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विशिष्ट लेख

Once, a wealthy man came to Mahatma Anand swami. He was the owner of several factories. All his sons were pursuing the business well. His wife had passed away previously. In spite of prosperity all around, his heart was not at peace. His hunger and sleep had gone. He humbly intimated his distress and ailment to the great saint.

Mahatma Anand swami said, “In your life, you did give importance to action and labor but not to the emotions. Good company and hearing religious discourses only nourish the thoughts.

Now start giving away love, money and labor in order to remove the inner dryness. Give affection to all, go among the orphans and the poor, help them to be self-reliant. Put your physical efforts also in these noble works, as much as you can. Then see that your hunger will be returned to you and you will have a sound sleep.”

The rich man did accordingly and consequently the miraculous transformation, that he experienced, gave him a great peace and happiness which he had never experienced before.

Pragya Puran, Part-I, Page 143. 

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पैसा या धन के महत्व को देखते हुए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन करने पर हर व्यक्ति को जीवन में सुख और शांति प्राप्त होती है। पैसों के संबंध में आचार्य चाणक्य ने एक महत्वपूर्ण बात बताई है कि-

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्।।

इस संस्कृत श्लोक का अर्थ है कि हमारे द्वारा कमाए गए धन का उपभोग करना या व्यय करना ही धन की रक्षा के समान है। इसी प्रकार किसी तालाब या बर्तन में भरा हुआ पानी उपयोग न किया जाए तो सड़ जाता है।

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति धन या पैसा कमाता है तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। काफी लोग धन को अत्यधिक संग्रहित करके रखते हैं, उसका उपयोग नहीं करते हैं। आवश्यकता से अधिक धन का संग्रहण अनुचित है। इसलिए धन का दान करना चाहिए। सही कार्यों में धन को निवेश करना चाहिए। यही धन की रक्षा के समान है। यदि कोई व्यक्ति दिन-रात मेहनत करके पैसा कमाता है और उसका उपभोग नहीं करता है तो ऐसे पैसों का लाभ क्या है। हमेशा पैसों का सदुपयोग करते रहना चाहिए। इसी प्रकार किसी तालाब में भरा जल उपयोग न किया जाए तो वह सड़ जाता है। ऐसे पानी को बचाने के लिए जरूरी है कि उसका उपयोग किया जाए। यही बात धन पर भी लागू होती है। 

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All religions are same!!!
We have 26 alphabets in English,
as given below?

 A  B  C  D  E  F  G H   I  J   K    L   M    N   O   P   Q   R
1   2   3  4   5   6   7  8  9  10  11  12  13  14  15  16  17  18
S   T     U   V   W    X     Y     Z
19  20   21  22   23   24   25  26 
With each alphabet getting a number, in chronological order, as above, study the following, and bring down the total to a single digit and see the result yourself.
Hindu
S  h  r  e  e   K  r  i  s  h  n  a
19+8+18+5+5+11+18+9+19+8+14+1=135=9
M u s l i m
M  o  h  a  m  m  e  d
13+15+8+1+13+13+5+4=72=9
Jain
M a h a v  i  r
13+1+8+1+22+9+18=72=9
Sikh
G  u  r  u   N  a  n  a  k
7+21+18+21+14+1+14+1+11=108=9
Parsi
Z  a  r  a  t  h  u  s  t  r a
26+1+18+1+20+8+21+19+20+18+1=153=9
Buddhist
G  a   u  t  a  m
7+1+21+20+1+13=63=9 
Christian
Esa Messiah
5+19+1+13+5+19+19+9+1+8=99=18=9
 Each one ends with number 9
THAT IS NATURE’S CREATION. 
That all religions are same!!!
Amazing!!
 YET MAN FIGHTS WITH MAN, ON RELIGIOUS ISSUES???
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।। दिव्य संदेश ।।


आप के मानस में बिराजे हुऐ उन समस्त सदगुणों को नमन करता हूँ, जिनके वशीभूत होकर आप यहाँ पधारे।

हमारे साथियों,
वंदे वेद मातरम् ।

प्राचीन काल मे संत समाज वाणी द्वारा ही जनमानस को दिशा एवम प्रेरणा देने का कार्य बड़ी सफलता के साथ करता रहा है । 
इसी श्रेष्ठ परम्परा को लक्ष्य करके एक मंच की स्थापना की गयी है । 
 इस मंच का नाम ”जनमानस परिष्कार मंच” है । 
यहाँ संत समाज की वाणी को संकलित करने का प्रयास किया जा रहा है। 

प्रथमतः यह कार्य ब्लाग से आरम्भ किया गया हैं। 
योजना के आगामी चरण में वेबसाइट का निर्माण किया जा चुका है। 
यह सारा संकलन भी इस वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। 
आगामी समस्त संकलन इसी वेबसाइट पर किया जा रहा है। 
इस वेबसाइट पर आप सभी का हार्दिक स्वागत है। 


धरती पर स्वर्ग का अवतरण तो होना ही है । 
इसमे किसी को शंका नही होनी चाहिए । 
नवयुग यदि आएगा तो विचार शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नही, विचारो की विचारो से काट द्वारा होगी, समाज का नवनिर्माण होगा तो वह सद् विचारो की स्थापना द्वारा ही संभव होगा । 

यह सम्पूर्ण योजना परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्रीरामजीशर्मा के सुक्ष्म सानिध्य मे संपन्न हो रही है । 
हमें इस सुक्ष्म सत्ता का संरक्षण सदैव प्राप्त होता रहेगा । 
यह हमारी सुक्ष्म सत्ता का वादा है ।

विचार क्रांति की यह योजना आप सभी के सहयोग से ही संपन्न होगी ।
आप भी अपना अपना अमूल्य सहयोग कर 
“युग निर्माण योजना” 
को सफल बनायें ।
आपके अनमोल सुझाव सादर आमंत्रित है ।

।। वंदे वेद मातरम् ।।

गुरूदेव के चरणों में –
जनमानस परिष्कार मंच
vedmatram@gmail.com
स्वरदूत – 09929827894, 01483-225554
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ह्रीं, श्रीं, क्लीं, मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड ॥ 
शान्ति, क्रान्ति, जाग्रति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड ॥ १॥

जगत जननी, मङ्गल करनि, गायत्री सुखधाम । 
प्रणवों सावित्री, स्वधा, स्वाहा पूरन काम ॥ २॥
————
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। 
गायत्री नित कलिमल दहनी॥१॥ 

अक्षर चौविस परम पुनीता। 
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥२॥ 

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा। 
सत्य सनातन सुधा अनूपा॥३॥ 

हंसारूढ श्वेताम्बर धारी। 
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन- बिहारी॥४॥ 

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला। 
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥५॥ 

ध्यान धरत पुलकित हिय होई। 
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥६॥ 

कामधेनु तुम सुर तरु छाया। 
निराकार की अद्भुत माया॥७॥ 

तुम्हरी शरण गहै जो कोई। 
तरै सकल संकट सों सोई॥८॥ 

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। 
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥९॥ 

तुम्हरी महिमा पार न पावैं। 
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥१०॥ 

चार वेद की मात पुनीता। 
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥११॥ 

महामन्त्र जितने जग माहीं। 
कोउ गायत्री सम नाहीं॥१२॥ 

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। 
आलस पाप अविद्या नासै॥१३॥ 

सृष्टि बीज जग जननि भवानी। 
कालरात्रि वरदा कल्याणी॥१४॥ 

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। 
तुम सों पावें सुरता तेते॥१५॥ 

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। 
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥१६॥ 

महिमा अपरम्पार तुम्हारी। 
जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥१७॥ 

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। 
तुम सम अधिक न जगमे आना॥१८॥ 

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। 
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा॥१९॥ 

जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। 
पारस परसि कुधातु सुहाई॥२०॥ 

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई। 
माता तुम सब ठौर समाई॥२१॥ 

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। 
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥२२॥ 

सकल सृष्टि की प्राण विधाता। 
पालक पोषक नाशक त्राता॥२३॥ 

मातेश्वरी दया व्रत धारी। 
तुम सन तरे पातकी भारी॥२४॥ 

जापर कृपा तुम्हारी होई। 
तापर कृपा करें सब कोई॥२५॥ 

मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें। 
रोगी रोग रहित हो जावें॥२६॥ 

दारिद मिटै कटै सब पीरा। 
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥२७॥ 

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। 
नासै गायत्री भय हारी॥२८॥ 

सन्तति हीन सुसन्तति पावें। 
सुख संपति युत मोद मनावें॥२९॥ 

भूत पिशाच सबै भय खावें। 
यम के दूत निकट नहिं आवें॥३०॥ 

जो सधवा सुमिरें चित लाई। 
अछत सुहाग सदा सुखदाई॥३१॥ 

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी। 
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥३२॥ 

जयति जयति जगदंब भवानी। 
तुम सम और दयालु न दानी॥३३॥ 

जो सतगुरु सो दीक्षा पावे। 
सो साधन को सफल बनावे॥३४॥ 

सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी। 
लहै मनोरथ गृही विरागी॥३५॥ 

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। 
सब समर्थ गायत्री माता॥३६॥ 

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। 
आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥३७॥ 

जो जो शरण तुम्हारी आवें। 
सो सो मन वांछित फल पावें॥३८॥ 

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ। 
धन वैभव यश तेज उछाउ॥३९॥ 

सकल बढें उपजें सुख नाना। 
जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥४०॥ 
————
यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई । 
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥ 

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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Revered Gurudev, Pandit Shriram Sharma Acharya 
(A seer-sage and a visionary of the New Golden Era)

Gurudev, Pandit Shriram Sharma Acharyas personality was a harmonious blend of a saint, spiritual scientist, yogi, philosopher, psychologist, writer, reformer, freedom fighter, researcher, eminent scholar and visionary. His life and work represent a marvelous synthesis of the noble thoughts and deeds of great personalities like Swami Vivekanand, Sri Aurobindo, Mahatma Gandhi, Socrates and Confucius.

He pioneered the revival of spirituality and creative integration of the modern and ancient sciences and religion, relevant in the challenging circumstances of the present times.

He successfully practiced and mastered the highest kinds of sadhanas of Gayatri and Savitri. He also practiced higher-level sadhanas on the arduous heights of Himalayas several times and had established enliven contact with Rishis (Sages) of Himalayas.

His volumes on Gayatri Mahavigyan (Super Science of Gayatri) stand as most authentic and comprehensive treatise on the philosophy and science of the great Gayatri Mantra.

He initiated programs of spiritual and intellectual refinement of millions of people without any discrimination of religion, caste, creed, sex, or social status.

Revered Mata Bhagwati Devi Sharma (Mataji)

Born on September 1926, in a famous priestly family, Mata Bhagwati Devi (Vandaniya Mataji), was extraordinary in her own way and unlike other children, was not interested in regular childhood activities such as playing, etc. Instead, she was more interested in worshiping God. She spent most of her time in singing devotional songs. Her favorite pastime was to make the offering of the Bilva tree leaves at the idol of Lord Shiva, and write OM NAMAH SHIVAYA.

During the early stages of her education, she studied Bhagwad Gita, and Ram Charit Manas. After her marriage to Pandit Shriram Sharma Acharya (Gurudev), Mataji took over the responsibility of looking after visitors and guests. She willingly donated all her personal jewelry, which she received at her wedding, to Gurudevs Yug Nirmaan Yojanaa (Movement for the Recreation of the Era) for establishment of Gayatri Tapobhoomi at Mathura.

In 1975, under the leadership of Mataji, Mahilaa Jaagaran Abhiyaan (Movement for Emancipation of Women) was initiated. Soon, about 4000 branches of Mahilaa Jaagaran Abhiyaan were established with more than one million active participants. Its work was not limited to mere slogan-raising, but also womens education, economic self-support, sacramental rites, acquiring self-respect, abolition of dowry and fight against the discrimination of women.

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हिंदू परंपराओं में से एक परंपरा है सभी उम्र में बड़े लोगों के पैर छुए जाते हैं। इसे बड़े लोगों का सम्मान करना समझा जाता है। जिन लोगों के पैर छुए जाते हैं उनके लिए शास्त्रों में कई नियम भी बनाए हैं। यदि कोई आपके पैर छुता है तो आपको क्या करना चाहिए, जानिए…

उम्र में बड़े लोगों के पैर छुने की परंपरा काफी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। इससे आदर-सम्मान और प्रेम के भाव उत्पन्न होते हैं। साथ ही रिश्तों में प्रेम और विश्वास भी बढ़ता है। पैर छुने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण दोनों ही मौजूद हैं। जब भी कोई आपके पैर छुए तो सामान्यत: आशीर्वाद और शुभकामनाएं तो देना ही चाहिए, साथ भगवान का नाम भी लेना चाहिए।

जब भी कोई आपके पैर छुता है तो इससे आपको दोष भी लगता है। इस दोष से मुक्ति के लिए भगवान का नाम लेना चाहिए। भगवान का नाम लेने से पैर छुने वाले व्यक्ति को भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं और आपके पुण्यों में बढ़ोतरी होती है। आशीर्वाद देने से पैर छुने वाले व्यक्ति की समस्याएं समाप्त होती है, उम्र बढ़ती है।

किसी बड़े के पैर क्यों छुना चाहिए?
पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है। यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है। पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं। पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम। झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है। प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है। किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है। इसलिए बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया।

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सुकल्याणीं वाणीं सुरमुनिवरैः पूजितपदाम
शिवाम आद्यां वंद्याम त्रिभुवन मयीं वेदजननीं 
परां शक्तिं स्रष्टुं विविध विध रूपां गुण मयीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

विशुद्धां सत्त्वस्थाम अखिल दुरवस्थादिहरणीम्
निराकारां सारां सुविमल तपो मुर्तिं अतुलां 
जगत् ज्येष्ठां श्रेष्ठां सुर असुर पूज्यां श्रुतिनुतां 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

तपो निष्ठां अभिष्टां स्वजनमन संताप शमनीम
दयामूर्तिं स्फूर्तिं यतितति प्रसादैक सुलभां 
वरेण्यां पुण्यां तां निखिल भवबन्धाप हरणीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

सदा आराध्यां साध्यां सुमति मति विस्तारकरणीं
विशोकां आलोकां ह्रदयगत मोहान्धहरणीं 
परां दिव्यां भव्यां अगम भव सिन्ध्वेक तरणीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

अजां द्वैतां त्रेतां विविध गुणरूपां सुविमलां
तमो हन्त्रीं तन्त्रीं श्रुति मधुरनादां रसमयीं
महामान्यां धन्यां सततकरूणाशील विभवां 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

जगत् धात्रीं पात्रीं सकल भव संहारकरणीं
सुवीरां धीरां तां सुविमलतपो राशि सरणीं
अनैकां ऐकां वै त्रयजगत् अधिष्ठान् पदवीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनयति जाड्यापहरणीं
हिरण्यां गुण्यां तां सुकविजन गीतां सुनिपुणीं
सुविद्यां निरवद्याममल गुणगाथां भगवतीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

अनन्तां शान्तां यां भजति वुध वृन्दः श्रुतिमयीम
सुगेयां ध्येयां यां स्मरति ह्रदि नित्यं सुरपतिः
सदा भक्त्या शक्त्या प्रणतमतिभिः प्रितिवशगां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
शुद्ध चितः पठेद्यस्तु गायत्र्या अष्टकं शुभम्
अहो भाग्यो भवेल्लोके तस्मिन् माता प्रसीदति

श्रीराम शर्मा आचार्य विरचित गायत्री महाविज्ञान से

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जो व्रत चन्द्रमा की कलाओ के साथ साथ किया जाता है, उसे चन्द्रायण व्रत कहते है।

इसे पूर्णमासी से आरम्भ करते है और एक माह बाद पूर्णमासी को ही समाप्त करतें है। इस व्रत में व्यक्ति अपनें खानें को १६ हिस्सों में विभाजित करतें है।

प्रथम दिन यानि पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है।

अगले दिन से भोजन का १६वां भाग प्रत्येक दिन कम करते जाते है और अमावस्या को चन्द्रमा शून्य (०) कलाओं वाला होता है अतः भोजन नही लेते है यानि पूर्ण व्रत करतें हैं।

अमावस्या के अगले दिन से पुनः भोजन की मात्रा में १६ वें भाग की बढ़ोतरी करते जाते है और पुनः पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है।
व्रत के साथ साथ गायत्री का अनुष्ठान भी चलता रहता है।

कौन कर सकता है या किसे करना चाहिये? 
उस व्यक्ति को जिसे अपना स्वास्थ्य ठीक करना हो, उस व्यक्ति को यह व्रत अवश्य करना चाहिये। 

कब व कहां कर सकते है? 
पूर्णमासी से पूर्णमासी तक किसी भी मौसम में कर सकतें है। अत्यधिक शारीरिक श्रम वाले दिनों इसे नही करना चाहिये।
स्थान घर का एक कमरा भी हो सकता है और कोई अन्य सुविधा युक्त स्थान । पर स्थान का चयन करने पर वातावरण की शान्ति और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिये। 

शारीरिक व आध्यात्मिक महत्व क्या है ? 
– शरीर की शुद्धि होती है।
– शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, रोग निवारक शक्ति बढ़ती है।
– आहार विहार शुद्ध होने से मन स्वच्छ बनता है।
– गायत्री अनुष्ठान का साथ होने से आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है और मानव सत्कार्यो की और प्रवृत्त होता है।

इस व्रत को गायत्री परिवार ने क्यों अपनाया ? 
हमारे पूज्य गुरूदेव श्री राम शर्मा आचार्य जी ने इसका प्रयोग स्वयं पर तथा अपने रूग्ण शिष्यों पर किया और अनुभव किया कि यह व्रत मानसिक व शारीरिक स्वस्थता के लिये परम उपयोगी है। उन्होने पाया कि यह व्रत शरीर का कायाकल्प कर देता है।

केवल गायत्री परिवार ही नही स्वास्थ्य को महत्व देने वाले लगभग सभी आश्रमों ने इस व्रत को अपना रखा है। 

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किसी भी अच्छी बात को सिखाने-बताने के लिये कथा-कहानियों का आश्रय लिया जाता है ।

हमारे पूर्वज ऋषियों ने १८ पुराण लिख कर वेद-उपनिषदों की शिक्षाओं को पुराणों के रूप में उतारा है ।

परम पूज्य गुरुदेव पं श्री राम शर्मा आचार्य जी ने भी व्यास जी की तरह १९ वां पुराण लिख दिया है जिसमें समझाया है कि ईश्वर पुत्र होने पर भी मनुष्य क्यों दुःखी रहता है, उस दुःख को कैसे दूर कर सकता है। पुराण के अनुसार आचरण करने से मानव मे देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग आयेगा।

कथा कराने में कितना समय लगता है ? 
कथा को यदि सार्वजनिक रूप से दृष्टान्त सहित समझाने का आयोजन किया जाय तो एक माह भी लग सकता है। किन्तु प्रायः सात – आठ दिनों में इसे निम्न प्रकार सम्पन्न कर लेते है।

लोक कल्याण(प्रथम) खण्ड – २ दिन
महामानव-देवमानव (द्वितीय) खण्ड – २ दिन
परिवार (तृतीय) खण्ड – २ दिन
देव संस्कृति (चतुर्थ) खण्ड – २ दिन 

प्रज्ञा पुराण कथा कौन करा सकता है ? कब और कहां करा सकता है ? कौन कह सकता है ?

यही प्रश्ननारद मुनि जी ने भगवान विष्णु से एक कथा में पूछा था।
प्रश्न के ऊत्तर में भगवान नें कहा कि – जिसमें श्रद्धा और विश्वास हों, जिस किसी को अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना हों और जो पाप मुक्त होना चाहता हो वह भक्त इस कथा को कहीं भी अवकाश (फुर्सत) के क्षणों में कथा करायें और सुने।

कोई भी विद्यावान – पढा लिखा व्यक्ति जो कथा को रोचक ढंग से, दृष्टान्तों के साथ सुना सकने में सक्षम हों और स्पष्ट वाणी वाला व्यक्ति कथा कह सकता हैं। 

प्रज्ञा पुराण कथा को गायत्री परिवार ने क्यों अपनाया है ?
गायत्री परिवार का एक उद्देश्य यह भी है- धर्म तंत्र से लोक शिक्षण, इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु इसे अपनाया हैं। 

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