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समाधान 
उपवास प्रारम्भ होने पर नित्य के नियमानुसार भोजन से शरीर को शक्ति प्राप्त नहीं होती, अतएव इसके लिये अन्य उपाय कामें लाने चाहिए, यथा-शुद्ध वायु और शुद्ध जल का उपयोग। शुद्ध वायु में गहरी सांस लेने से प्राणवायु के स्पर्श से रक्त में पहले से उपस्थित विषेले तत्व दूर होते हैं। उपवास काल में कोई अप्राकृतिक खाद्य शरीर में नही जाता, अतएव विजातीय द्रव्य रक्त में नहीं मिलते तथा उसकी शुद्धि होती है। धूप-स्नान से शरीर को अनेक विटामीन मिलते हैं तथा रोगों के कीटाणु नष्ट होते हैं। उपवास काल में अधिक पानी पीना चाहिये, जिससे कि अधिक मूत्र विसर्जन के माध्यम से शरीर से अधिक गन्दगी बाहर हो। मूत्र गुर्दो में रक्त छनकर बनता हैं, अतएव रक्त में जल की अधिकता होने से अधिक गन्दगी साफ होती है। उपवास शारीरिक स्थिति एवं रोग के अनुसार 2-3 दिन से लेकर निरन्तर दो मास तक किया जा सकता हैं। एक सप्ताह से अधिक का उपवास लम्बे उपवास की श्रेणी में आता हैं। लम्बा उपवास अत्यन्त सावधानी पूर्वक विधिवत किया जाना चाहिए, अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि का भय रहता हैं। लम्बे उपवास तोड़ने में काफी सावधानी बरतनी चाहिए। नींबू के पानी या सन्तरे-मौसमी आदि के रस से तोड़ना चाहिए। फिर एक दिन तक मौसम के फल लेने चाहिए। जितने दिन तक उपवास किया गया हो, उसके चौथाई समय तक फल लेने चाहिए,

तदुपरान्त अन्न खाना चाहिए। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि उपवास के बाद पुन: गलत भोजन न ले। ऐसा करने पर उपवास का लाभ भी जाता रहेगा तथा शरीर शुद्ध हो जाने पर यदि विजातीय द्रव्य शरीर में जाएगा तो पूरी मात्रा में वह शरीर के लिए हानिकारक होगा। 

-स्वास्थ्य रक्षा प्रकृति के अनुसरण से ही सम्भव, पृष्ठ-47, 48)

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