m-150x150

yugnirman.org

ब्लॉग आर्काइव
Donate blood save lives
blood
Our visiters
  • 1388Total visitors:
  • 11Visitors today:
  • 0Visitors currently online:

1. हमारा आरोग्य मन, मस्तिष्क और पेट से जुड़ा हैं। 90 प्रतिशत रोगों का कारण हमारा पेट ही होता हैं। निर्मल विचार मन-मस्तिष्क को प्रसन्न रखते हैं और सात्विक आहार हमारे पेट को।

—————-
2. हम जैसा अन्न खाते हैं वैसा ही हमारा तन-मन होता हैं। सच्चाई तो यह हैं कि आप वैसा ही सोचते हैं, जैसा खाते है। इंसान के खानपान से ही उसके खानदान का पता चलता हैं। 

—————-
3. आहार-विहार, शयन-जागरण, भोग और योग संयमित हो तो बेहतर रहता हैं। जो सीमित खाता हैं वह ज्यादा जीता हैं। इसलिए ज्यादा खाकर जल्दी मरने वालों से वह व्यक्ति ज्यादा खा सकता हैं जो कम खाकर ज्यादा जीता है।

—————-
4. कुछ लोग जीने के लिए खाते हैं, कुछ खाने के लिए जीते हैं। वह भोगी हैं जो खाने के लिए जीता हैं पर जो जीने के लिए संयमित खाता हैं वह योगी हैं।

—————-
5. अन्न प्राण हैं और प्राणदाता हैं पर इसको जरूरत से ज्यादा खा लिया जाए तो यही प्राणहर्ता भी बन जाता हैं। 

—————-
6. आहार के चार चरण हैं- उगाना, पकाना, चबाना और पचाना। खेत से लेकर पेट तक होने वाली यह यात्रा अगर स्वस्थ हो तो अपना चिकित्सक व्यक्ति स्वयं होता है। 

—————-
7. रसोईघर हमारे स्वास्थ्य का नियंत्रण-कक्ष हैं। कृपया किचन में किच-किच मत कीजिए। अग्निदेव के इस मंगलगृह में घर के सब सदस्य मिलजुल कर भोजन बनाइए और फिर उसे प्रभु का प्रसाद मानकर ग्रहण कीजिए।

—————-
8. स्वाद के लिए खाना अज्ञान हैं, जीने की लिए खाना बुद्धिमानी हैं, पर संयम की रक्षा के लिए खाना साधना हैं। 

—————-
9. होटल में खाने से बचिए। याद रखिए, जो होटल में खाते हैं उनको होस्पीटल में मरना पड़ता हैं। फिर भी होटल में खाना खाने का मन कर रहा हो तो जहाँ खाना बनता हैं वहाँ जाकर देखिए फिर आप कभी होटल में खाना खाने का नाम भी नहीं लेंगे।

—————-
10. भोजन हमेशा सीधे कमर बैठकर कीजिए। औरों को खिलाकर खाइए और मौनपूर्वक भोजन कीजिए।

—————-
11. भोजन करते समय पेट को चैथाई खाली भी रखिए। कम खाइए, गम खाइए और सुखी रहिए। एक बार योगी खाता हैं दो बार भोगी खाता हैं और बार-बार खाने वाला स्वतः रोगी हो जाता हैं।

—————-
12. शादी-विवाह के भोज में ज्यादा गरिष्ठ भोजन मत कीजिए। उसने भले ही 40 तरह के आईटम बनाए हो पर आप उसमें से 10 का ही उपयोग कीजिए। यह सोचने की बेवकूफी मत कीजिए कि पराया माल मिलना दुर्लभ हैं शरीर तो फिर भी मिल जाएगा।

—————-
13. दोपहर के भोजन बाद भले ही आराम कीजिए पर शाम को भोजन करके जरूर टहल लीजिए। जहाँ तक हो सके रात्रि-भोजन से बचिए, आप जीवन में 100 बीमारियों से बचे रहेंगे।

—————-
14. भोजन में अन्न को आधा कीजिए, शाक-सब्जी को दुगुना लीजिए, पानी तिगुना पीजिए और हँसी को चार गुना कीजिए।

—————-
15. ज्यादा मिर्च-मसाले या तेल-घी वाले भोजन से दूर रहिए जिससे आपकी वृत्ति सात्विक बनी रहेगी।

—————-
16. घर में जो भोजन बना हैं उस पर किसी प्रकार की टिप्पणी मत कीजिए। प्रेम, शांति और आनन्द का भी भोजन के साथ स्वाद लीजिए।

—————-
साभार- संबोधि टाइम्स, संतप्रवर श्री चन्द्रप्रभ जी
PLEASE SHARE THIS POSTShare on Facebook0Tweet about this on TwitterEmail this to someoneShare on Google+0Pin on Pinterest0

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *