रन्थयस्त्वेताः सूक्ष्माः मानसे । 
दिव्यशक्तिसमुद्रभूति क्षिप्रं कुर्वन्त्यसंशयम्॥ 

जागृत हुई ये सूक्ष्म यौगिक ग्रन्थियाँ साधक के मन में निःसंदेह शीघ्र ही दिव्य शक्तियों को पैदा कर देती हैं । 

जनयन्ति कृते पुंसामेता वै दिव्यशक्तयः । 
विविधान् वै परिणामान् भव्यान् मंगलपूरितान्॥ 

ये दिव्य शक्तियाँ मनुष्यों के लिए नाना प्रकार के मंगलमय परिणामों को उत्पन्न करती हैं । 

ये हैं-१. प्रज्ञा, २.वैभव, ३. सहयोग, ४. तिभा, ५. ओजस्, ६. तेजस्, ७. वर्चस्, ८. साहसिकता, १०. दिव्य दृष्टि, ११. पूर्वाभास, १२. विचार संचार, १३. वरदान, १४. शाप, १५. शांति, १६. प्राण प्रयोग, १७. देहान्तर सम्पर्क, १८. प्राणाकर्षण, १९.एश्वर्य, २० दूर-श्रवण, २१. दूर-दर्शन, २२. लोकान्तर सम्पर्क, २३. देव सम्पर्क, २४. कीर्ति । इन्हीं को गायत्री की २४ सिद्धियाँ कहा जाता है । 

गायत्री व सावित्री साधना के समन्वय के विषय में शास्त्रकारों का समत स्पष्ट है- 
पृष्ठतोऽस्याः साधनाया राजतेऽतितरां सदा । 
मनस्विसाधकानां हि बहूनां साधनाबूलम्॥ 

इस साधनाओं के पीछे आदि काल से लेकर अब तक असंख्य मनस्वी साधकों का साधन बल शोभित है । 

इस समन्वय के पीछे भी दोनों का अपना महत्व है । अपना-अपना स्वरूप भी । इसलिए शास्त्रकारों ने जान-बूझकर या अनजाने दोनों का ही बहुत जगहों पर एक ही स्तर पर वर्णन किया है और एक ही नाम से पुकारा है । एक ही प्रकार का प्रतिफल बताया है जब कि दोनों की दिशा धाराएँ पृथक-पृथक हैं । त्रिवेणी में गंगा यमुना का संगम होने से उनका एकीकरण हो जाने की बात भी सही है । पर यह भी गलत नहीं कि दोनों का उद्गम और प्रवाह क्षेत्र अलग-अलग है । इनका समन्वय एकीकरण तो बहुत आगे चलकर होता है । 

एकता के बीच भिन्नता का निरूपण करने के लिए गायत्री और सावित्री के दो रूप विनिर्मित किये गये हैं । गायत्री एकमुखी एवं द्विभुजी । सावित्री पंचमुखी एवं दस भुजी । दोनों के वाहन और अस्त्र आयुध भी भिन्न-भिन्न हैं । हमें दोनों की एकता भी समझनी चाहिए और भिन्नता भी । आत्मिक प्रगति के लिए गायत्री का आश्रय लिया जाता है और भौतिक समस्याओं के लिए सावित्री का अवलम्बन ग्रहण करता होता है । इसी को कहते हैं, द्वेत में अद्वैत की दृष्टि और अद्वैत में द्वेत का पर्ववेक्षण । 

(सावित्री कुण्डलिनी एवं तंत्र- पृ-1.4)

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पूजा पाठ के समस्त उपचारों का एक मात्र लक्ष्य उत्कृष्टता सम्पादन ही है । परब्रह्म को किसी उपहार-मनुहार के सहारे फुसलाया नहीं जा सकता । उसने नियति क्रम, जड़, चेतन सभी को बाँधा है और स्वयं भी बँध गया है । प्रशंसा के बदले अनुग्रह और निन्दा के बदले प्रतिशोध लेने पर यदि भगवान उतर पड़े तो समझना चाहिए कि व्यवस्थापरक अनुबन्ध समाप्त हो गए और सर्वतोन्मुखी अराजकता का उपक्रम चल पड़ा । पर ऐसा होता नहीं है । लोगों का भ्रम है जो सृष्टा को फुसलाने और नियति क्रम का उल्लंघन करने वाले अनुदान इसलिए माँगते हैं कि वे पूजा करने के कारण पक्षपात के अधिकारी हैं । यह बाल बुद्धि जितनी जल्दी हट सके उतना ही अच्छा हैं । 

पूजा उपचार का तात्पर्य चेतना संस्थान को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने का प्रभावी व्यायाम पराक्रम प्रशिक्षण मात्र है । इस प्रकार से या उस प्रकार से, जो अपने चेतना क्षेत्र को जितना समुन्नत बना सकेगा, वह उतना ही ऊँचा उठेगा, आगे बढ़ेगा और देवत्व के क्षेत्र में प्रवेश पाने का अधिकारी बनेगा । उपासना का उद्देश्‍य है – आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देना । आत्मा-अर्थात्‌ अन्तःकरण, भाव संस्थान, जिसके साथ मान्यताएँ, आकांक्षाएँ लिपटी रहती हैं । परमात्मा-अर्थात्‌ उत्कृष्ट आदर्शवादिता । स्मरण रहे, परमात्मा कोई व्यक्ति विशेष नहीं, सृष्टि में जितना भी देव पक्ष है उसके समुच्यय को, आत्माओं के समष्टि समुदाय को, परमात्मा कहते हैं । 

जीवन देवता की साधना – आराधना (2)-3.55

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व्यक्तित्व निर्माण के कार्यक्रम की तुलना कृषक द्वारा किए जाने वाले कृषि कर्म से की जा सकती है जैसे जुताई, बुआई, सिंचाई और विक्रय की चतुर्विधि प्रक्रिया सम्पन्न करने के बाद किसान को अपने परिश्रम का लाभ मिलता है, व्यक्तित्व निर्माण को भी इस प्रकार जीवन साधना की चतुर्विधी प्रक्रिया सम्पन्न करनी पड़ती है, यह है आत्म-चिंतन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास । मनन और चिंतन को इन चारों चरणों का अविच्छिन्न अंग माना गया है इन चतुर्विधि साधनों को एकएक करके नहीं, समन्वित रूप से ही अपनाया जाना चाहिए

आत्म-चितंन अर्थात्‌ जीवन विकास में बाधक अवांछनीयताओं को ढूँढ़ निकालना । इसके लिए आत्म समीक्षा करनी पड़ती है । जिस प्रकार प्रयोगशालाओं मे पदार्थों का विश्लेषण, वर्गीकरण होता है और देखा जाता है कि इस संरचना में कौन-कौन से तत्व मिले हुए हैं । रोगी की स्थिति जानने के लिए उसके मल, मूत्र, ताप, रक्त, धड़कन आदि की जाँच-पड़ताल की जाती है और निदान करने के बाद ही सही उपचार बन पड़ता है । आत्म-चितंन, आत्म-समीक्षा का भी यह क्रम है ।

इसके लिये अपने आप से प्रश्न पूछने और उनके सही उत्तर ढूँढ़ने की चेष्टा की जानी चाहिए । हम जिन दुष्प्रवृतियों के लिए दूसरों की निन्दा करते हैं उनमें से कोई अपने स्वभाव में तो सम्मिलित नहीं है । जिन बातों के कारण हम दूसरों से घृणा करते हैं, वे बातें अपने में तो नहीं हैं ? जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने लिए नहीं चाहते है, वैसा व्यवहार हम ही दूसरों के साथ तो नहीं करते ? जैसे उपदेश हम आये दिन दूसरों को करते हैं, उनके अनुरूप हमारा आचरण है भी अथवा नहीं ? जैसी प्रशंसा और प्रतिष्ठा हम चाहते हैं, वैसी विशेषताएँ हममें हैं या नहीं ? इस तरह का सूक्ष्म आत्म-निरीक्षण स्वयं व्यक्ति को करना चाहिए और अपनी कमियों को ढूँढ़ निकालना चाहिए ।

आत्म-सुधार, अर्थात्‌ कुसंस्‍कारों को परास्त करना । अपने स्वभाव में सम्मिलित दुष्प्रवृत्तियाँ अभ्यास होने के कारण कुसंस्‍कार बन जाती हैं और व्यवहार में उभर-उभर कर आने लगती हैं । आत्म-सुधार प्रक्रिया के अन्तर्गत इसके लिए अभ्यास और विचार-संघर्ष के दो मोर्चे तैयार करने चाहिए । अभ्यस्त कुसंस्‍कारों की आदत तोड़ने के लिए बाह्य क्रिया-कलापों पर नियंत्रण और उनकी जड़ें उखाड़ने के लिए विचार-संघर्ष की पृष्ठभूमि बनानी चाहिए । बुरी आदतें भूतकाल में किया गया अभ्यास ही हैं इस अभ्यास को अभ्यास बना कर तोड़ा जाए और कुसंस्‍कार सुसंस्कार निर्माण द्वारा नष्ट किये जायें । जैसे थल सेना से थल सेना ही लड़ती है और नभ सेना से लड़ने के लिए नभ सेना ही भेजी जाती है ।

जो भी बुरी आदतें जब उभरें उसी से संघर्ष किया जाए । बुरी आदतें जब उभरने के लिए मचल रहीं हों तो उनके स्थान पर उचित सत्कर्म ही करने का आग्रह खड़ा किया जाए और मनोबलपूर्वक अनुचित को दबाने तथा उचित को अपनाने का साहस किया जाय । मनोबल यदि दुर्बल होगा तो ही हारना पड़ेगा अन्यथा सत्साहस जुटा लेने पर तो श्रेष्ठ की स्थापना में सफलता ही मिलती है। इसके लिए छोटी बुरी आदतों से लड़ाई आरम्भ करनी चाहिए । उन्हें जब हरा दिया जायेगा तो अधिक पुरानी और अधिक बड़ी दुष्प्रवृत्तियों को परास्त करने योग्य मनोबल भी जुटने लगेगा।

आत्म-निर्माण अर्थात्‌ जो सत्प्रवृतियाँ अभी अपने स्वभाव में नहीं हैं उनका योजनाबद्ध विकास करना । दुर्गणों को निरस्त कर दिया गया, उचित ही है पर व्यक्तित्व को उज्ज्वल बनाने के लिए, आत्म-विकास की अगली सीढ़ी चढ़ने के लिये सद्‌गुणों की सम्पदा एकत्रित करना भी अत्यन्त आवश्यक है। बर्तन का छेद बन्द कर देना काफी नहीं है, जिस उद्देश्‍य के लिये बर्तन खरीदा गया है वह भी तो पूरा करना चाहिये । खेत में से कँटीली झाड़ियाँ, पुरानी फसल की सूखी जड़ें उखाड़ दी गई, पर इसी से तो खेती का उद्देश्‍य पूरा नहीं हो गया, यह कार्य तो अधूरा है । शेष आधी बात जब बनेगी तब उस भूमि पर सुरम्य उद्यान लगाया जाय और उसे पाल-पोसकर बड़ा किया जाए ।

अपने व्यक्तित्व का विकास उत्कृष्ठ चिन्तन और आदर्श कर्तव्य अपनाये रहने पर ही निर्भर है । उस साधना में चंचल मन और अस्थिर बुद्धि से काम नहीं चलता, इसमें तो संकल्पनिष्ठ, धैर्यवान और सतत प्रयत्नशील रहने वाले व्यक्ति ही सफल हो सकते है । अपना लक्ष्य यदि आदर्श मनुष्य बनना है तो इसके लिए व्यक्तित्व में आदर्श गुणों और उत्कृष्ट विशेषताओं का अभिवर्धन करना ही पड़ेगा ।

आत्म-विकास अर्थात्‌ अपने आत्म-भाव की परिधि को अधिकाधिक विस्तृत क्षेत्र में विकसित करते रहना । यदि हम अपनी स्थिति को देखें तो प्रतीत होगा कि शरीर और परिवार का उचित निर्वाह करते हुए भी हमारे पास पर्याप्त समय और श्रम बचा रहता है कि उससे परमार्थ प्रयोजनों की भूमिका निबाही जाती रह सके । आत्मीयता का विस्तार किया जाय तो सभी कोई अपने शरीर और कुटुम्बियों की तरह अपनेपन की भाव श्रृंखला में बँध जाते हैं और सबका दुःख अपना दुःख तथा सबका सुख अपना सुख लगने लगता है । जो व्यवहार, सहयोग हम दूसरों से अपने लिए पाने की आकांक्षा करते हैं, फिर उसे दूसरों के लिए देने की भावना भी उमगने लगती है, लोक-मंगल और जन-कल्याण की, सेवा साधना की इच्छाएँ जगती हैं तथा उसकी योजनाएँ बनने लगती हैं । इस स्थिति में पहुँचा ,व्यक्ति सीमित न रहकर असीम बन जाता है और उसका कार्य क्षेत्र भी व्यापक परिधि में सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धक बन जाता है ।

संसार के इतिहास में जिन महामानवों का उज्ज्वल चरित्र जगमगा रहा है, वे आत्म-विकास के इसी मार्ग का अवलम्बन लेते हुए महानता के उच्च शिखर तक पहुँच सके हैं । चारों दिशाओं की तरह आत्मिक उत्कर्ष के चार आधार यही हैं ।

जीवन देवता की साधना – आराधना (2)-2.8
Writer : Pt Shriram Sharma Acharya

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It is an evident fact that peoples’ charity and services to society are a source of inspiration to others. Only these people can survive and contribute, along with patience, in the mission of changing an era (Yug Nirman). Only such people can be expected to make solid contributions. The people who have joined the Thought Revolution (the Gayatri mission) by being influenced by yagnas and speeches could not stay long. However, those who have stepped forward in the mission after a deep analysis of Gayatri literature are speedily heading towards their targets with deep loyalty and faith. For the mission of the evolution of an era (Yug Nirman Yojna), we do not want to build castles in the air by taking people who are just pumped up with an enthusiastic mentality and simultaneously still immature. 

In this mission, expectations will only be from those who have understood the substance and reached the root of the literature. If we build an organization with incompetent people, then how long will it last? Many branches of Gayatri Parivaar have failed due to this basic flaw but we should not repeat this mistake. People who do not place value in thought cannot stay with any organizational work. The people who did not subscribe to Akhand Jyoti and read Gayatri literature, although strong devotees for some time span, later became totally isolated from the mission. The reason behind this idea is that the source of inspiration was broken off. There was no deep level of self involvement that could have remained whilst dealing with materialistic problems. 

We frequently observe that person blabbering right in front of us and wonder; Is he attached to our thought process and literature through the Akhand Jyoti or not? If he/she disowns and ignores the literature, then we are convinced that he/she will not remain attached to the mission for long. One who does not love and relate to our thoughts will not be able to contribute for a long period of time. Even if they have a polite tone and mannerism, their verbal love for Guruji alone cannot contribute any great work. 

-Pt. Shriram Sharma Acharya
Translated from – Pandit Shriram Sharma Acharya’s work
Yug Nirman Yojna – philosophy, format and program -66 (2.50)

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यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि पारमार्थिक कार्यों में निरन्तर प्रेरणा देने वाली आत्मिक स्थिति जिनकी बन गई होगी, वे ही युग-निर्माण जैसे महान कार्य के लिए देर तक धैर्यपूर्वक कुछ कर सकने वाले होंगे । ऐसे ही लोगों के द्वारा ठोस कार्यों की आशा की जा सकती है । गायत्री आन्दोलन में केवल भाषण सुनकर या यज्ञ-प्रदर्शन देखकर जो लोग शामिल हुए थे, वे देर तक अपनी माला साधे न रह सके, पर जिन लोगों ने गायत्री साहित्य पढक़र, विचार मंथन के बाद इस मार्ग पर कदम बढ़ाया था, वे पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं । युग-निर्माण कार्य के लिए हम उत्तेजनात्मक वातावरण में अपरिपक्व लोगों को साथ लेकर बालू के महल जैसा कच्चा आधार खड़ा नहीं करना चाहते ।

इसलिए इस संघ में उन्हीं लोगों पर आशा भरी नजर डाली जाएगी जो बात को गहराई तक समझ चुके हैं, उसकी जड़ तक जा चुके हैं । वरना आड़े-सीधे लोगों का भानुमती का कुनबा इकट्ठा करके कोई संगठन बना लिया जाए, तो वह ठहरता कहॉं है ? गायत्री परिवार की कितनी ही शाखाएँ इसी प्रकार ठप्प हुईं। अब उस गलती को दुबारा नहीं दुहराना चाहिए। जिन लोगों की दृष्टि में विचारों का कोई मूल्य या महत्त्व नहीं, वे किसी कार्य में देर तक कब ठहरने वाले हैं ?जो लोग अखण्ड-ज्योति नहीं मँगा सके, जो गायत्री साहित्य नहीं पढ़ सके, वे किसी समय बड़े भारी श्रद्धावान दीखने वाले साधक भी आज सब कुछ छोड़े बैठे दीखते हैं । प्रेरणा का सूत्र टूट गया, अपना निज का कोई गहरा स्तर था नहीं, फिर उनके पैर भौतिक बाधाओं के झकझोरे में कब तक टिके रहते ?

इसीलिए हम यह बारीकि से देखते रहते हैं कि सामने बैठा हुआ, लम्बी-चौड़ी बातें बनाने वाला व्यक्ति हमारी विचारधारा के साथ अखण्ड-ज्योति या साहित्य के माध्यम से बँधा है या नहीं ? यदि वह इस की उपेक्षा करता है तो हम समझ लेते हैं कि यह देर तक टिकने वाला नहीं है । जो हमारे विचारों को प्यार नहीं करते, उनका मूल्य नहीं समझते वे शिष्ठाचार में मीठे शब्द भले ही कहें, गुरुजी-गुरुजी, वस्तुत: वे हमसे हजारों मील दूर हैं, उनसे किसी बड़े काम की कोई आशा नहीं रखी जा सकती ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना – दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (२.५०)

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Human mind is like a blank paper or an unexposed photographic film, which records the effect of surrounding situations, events and thoughts, accordingly shaping the mentality. A person is basically neither wise nor a fool, neither good nor bad, but very sensitive, and hence, is deeply influenced by the surrounding and moulded in the same pattern. This can lead him to great heights or it can throw him into hell, based on the environment around him.The most important thing needed for raising our personality to greater heights is a thought process associated with not only idealism, but also with our faith and favour. This can be fulfilled in two ways: One, long enough association with a Guru, idealist person with high moral and sound character; and Second, reading, study and absorption of thoughts of such great personalities. Under the prevailing circumstances, the first option seems very difficult, as such great people have become so rare now, and gradually they are being replaced by the cheaters and fraudsters who themselves are confused and mislead the followers who blindly confide in them. The really deserving spiritual leaders are so busy in refining the current situation that they hardly can devote any time to accompany and lead the anxious mass. Therefore, if one is fortunate enough to be around a really honest wise man, he should get the chance to satisfy the thirst of knowledge, because, long association with such personalities is rarely possible. 

The second option is readily available – and that is the reading and deep study of thoughts of great spiritual leaders, expressed and written in books. Only through such study, a prolonged atmosphere can be created in our mind which can lead us to a glorious, divine life. Our efforts to satisfy this spiritual hunger must be far stronger than working for our physical needs of bread, butter and shelter. The study of such pious literature must become a part of our daily routine. Then only our mind can be protected from ill-effects of the polluted environment, which otherwise encourages us to involve into deteriorated, shameful activities. If not curtailed, this environment can provoke common mass to look for benefits in such activities.So, self study of great thoughts and pious books is the only solution to protect our mind from contaminated environment. The great spiritual personalities – living or dead, have created the literature containing immortal thoughts, and this is permanently available in the form of books for our study. Such books are inexpensive, they do not cost much, but the benefit derived from them is precious like gold and invaluable.It hardly needs to mention that Yug Nirman Yojana combines the old wisdom with the new knowledge and imbibes the principles of our ancient “Sanatan” religion along with the modern intellectual and scientific thought process. The learned class admires it as a marvellous and unique combination. It is a wise step to study the Yug Nirman Literature instead of reading many diversified books leading to confusion.Let us make a good habit of reading Yug Nirman Literature a part of our routine daily life. 

-Pt. Shriram Sharma Acharya
Translated from – Pandit Shriram Sharma Acharya’s work
Yug Nirman Yojana – The Vision, Structure and the Program – 66 (6.28)

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