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समाधान- अपनी निज की समर्थता, दक्षता, प्रामाणिकता और प्रभाव-प्रखरता एकमात्र इसी आधार पर निखरती हैं कि चिंतन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश हो। अनगढ़, अस्त-व्यस्त लोग गई-गुजरी जिंदगी जीते हैं दूसरों की सहायता कर सकना तो दूर, अपना गुजारा तक जिस-तिस के सामने गिड़गिड़ाते, हाथ पसारते बड़ी कठिनाई से ही कर पाते हैं। पर जिसकी प्रतिभा प्रखर हैं, उनकी विशिष्टताएँ मणिमुक्तकों की तरह झिलमिलाती हैं, दूसरों को आकर्षित-प्रभावित भी करती हैं और सहारा देने में भी समर्थ होती हैं, सहयोग और सम्मान भी ऐसों के आगे-पीछे चलता हैं। बीमारियों, कठिनाइयों और तुफानों से वे ही बच पाते हैं, जिनकी जीवनी शक्ति सुदृढ़ होती है।

समर्थता को ओजस मनस्विता को तेजस और जीवट को वर्चस कहते हैं। यही हैं वे दिव्य संपदाएँ, जिनके बदले इस संसार के हाट-बाजार से कुछ भी मनचाहा खरीदा जा सकता हैं दूसरों की सहायता भी वे लोग ही कर पाते हैं, जिनके पास अपना वैभव और पराक्रम हो। संसार के वातावरण का सुधार वे ही कर सकेंगे, जिन्होंने अपने आप को सुधारकर यह सिद्ध कर दिया हो कि उनकी सृजन-क्षमता असंदिग्ध हैं। परिस्थितियों की विपन्नता को देखते हुए उन्हें सुधारे जाने की नितांत आवश्यकता हैं, पर इस अति कठिन कार्य को कर वे ही सकेंगे, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करके यह सिद्ध कर दिया हो कि वे आड़े समय में कुछ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकने में सफल हो सकते हैं। इस स्तर को उपलब्ध कर सकने की कसौटी एक ही हैं-अपने व्यक्तित्व को दुर्गुणों से मुक्त करके, सर्वतोमुखी समर्थता से संपन्न कर लिया हो। सद्गुणों की संपदा प्रचुर परिमाण में अर्जित कर ली हो। 

(जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र, पृष्ट 13-14)
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