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हनुमान चालीसा में एक चोपाई आती है —

साधू- संत के तुम रखवारे,
असुर निकंजन राम दुलारे…….

यहाँ पर आदरणीय तुलसीदासजी ने साधू और संत , दो अलग-अलग शब्दों का प्रयोग किया है,
कारन ये है की साधू और संत में बहुत ही महीन और बड़ा अंतर है, और वो ये है की,
” साधू ” वह है जो भगवान् को चाहे, और ” संत” वह है जिन्हें भगवान् स्वंम चाहें ……..

अब ये हमारे ऊपर निर्भर है की हमें क्या बनना है. ……..

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