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पैसा या धन के महत्व को देखते हुए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन करने पर हर व्यक्ति को जीवन में सुख और शांति प्राप्त होती है। पैसों के संबंध में आचार्य चाणक्य ने एक महत्वपूर्ण बात बताई है कि-

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्।।

इस संस्कृत श्लोक का अर्थ है कि हमारे द्वारा कमाए गए धन का उपभोग करना या व्यय करना ही धन की रक्षा के समान है। इसी प्रकार किसी तालाब या बर्तन में भरा हुआ पानी उपयोग न किया जाए तो सड़ जाता है।

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति धन या पैसा कमाता है तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। काफी लोग धन को अत्यधिक संग्रहित करके रखते हैं, उसका उपयोग नहीं करते हैं। आवश्यकता से अधिक धन का संग्रहण अनुचित है। इसलिए धन का दान करना चाहिए। सही कार्यों में धन को निवेश करना चाहिए। यही धन की रक्षा के समान है। यदि कोई व्यक्ति दिन-रात मेहनत करके पैसा कमाता है और उसका उपभोग नहीं करता है तो ऐसे पैसों का लाभ क्या है। हमेशा पैसों का सदुपयोग करते रहना चाहिए। इसी प्रकार किसी तालाब में भरा जल उपयोग न किया जाए तो वह सड़ जाता है। ऐसे पानी को बचाने के लिए जरूरी है कि उसका उपयोग किया जाए। यही बात धन पर भी लागू होती है। 

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पैसा या धन के महत्व को देखते हुए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन करने पर हर व्यक्ति का जीवन सुखी और शांति प्राप्त होती है। पैसों के संबंध में आचार्य चाणक्य ने एक महत्वपूर्ण बात बताई है कि-

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।

तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्।।

इस संस्कृत श्लोक का अर्थ है कि हमारे द्वारा कमाए गए धन का उपभोग करना या व्यय करना ही धन की रक्षा के समान है। इसी प्रकार किसी तालाब या बर्तन में भरा हुआ उपयोग न किया जाए तो सड़ जाता है।

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति धन या पैसा कमाता है तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। काफी लोग धन को अत्यधिक संग्रहित करके रखते हैं, उसका उपयोग नहीं करते हैं। आवश्यकता से अधिक धन का संग्रहण अनुचित है। इसलिए धन का दान करना चाहिए। सही कार्यों में धन को निवेश करना चाहिए। यही धन की रक्षा के समान है। यदि कोई व्यक्ति दिन-रात मेहनत करके पैसा कमाता है और उसका उपभोग नहीं करता है तो ऐसे पैसों का लाभ क्या है। हमेशा पैसों का सदुपयोग करते रहना चाहिए। इसी प्रकार किसी तालाब में भरा जल उपयोग न किया जाए तो वह सड़ जाता है। ऐसे पानी को बचाने के लिए जरूरी है कि उसका उपयोग किया जाए। यही बात धन पर भी लागू होती है। 

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All religions are same!!!
We have 26 alphabets in English,
as given below?

 A  B  C  D  E  F  G H   I  J   K    L   M    N   O   P   Q   R
1   2   3  4   5   6   7  8  9  10  11  12  13  14  15  16  17  18
S   T     U   V   W    X     Y     Z
19  20   21  22   23   24   25  26 
With each alphabet getting a number, in chronological order, as above, study the following, and bring down the total to a single digit and see the result yourself.
Hindu
S  h  r  e  e   K  r  i  s  h  n  a
19+8+18+5+5+11+18+9+19+8+14+1=135=9
M u s l i m
M  o  h  a  m  m  e  d
13+15+8+1+13+13+5+4=72=9
Jain
M a h a v  i  r
13+1+8+1+22+9+18=72=9
Sikh
G  u  r  u   N  a  n  a  k
7+21+18+21+14+1+14+1+11=108=9
Parsi
Z  a  r  a  t  h  u  s  t  r a
26+1+18+1+20+8+21+19+20+18+1=153=9
Buddhist
G  a   u  t  a  m
7+1+21+20+1+13=63=9 
Christian
Esa Messiah
5+19+1+13+5+19+19+9+1+8=99=18=9
 Each one ends with number 9
THAT IS NATURE’S CREATION. 
That all religions are same!!!
Amazing!!
 YET MAN FIGHTS WITH MAN, ON RELIGIOUS ISSUES???
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।। दिव्य संदेश ।।


आप के मानस में बिराजे हुऐ उन समस्त सदगुणों को नमन करता हूँ, जिनके वशीभूत होकर आप यहाँ पधारे।

हमारे साथियों,
वंदे वेद मातरम् ।

प्राचीन काल मे संत समाज वाणी द्वारा ही जनमानस को दिशा एवम प्रेरणा देने का कार्य बड़ी सफलता के साथ करता रहा है । 
इसी श्रेष्ठ परम्परा को लक्ष्य करके एक मंच की स्थापना की गयी है । 
 इस मंच का नाम ”जनमानस परिष्कार मंच” है । 
यहाँ संत समाज की वाणी को संकलित करने का प्रयास किया जा रहा है। 

प्रथमतः यह कार्य ब्लाग से आरम्भ किया गया हैं। 
योजना के आगामी चरण में वेबसाइट का निर्माण किया जा चुका है। 
यह सारा संकलन भी इस वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। 
आगामी समस्त संकलन इसी वेबसाइट पर किया जा रहा है। 
इस वेबसाइट पर आप सभी का हार्दिक स्वागत है। 


धरती पर स्वर्ग का अवतरण तो होना ही है । 
इसमे किसी को शंका नही होनी चाहिए । 
नवयुग यदि आएगा तो विचार शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नही, विचारो की विचारो से काट द्वारा होगी, समाज का नवनिर्माण होगा तो वह सद् विचारो की स्थापना द्वारा ही संभव होगा । 

यह सम्पूर्ण योजना परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्रीरामजीशर्मा के सुक्ष्म सानिध्य मे संपन्न हो रही है । 
हमें इस सुक्ष्म सत्ता का संरक्षण सदैव प्राप्त होता रहेगा । 
यह हमारी सुक्ष्म सत्ता का वादा है ।

विचार क्रांति की यह योजना आप सभी के सहयोग से ही संपन्न होगी ।
आप भी अपना अपना अमूल्य सहयोग कर 
“युग निर्माण योजना” 
को सफल बनायें ।
आपके अनमोल सुझाव सादर आमंत्रित है ।

।। वंदे वेद मातरम् ।।

गुरूदेव के चरणों में –
जनमानस परिष्कार मंच
vedmatram@gmail.com
स्वरदूत – 09929827894, 01483-225554
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Aims & Objectives: 
• Rise of divinity in man, descent of heaven on earth 
• Individual, familial and social upliftment 
• Healthy body, pure mind and civilized society 
• Atmavat sarvabhooteshu (all living beings are soulkins), Vashudhaiv kutumbkam (Entire earth is the our family) 
• One nation, one language, one religion, one government 
• Everyone should get equal opportunity for self-growth irrespective of caste, color or creed 

Declaration and initiation of the Yojana (Plan) by: 
• Yug-rishi (Seer-sage of present era), Vedmurty (Assimilator of the knowledge of Vedas), Taponishtha (Ascetic) Pandit Sriram Sharma Acharya (embodiment of PrakharPragya ) 
• Vandaniya Mata (Revered Mother) Bhagwati Devi Sharma, consort and soul-mate of Acharyasri (embodiment of Sajal Shraddha) 

Three Pillars of Strength: 
• Will and Patronage of Almighty 
• Spiritual Guidance of Rishis (Seers) 
• Active Participation of enlightened masses 

Two Rules for Self-refinement: 
• Noble deeds flow out of noble thoughts 
• Simple living- High thinking 

Basic Programs: 
• Moral, intellectual and social transformation 
• Public education through various media, using the religious platform 
• Dissemination of Gayatri (collective wisdom) and Yagya (cooperative virtuous demeanor) 

Our Declaration: 
• Self–transformation will lead to the transformation of society; self-refinement will lead to global refinement 
• Twenty-first Century- Heralds advent of Golden age 
• Love humanity – Serve humanity 

Our Emblem: 
• Red Torch – Powerful collective effort for Era-transformation 

Our Manifesto: 
• 18 pledges for individual and collective refinement 

Our Firm Beliefs: 
• Man is the maker of his own destiny. 
• A man is what he thinks and does. 
• Man and woman are not opponents; they complement each other. 





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1- Give the world the best that you have, and the best will come back to you. 
—————
2- Kbhi khushi ki asha, 
kbhi gm ki nirasha, 
kbhi spno ki chandni, 
kbhi hqiqat ki chaya, 
kuch khokr kuch pane ki asha, 
shayad yhi h zindgi ki PRIBHASHA. 
—————
3- Jivaatma ki Yogyata ho to hi usko Jivan me “Satsang or Seva” ka Avasar milta hai-Kirit Bhai 
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4- Khush naseeb wo nahi jiska naseeb acha h,
Balki Khush naseeb wo he jo Apne naseeb se khush he.” 
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5- Life never leavs u empty..
It alwys replacs evrythng u lost..
If it asks u 2 put somthng Down, 
its bcoz it wants u 2 pick up somthng better. 
—————
6- Our life begins with our cry,
Our life ends with other’s cry.
Try to utilize this gap & laugh as much as possible between these cries !
Stay Happy Always. 
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7- The Biggest Suspense Of Life Is…
We Know For Whom We Are Praying But ?
We Never Know The Person Who Is Praying For Us
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8- Meaningful Msg:
All that I’ve learnt about life can be summarized in three words- ??
.
.
.
.
.
.
.
“LIFE GOES ON”!!! 
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9- Me Iswar ko manta nhi hu,
Me Iswar ko janta hu..
Kyoki Iswar Mane ka vishay nhi janne ka vishay h. 
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10- Very Short But Much Truthful Lines..
”Get a best friend like a mirror,
because when u cry,
it never laughs” ! 
—————
11- Very Short, But Much Truthful Lines..
”Get a best friend like a mirror,
because when u cry,
it never laughs”! 
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12- Manushya Yoni Ki Visheshta H Ki Manav Sharir Me Akar Swechhanusar Karm Kar Sakta H, Utthan Aur Patan Ka Marg Swym Chunta H. 
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13- Very Important Thought :
.
“TURN” to GOD….
Before you “RETURN” to GOD…! 
—————
14- Savdhan ! ! ! 
.
.
.
.
.
pal bhar ka krodh aapka pura bhavishya bigad sakta h.
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15- Aap jiwan me kitne b unche kyo na uth jaye apni garibi or kathinayee k din kabhi mat bhuliye. 
—————
16- Jb aap kisi ko bhotik padarth dene me asmarth ho to b apni sad bhavnaye or shubh kamnaye dusro ko dete rahiye. 
—————
17- “If u have the ability to stand tall even after u have been hurt badly by ur dear ones, Just a smile will punish them more than ur words” 
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18- Baccho pr nivesh krne ki sbse acchi chij h apna SAMAY or acche SANSKAR. Dhyan rakhe, ek shreshth balak ka nirman so school banane se b accha h. 
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19- Manvta ki sewa krne wale hath utne he dhanya h jitne parmatma ki prarthna karne wale onth. 
—————
20- The main difference between ATTITUDE & EGO is that, “Attitude” makes you DIFFERENT from others !
While “Ego” makes you ALONE from others…! 
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21- Badhao ko dekh ke vichlit na ho. vishwas rakhe, Jeewan me 99 dwar band ho jate h, tb b koi na koi ek dwar zarur khula rahta h. 
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22- Dheeraj mt khoo. Heenta or hatasha tumhe shobha nahi deti. Apne aatam vishwas ko badhao, Fir se prayas karo, Tumhe safalta zarur milegi. 
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23- No one in life will think exactly like the way you think..!
Learn to appreciate all the differences and understand each other..! 
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24- Dhan or business me itne b busy mat hoiye ki Swasthay, Pariwar, or apne Kartwyo pr dhyan na de paye…
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ह्रीं, श्रीं, क्लीं, मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड ॥ 
शान्ति, क्रान्ति, जाग्रति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड ॥ १॥

जगत जननी, मङ्गल करनि, गायत्री सुखधाम । 
प्रणवों सावित्री, स्वधा, स्वाहा पूरन काम ॥ २॥
————
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। 
गायत्री नित कलिमल दहनी॥१॥ 

अक्षर चौविस परम पुनीता। 
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥२॥ 

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा। 
सत्य सनातन सुधा अनूपा॥३॥ 

हंसारूढ श्वेताम्बर धारी। 
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन- बिहारी॥४॥ 

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला। 
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥५॥ 

ध्यान धरत पुलकित हिय होई। 
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥६॥ 

कामधेनु तुम सुर तरु छाया। 
निराकार की अद्भुत माया॥७॥ 

तुम्हरी शरण गहै जो कोई। 
तरै सकल संकट सों सोई॥८॥ 

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। 
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥९॥ 

तुम्हरी महिमा पार न पावैं। 
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥१०॥ 

चार वेद की मात पुनीता। 
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥११॥ 

महामन्त्र जितने जग माहीं। 
कोउ गायत्री सम नाहीं॥१२॥ 

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। 
आलस पाप अविद्या नासै॥१३॥ 

सृष्टि बीज जग जननि भवानी। 
कालरात्रि वरदा कल्याणी॥१४॥ 

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। 
तुम सों पावें सुरता तेते॥१५॥ 

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। 
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥१६॥ 

महिमा अपरम्पार तुम्हारी। 
जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥१७॥ 

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। 
तुम सम अधिक न जगमे आना॥१८॥ 

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। 
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा॥१९॥ 

जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। 
पारस परसि कुधातु सुहाई॥२०॥ 

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई। 
माता तुम सब ठौर समाई॥२१॥ 

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। 
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥२२॥ 

सकल सृष्टि की प्राण विधाता। 
पालक पोषक नाशक त्राता॥२३॥ 

मातेश्वरी दया व्रत धारी। 
तुम सन तरे पातकी भारी॥२४॥ 

जापर कृपा तुम्हारी होई। 
तापर कृपा करें सब कोई॥२५॥ 

मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें। 
रोगी रोग रहित हो जावें॥२६॥ 

दारिद मिटै कटै सब पीरा। 
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥२७॥ 

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। 
नासै गायत्री भय हारी॥२८॥ 

सन्तति हीन सुसन्तति पावें। 
सुख संपति युत मोद मनावें॥२९॥ 

भूत पिशाच सबै भय खावें। 
यम के दूत निकट नहिं आवें॥३०॥ 

जो सधवा सुमिरें चित लाई। 
अछत सुहाग सदा सुखदाई॥३१॥ 

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी। 
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥३२॥ 

जयति जयति जगदंब भवानी। 
तुम सम और दयालु न दानी॥३३॥ 

जो सतगुरु सो दीक्षा पावे। 
सो साधन को सफल बनावे॥३४॥ 

सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी। 
लहै मनोरथ गृही विरागी॥३५॥ 

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। 
सब समर्थ गायत्री माता॥३६॥ 

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। 
आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥३७॥ 

जो जो शरण तुम्हारी आवें। 
सो सो मन वांछित फल पावें॥३८॥ 

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ। 
धन वैभव यश तेज उछाउ॥३९॥ 

सकल बढें उपजें सुख नाना। 
जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥४०॥ 
————
यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई । 
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥ 

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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संत फ्रांसिस ने एक कोढ़ी को चिकित्सा के लिए धन दिया, वस्त्र दिए, स्वयं ने उनकी सेवा की। एक गिरजाघर की मरम्मत के लिए दुकान की कपड़े की कई गाँठें और अपना घोड़ा बेचकर सारा धन दे दिया। उनके पिता को इन बातों का पता चला तो उन्होंने उन्हें मारा-पीटा ही नहीं, अपनी संपदा के उत्तराधिकार से वंचित भी करने की धमकी दी।

पिता की यह धमकी सुनकर-‘‘आपने मुझे एक बहुत बड़े मोह बंधन से मुक्त कर दिया हैं। मैं स्वंय उस संपति को दूर से प्रणाम करता हूँ, जो परमार्थ और लोकमंगल के काम में नहीं आ सकती।’’

यह कहते हुए उन्होंने उनके कपड़े तक उतार दिए। उन्होंने पिता की संपदा के अधिकार को लात मार दी। 

लोकसेवा के मार्ग में बाधा बनने वाली संपदा का परित्याग ही उचित है।

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राँका कुम्हार ने बरतन पकाने की भट्ठी तैयार की तथा पकाने के लिए बरतन उसमें रख दिए। उनमें से एक बरतन में बिल्ली के बच्चे भी थे। राँका को इसका पता नहीं था। उसने भट्ठी में आग दी। बरतन पक रहे थे तब बिल्ली आकर चक्कर काटने लगी। राँका सब बात समझकर बड़ा दुःखी हुआ और भगवान से प्रार्थना करता हुआ बैठा रहा दूसरे दिन पके बरतन भट्ठी से निकालने लगा तो देखा की एक बरतन कच्चा रह गया है, उसमें से म्याऊ-म्याऊ की आवाज निकल रही है। यह देखकर वह निहाल हो गया।

निश्छल मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती।

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एक बार एक सेठ जी स्वंय महामना मालवीय जी के पास अपने एक प्रीतिभोज में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए पहुँचे। महामना जी ने उनके इस निमंत्रण को इन विनम्र किंतु मर्मस्पर्शी शब्दों में अस्वीकार कर दिया-‘‘यह आपकी कृपा है, जो मुझ अकिंचन के पास स्वयं निमंत्रण देने पधारें, किंतु जब तक मेरे इस देश में मेरे हजारों-लाखों भाई आधे पेट रहकर दिन काट रहे हों तो मैं विविध व्यंजनों से परिपूर्ण बड़े-बड़े भोजों मे कैसे सम्मिलित हो सकता हूँ- ये सुस्वादु पदार्थ मेरे गले कैसे उतर सकते हैं।’’

महामना जी की यह मर्मयुक्त बात सुन सेठ जी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने प्रीतिभोज में व्यय होने वाला सारा धन गरीबों के कल्याण हेतु दान दे दिया। बाद में उनका हृदय इस सत्कार्य से आनन्दमग्न हो उठा। 

अन्य लोगों के कष्टपीडि़त और अभावग्रस्त रहते स्वयं मौज-मस्ती में रहना मानवीय अपराध हैं। 

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