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स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा सुश्रुत ने बड़ी सुन्दर एवं व्यवस्थित की हैं। वे कहते हैं-
‘‘स्वस्थ व्यक्ति वह हैं, जिसमें वात-कफ-पित्तादि दोष, त्रयोदश अग्निया (7 धात्वाग्निया, 5 महाभूताग्निया तथा जठराग्नि ), सप्त धातुए सम अवस्था में हो, मल-मूत्रादि का विसर्जन निर्बाध रूप से हो रहा हो, आत्मा, इंद्रिय एवं मन प्रसन्न हो।’’ (सु.सू. 15/41)

अब हम देंखे कि इस परिभाषा के अनुसार हम कहा हैं ? 
कितनी कुछ विकृतिया हमारे जीवन मं आ गई हैं ,? वस्तुतः इस आधार पर बिरले ही स्वस्थ होंगे। ‘मानसिक स्वास्थ्य’ को भी परिभाषित करते हुए कहा गया हैं कि जो सुख-दुख में सम हैं, लौह और स्वर्ण में समान दृष्टि वाला हैं, प्रिय और अप्रिय में धीर हैं, निंदा-स्तुति में बराबर हैं, वही पूर्णतः स्वस्थ है।

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